“सीज़फ़ायर समझौते” के बावजूद फ़िलिस्तीनियों पर हमले जारी : फ़िलिस्तीनी ज़मीन पर बढ़ती अवैध इज़रायली सेटलरों की संख्या!
ग़ज़ा में बच्चों के पतंग उड़ाने पर प्रतिबन्ध ज़ायनवादी इज़रायल के गहराते भय का परिचायक है!
भारत में भी मोदी सरकार द्वारा फ़िलिस्तीन समर्थकों को डराने-धमकाने की कायराना कोशिश जारी है!

अक्टूबर 2026 में “ट्रम्प नीत सीज़फ़ायर समझौते” के एक साल पूरे हो जायेंगे। अक्टूबर 2023 के बाद से फ़िलिस्तीनियों पर जारी इज़रायली बर्बरता में “सीज़फ़ायर” के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है। हवाई हमलों से लेकर स्थानीय लोगों को बेघर करने, उन्हें बुनियादी सुविधाओं से वंचित करने का काम अब भी जारी है। साम्राज्यवादी ताक़तों द्वारा “युद्धविराम” की घोषणा पहले दिन से ही एक घटिया मज़ाक़ था जिसकी असलियत हर बीतते दिन के साथ दुनिया के सामने आ रही है।

“युद्धविराम” के प्रमुख समझौते में यह शामिल था कि इज़रायली हमलों को बन्द किया जायेगा, ग़ज़ा में मानवीय सेवाओं और वस्तुओं की आपूर्ति को सुनिश्चित किया जायेगा, तक़रीबन 2000 फ़िलिस्तीनी क़ैदियों को इज़रायली जेलों से रिहा किया जायेगा और हमास द्वारा इज़रायली बन्धकों को लौटाया जायेगा। साथ ही, इज़रायली सेना पीछे हटेगी और “पीली रेखा” से आगे क़ब्ज़े को नहीं बढ़ायेगी। मगर जब हम ज़मीनी हक़ीक़त देखते हैं तो वह समझौते के इन उपरोक्त शर्तों के ठीक उलट है।

10 अक्टूबर 2025 से लेकर 24 अगस्त 2026 के बीच इज़रायल ने “सीज़फ़ायर समझौते” का उल्लंघन एक या दो दफ़ा नहीं बल्कि 4,379 दफ़ा किया है! ग़ज़ा के सरकारी मीडिया ऑफ़िस के मुताबिक़ पिछले लगभग 10 महीनों के दौरान आमतौर पर हर दिन ही हवाई हमलों के साथ-साथ गोली चलने, बच्चों को निशाना बनाने, घरों पर रेड डालने इत्यादि की घटनाएँ हुई हैं। 340 दिनों में मात्र 36 दिन ऐसे रहें हैं जब कोई भयावह हमला दर्ज नहीं किया गया, 304 दिनों में हर रोज़ लोगों के घर नेस्तनाबूद किये गये हैं, उनपर गोली और बमों से हमले किये गये हैं, मरने वालों और घायलों की संख्या बढ़ी है। फ़िलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के हिसाब से 10 अक्टूबर 2025 से लेकर 24 सितम्बर 2026 के बीच 73,928 बेगुनाह फ़िलिस्तीनी नागरिक मारे जा चुके हैं जिसमें 21,500 बच्चे हैं। वहीं 175,030 लोग गम्भीर रूप से घायल हैं।

