स्त्री मज़दूर दिवस (8 मार्च) पर मनरेगा स्त्री मज़दूरों का नारा : पूरे साल काम दो! काम के पूरे दाम दो!! काम नहीं तो बेरोज़गारी भत्ता दो!
बीडीपीओ कार्यालय पर क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन का प्रदर्शन
बिगुल संवाददाता
4 मार्च। कलायत, बीडीपीओ कार्यालय पर क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन के बैनर तले स्त्री दिवस (8 मार्च) के अवसर पर स्त्री हक-अधिकारों के लिए रैली व प्रदर्शन का आयोजन किया गया। मनरेगा यूनियन ने बीडीपीओ को अपनी माँगों का ज्ञापन सौंपा।
यूनियन के प्रभारी अजय ने बताया कि गाँव सिमला, चौशाला, रामगढ़ व आसपास के गाँवों में मनरेगा मज़दूर विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त हैं। यूनियन द्वारा पहले भी मनरेगा मज़दूरों के माँगपत्रक बीडीपीओ कार्यालय में दिये गए हैं लेकिन लम्बा समय बीतने के बाद भी विभाग द्वारा इस समस्या का हल नहीं किया गया है।
इसलिए इस स्त्री दिवस पर मनरेगा में कार्यरत स्त्री मज़दूर अपने जायज़ हक़-अधिकारों की लड़ाई के लिए सड़़कों पर उतरी हैं। चौशाला गाँव की मेट मीना ने बताया कि हर गाँव में मनरेगा के सौ मज़दूरों में 90 स्त्री मज़़दूर हैं। इसलिए भी इस स्त्री मज़दूर दिवस के अवसर पर हमें अपनी एकजुटता और संघर्ष की विरासत को कायम रखना चाहिए। हमें मनरेगा मज़दूर के तौर पर पूरे साल काम और काम के पूरे दाम की लड़ाई सड़कों पर लानी चाहिए। आप जानते हैं कि कलायत तहसील में किसी भी मनरेगा मज़दूर परिवार को पूरे 100 दिन रोज़गार नहीं मिलता है। असल में मनरेगा क़ानून के तहत 1 वर्ष में एक मज़दूर परिवार को 100 दिन के रोज़गार की गारण्टी मिलनी चाहिए। साथ ही क़ानूनन रोज़गार के आवदेन के 15 दिन के भीतर काम देने या काम ना देने की सूरत में बेरोज़गारी भत्ता देने की बात कही गयी है। लेकिन कलायत ब्लॉक या पूरे देश में मज़दूरों को औसतन 30-35 दिन ही काम मिलता है।
सिमला गाँव के अनिल ने बताया कि दूसरी तरफ़ मोदी सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियों के कारण मनरेगा के बजट में लगातार कटौती की जा रही है। बजट कटौती का सीधा मतलब श्रम दिवस के कम होने और रोज़गार के अवसरों में भी कमी है। कैथल में मनरेगा भ्रष्टाचार से भी जाहिर है कि बजट का एक बड़ा हिस्सा भी भ्रष्ट अफ़सरशाही की जेब में चला जाता है। यूनियन से अजय ने बताया कि ज़ाहिर है कि मनरेगा की योजना को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाकर लागू करने से ही गाँव के ग़रीबों की सारी समस्याएँ हल नहीं हो जायेंगी और मनरेगा की पूरी योजना ही गाँव के ग़रीबों को बस भुखमरी रेखा पर बनाये रखने का काम ही कर सकती है। ज़रूरत इस बात की है कि सच्चे मायने में रोज़गार गारण्टी, पर्याप्त न्यूनतम मज़दूरी, सभी श्रम अधिकारों समेत गाँव के ग़रीबों को प्राथमिक से उच्च स्तर तक समान व निशुल्क शिक्षा, समान, स्तरीय व निशुल्क स्वास्थ्य सुविधाएँ, आवास की सरकार सुविधा, और सामाजिक सुरक्षा मुहैया करायी जाय। यह काम मौजूद पूँजीवादी व्यवस्था में कोई सरकार नहीं करती क्योंकि पूँजीपतियों की सेवा करने से उन्हें फुरसत ही कहाँ होती है! ग़रीबों की सुध लेने का काम मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था नहीं करने वाली। लेकिन तात्कालिक माँग के तौर पर मनरेगा में भ्रष्टाचार को समाप्त करने की लड़ाई मज़दूरों के एक रोज़मर्रा के हक़ की लड़ाई है, जिसे आगे बढ़ाने का काम यूनियन कर रही है।
चौशाला गाँव से अजय भाल ने बताया कि 115 साल पहले दुनिया के कई देशों की मेहनतकश स्त्रियों की नेताओं ने एक सम्मेलन में फ़ैसला किया था कि हर साल 8 मार्च को ‘अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस’ मनाया जायेगा। यह दिन हर साल हमें हक़, इन्साफ़ और बराबरी की लड़ाई में फ़ौलादी इरादे के साथ शामिल होने की याद दिलाने आता है। पिछली सदी में दुनिया की मेहनतकश औरतों ने संगठित होकर कई अहम हक़ हासिल किये थे। मज़दूरों की हर लड़ाई में औरतें भी कन्धे से कन्धा मिलाकर शामिल हुईं। मनरेगा मज़दूरों को अपनी गौरवशाली विरासत से प्ररेणा लेते हुए अपने हक-अधिकारों के संघर्ष को तेज करना होगा।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2025













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