उत्तर प्रदेश में विलय के नाम पर हज़ारों सरकारी स्कूल बन्द करने की शुरुआत

ध्रुव

योगी सरकार के रामराज्य में शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह रामभरोसे है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में ऐसे प्राथमिक विद्यालयों के विलय करने का फ़रमान सुनाया जिसमें 50 से कम छात्र आते हैं। ऐसे विद्यालयों का 1 किमी के दायरे के भीतर मौजूद निकटतम विद्यालय में विलय कर दिया जायेगा। इस आदेश के दायरे में आकर लगभग 5,000 स्कूलों पर बन्द होने की तलवार लटक रही है।

इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ तमाम शिक्षक संगठनों और अभिभावकों ने आवाज उठायी। हाईकोर्ट में इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका भी दायर की गई लेकिन पहले तो 7 जुलाई 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस फ़ैसले को वैध ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं की याचिका को ही ख़ारिज कर दिया तथा कोर्ट ने सरकार का पक्ष लेते हुए कहा कि यह नीतिगत निर्णय शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधनों के उपयोग के लिए ज़रूरी है। बाद में सीतापुर के छात्रों की तरफ़ से दायर एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए अभी तात्कालिक तौर पर इस विलय (मर्जर) पर रोक लगायी गयी है। जबकि इस फ़ैसले से सीधे तौर पर 3.5 लाख बच्चे प्रभावित हो सकते हैं।

इसी साल फरवरी में केन्द्र सरकार के शिक्षा राज्य मन्त्री जयन्त चौधरी ने लोकसभा में बताया था कि पिछले 10 सालों में देश भर में बन्द लगभग 89 हज़ार सरकारी स्कूल हुए हैं, जिनेमें से क़रीब 25 हज़ार स्कूल केवल उत्तर प्रदेश में बन्द किये गये हैं। सरकार बच्चों की संख्या में कमी का हवाला देकर स्कूलों को बन्द करने का काम कर रही है। लेकिन हमें इस बात की जाँच-पड़ताल करनी होगी कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार कम क्यों होती जा रही है। दरअसल सरकारी स्कूलों में बच्चों की कमी के पीछे भी सरकार और उसकी नीतियाँ ही ज़िम्मेदार है। सरकार ने योजनाबद्ध तरीक़े से सरकारी शिक्षा के पूरे ढाँचे को बर्बाद करने का काम किया है। सरकारी स्कूलों की हालत ये है कि वहाँ आधारभूत ढाँचे की भी भयंकर कमी है। सरकारी स्कूलों में ना तो बिल्डिंगों की हालत ठीक है, ना ही बच्चों के लिये पर्याप्त कक्षायें हैं और ना ही बैठने की ठीक से व्यवस्था है। शौचालय, पीने का साफ़ पानी और बिजली सहित अन्य सुविधाओं की भी हालत बेहद ख़राब है।

लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सरकारी स्कूलों की बरबादी का भी एक नया मॉडल प्रस्तुत कर दिया है। ख़ासकर उत्तर प्रदेश की बात करें तो ‘यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्ेफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन’ (UDISE) 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 18 प्रतिशत सरकारी स्कूलों, यानी लगभग 27,000 स्कूलों के भवन जर्जर स्थिति में हैं। इनमें से कई स्कूलों की छतें और दीवारें ख़तरनाक स्थिति में हैं। 10 अगस्त 2025 की ‘द प्रिण्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में प्राथमिक विद्यालय नसीराबाद में छत का प्लास्टर गिरने से दो बच्चे घायल हो गये। नोएडा और गोरखपुर के इलाक़ों से भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। यही रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश के 32 प्रतिशत प्राथमिक स्कूलों में कक्षाओं की संख्या अपर्याप्त है, जिसके कारण कई कक्षाएँ खुले में या एक ही कमरे में चलाई जाती हैं। 25 प्रतिशत स्कूलों में बच्चों के लिए पर्याप्त बेंच-डेस्क तक नहीं हैं। अगर अन्य बुनियादी सुविधाओं जैसे कि स्कूलों में शौचालय की स्थिति की बात करें तो ‘एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन’ ( ASER) 2024 की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश के 22 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में कार्यशील शौचालय ही उपलब्ध नहीं हैं, और 35 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं। लगभग 40 प्रतिशत विद्यालयों में तो नियमित स्वच्छता व्यवस्था ही नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या और गम्भीर है, जहाँ शौचालयों की कमी के कारण लड़कियों की ड्रॉपआउट दर में 10-12 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी है। शिक्षा मन्त्रालय की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 28 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में पेयजल की सुविधा नहीं है, और 40 प्रतिशत स्कूलों में बिजली कनेक्शन उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आँकड़ा और भी अधिक है, जहाँ 55 प्रतिशत स्कूलों में बिजली नहीं है।