बुनियादी मानवीय सहायता की बात करें तो उसे भी फिलिस्तीनीयों तक पहुँचने से रोका जा रहा है। ग़ज़ा सरकारी मीडिया ऑफ़िस की रिपोर्ट के अनुसार 10 अक्टूबर 2025 से लेकर 24 अगस्त 2026 के बीच 189,000 ट्रकों में से ग़ज़ा के भीतर मात्र 66,607 ट्रक पहुँचने दिये गये जो कुल ट्रक की संख्या का मात्र 35% है। इज़रायली सैनिकों ने ख़ासतौर पर आवश्यक पौष्टिक तत्त्वों को ग़ज़ा की सीमा में जाने से रोका है। मसलन मीट, हरी सब्ज़ियाँ या डेयरी उत्पाद फ़िलिस्तीनी जनता तक बिल्कुल ही नहीं पहुँचने दिये जा रहे हैं। खानपान के संकट और बुनियादी सुविधाओं की आपूर्ति पर रोक की वजह से लोग भयंकर संकट का सामना कर रहें हैं। इज़रायली सेटलर औपनिवेशिक ताक़तों द्वारा ग़ज़ा में भूख को भी एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

जहाँ एक तरफ़ हमास ने सभी इज़रायली बन्धकों को वापस करने की शर्तें मानते हुए उन्हें रिहा किया तो वहीं दूसरी तरफ़ इज़रायल “सीज़फ़ायर” की इस शर्त से भी धीरे-धीरे मुकर गया। सभी पुराने बन्दियों को न तो इज़रायली जेलों से रिहा किया गया न ही उनपर किये जा रहे ज़ुल्म में कोई कमी की गयी। बीते एक सालों में तक़रीबन 200 से अधिक फ़िलिस्तीनी नागरिकों को नये सिरे से बन्धक बनाया जा चुका है।

ऑक्युपाइड वेस्ट बैंक और ईस्ट यरूशलम में पिछले 24 सालों के दौरान फ़िलिस्तीनियों की क़ब्ज़ा की गयी ज़मीन पर अवैध इज़रायली बस्तियों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गयी है और बीते तीन सालों में इनकी संख्या में कहीं अधिक बढ़ोतरी हुई है। नेतन्याहू द्वारा खुलेआम इस बात का ऐलान किया गया है कि इज़रायली सैनिक पीली रेखा से आगे बढ़ें और कब्ज़ाक्षेत्र को विस्तारित करें।

“सीज़फ़ायर” और “शान्ति समझौते” जैसी घोषणाएं एक बार फिर साम्राज्यवादी साज़िश साबित हुई है। ज़ायनवादी उपनिवेशवादी सेटलर्स और साम्राज्यवादी अमेरिका दुनियाभर में फ़िलिस्तीनी-मुक्ति के समर्थन में बढ़ते जनान्दोलन से भयाक्रांत थे और इससे निजात पाने के लिए ही उन्होंने “सीज़फ़ायर” की नौटंकी की। यह सच्चाई दिन-ब-दिन हमारे सामने खुलती जा रही है। इज़रायली नेताओं के बयान को ही देख लें तो यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि “सीज़फ़ायर” का अर्थ उनके लिए कहीं से भी शान्ति या नरसंहार को रोकना नहीं था बल्कि बिना किसी रुकावट के हमलों को जारी रखना था। इज़रायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बेन-ग्विर का हालिया बयान न सिर्फ़ सेटलर्स की मंशा को नंगे तौर पर उजागर करता है बल्कि ज़ायनवादियों की क्रूरता और अमानवीयता का भी चरम उदाहरण है। बेन-ग्विर ने कहा कि “हम ग़ज़ा में योजनाबद्ध तरीक़े से हर रात 30 से 40 फ़ीसदी फिलिस्तीनियों का क़त्ल कर रहें हैं। सिर्फ़ उन्हें ही नहीं मारा जा रहा जिनसे हम तात्कालिक तौर पर कोई ख़तरा महसूस कर रहें हैं बल्कि उन सभी को, जो वहाँ मौजूद हैं, उन्हें जीने का कोई हक़ नहीं है, वो इन्सान नहीं हैं।” इस तरह का यह पहला बयान नहीं है जो इज़रायली नेताओं ने दिया है। इससे पहले भी फ़िलिस्तीन में क़त्लेआम और हिंसा को अंजाम देने के लिए भड़काऊ और घिनौने भाषण दिये जाते रहें हैं। यह हालिया बयान इस बात की स्पष्ट अभिव्यक्ति है कि  “20 प्वाइण्ट सीज़फ़ायर प्लान” एक और साम्राज्यवादी फ़रेब से अधिक कुछ नहीं था। यह अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर फ़िलिस्तीनी-मुक्ति के लिये जारी जन आन्दोलन को रोकने और लोगों के गुस्से को शान्त करने का एक ज़रिया था ताकि साम्राज्यवादी क़ब्ज़े को विस्तार देने का काम बेरोकटोक किया जा सके।