सरकारी विद्यालयों में एक तरफ़ तो आधारभूत ढाँचे की समस्या बड़े पैमाने पर है दूसरी तरफ़ इन विद्यालयों में शिक्षकों की भी भारी कमी है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 1,15,905 शिक्षकों की कमी है। हर साल हज़ारों शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं लेकिन पिछले 7 सालों से शिक्षकों की कोई भर्ती नहीं निकाली गयी है। केन्द्रीय शिक्षा मन्त्रालय की हालिया रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 5,695 सरकारी स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। शिक्षकों की भारी कमी की वज़ह से सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है। उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शैक्षिक गुणवत्ता एक गम्भीर चुनौती है। ASER- 2022 की रिपोर्ट के अनुसार कक्षा 5 के केवल 28 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा के स्तर की किताब पढ़ सकते हैं और केवल 25 प्रतिशत बच्चे बुनियादी गणितीय गणनाएँ (जैसे घटाना) कर सकते हैं। राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) 2021 में यूपी के सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से नीचे पाया गया, विशेष रूप से गणित और भाषा में। जो शिक्षक विद्यालयों में कार्यरत हैं भी उन्हें भी अध्यापन के अलावा मतगणना से लेकर जनगणना तक हर तरह के कार्य सौंपे जाते हैं।

इस पूरी स्थिति से समझा जा सकता है कि अपने बच्चे की शिक्षा और भविष्य के बारे में सोचने वाले अभिभावक ऐसी शिक्षा व्यवस्था के भरोसे अपने बच्चों को नहीं छोड़ना चाहेंगे। UDISE+ 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षण सत्र 2022-23 से 2023-24 में 28 लाख बच्चों का नामांकन कम हुआ। 2021-22 में प्राथमिक स्तर पर 6.51 लाख और उच्च प्राथमिक स्तर पर 3.22 लाख बच्चे ड्रॉपआउट हुए। उत्तर प्रदेश में ड्रॉपआउट दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। UDISE+ 2022-23 के अनुसार, माध्यमिक स्तर (कक्षा 9-10) पर ड्रॉपआउट दर 12.5 प्रतिशत थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 10.1 प्रतिशत है। इण्डिया स्पेण्ड (2025) के अनुसार, 2021-22 से 2023-24 तक प्राथमिक स्तर पर 1.4 करोड़ बच्चों का नामांकन कम हुआ, जिसमें उत्तर प्रदेश का अग्रणी है।

जहाँ एक तरफ़ सरकारी विद्यालयों की संख्या लगातार कम हो रही है वहीं पर पिछले दस सालों में निजी विद्यालयों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिल रही है। UDISE+ की रिपोर्ट ही बताती है कि उत्तर प्रदेश में पिछले दस सालों (2014-15 से 2023-24) में निजी विद्यालयों की संख्या 2014-15 में 77,330 से बढ़कर 2023-24 में 96,635 हो गयी। इस दौरान लगभग 19,305 नये निजी स्कूल खुले हैं यानी निजी विद्यालयों की संख्या में 24.96 प्रतिशत बढ़ोतरी देखने को मिली है।

वास्तव में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की मंशा कुल मिलाकर आम मेहनतकश जनता के बेटे-बेटियों से शिक्षा का बुनियादी अधिकार छीनकर उसे निजी हाथों में सौंप देना है, ताकि इनके आका पूँजीपति शिक्षा को बेचकर मुनाफ़ा कमा सकें। यही वजह है कि शिक्षकों की भर्ती पर रोक लगाने, निजी स्कूलों में दाख़िले को प्रोत्साहन देने, सरकारी विद्यालयों को बन्द करने जैसी तमाम क़वायदें करके उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस दिशा में जी-जान से लगी हुई है। आज देश के आम मेहनतकश लोगों को योगी सरकार के इस फ़ैसले के विरुद्ध और ‘सबको समान और निःशुल्क शिक्षा’ के हक़ के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की ज़रूरत है।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2025

 

 

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