आने वाले 7 अक्टूबर को फ़िलिस्तीनियों पर लगातार जारी इज़रायली नरसंहार के 3 वर्ष हो जायेंगे। इन तीन सालों में फ़िलिस्तीनी अवाम ने अपनी बहादुरी और साहस का परिचय पूरी दुनिया को दिया है। साम्राज्यवादी और ज़ायनवादी हत्यारों ने मिलकर भले ही फ़िलिस्तीन को मलबे के ढ़ेर में तब्दील कर दिया हो मगर वे लोगों की उम्मीद, उनके सपनों को तोड़ नहीं पाये हैं। यही कारण है कि आज भी इज़रायली हत्यारी ताक़तें सभी उन्नत हथियारों से लैस होने के बावजूद निहत्थे फ़िलिस्तीनी नागरिक और बच्चों तक से भयभीत रहती है। इसका ताज़ा उदाहरण ज़ायनवादियों द्वारा पतंग उड़ाने पर लगाया गया प्रतिबन्ध है। इज़रायल के “रक्षा” मंत्री यिसराएल काट्ज़ ने कहा कि “पतंग, ड्रोन से अलग नहीं है और हम पतंग उड़ाने को युद्ध की कार्रवाई मानेंगे”! इज़रायली रक्षा मंत्री का यह बयान उन्नत हथियारों और तकनीकों से लैस एक औपनिवेशिक राज्यसत्ता के डर और कायरता को बयां करता है।

पतंग उड़ाने के कारण ग़ज़ा में पहले ही 4 साल की एक बच्ची और दो अन्य लोगों को ज़ायनवादी हत्यारों ने मार डाला। ये उन हज़ारों बच्चों में से तीन ऐसे बच्चे हैं जिनको मारने के लिए इज़रायली सेना ने सबसे आधुनिक और सटीक निशाना लगाने वाले हथियार का इस्तेमाल किया था।

21वीं सदी के सबसे बर्बर नरसंहार को अंजाम देने वाले इज़रायली हत्यारे पतंग उड़ाने वाले छोटे बच्चों को युद्ध-अपराधी के तौर पर पेश करना चाहते हैं। स्कूलों और कॉलेजों को मलबे में तब्दील करने वाले फ़िलिस्तीनी बच्चों से पतंग जैसी मामूली से मामूली चीज़ भी छीन लेना चाहते हैं! उनका कहना है कि गुब्बारे और पतंग सीमा के पार अवैध ढंग से रह रहे इज़रायली सेटलर्स के लिए “सुरक्षा का ख़तरा” पैदा कर सकते हैं! इसलिए अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए उन्हें बच्चों के खेल, खिलौने तक को प्रतिबन्धित करना पड़ रहा है। ज़ायनवादी उपनिवेशवादी हत्यारे चाहे कितने ही प्रतिबन्ध लगा लें, कितनी ही दरिंदगी और निर्ममता को अंजाम दे दें लेकिन उनके भय की खाई कम होने की जगह और गहरी होती जा रही है।

ठीक ऐसी ही स्थिति भारत में सत्तासीन फ़ासीवादी मोदी सरकार की है। जहाँ एक तरफ़ भारत सरकार आधिकारिक तौर पर फ़िलिस्तीन की मुक्ति का समर्थन करती है, यूएन में इज़रायली हमलों के ख़िलाफ़ वोट करती है, वहीं दूसरी तरफ़ इनकी असलियत तब सामने आती है जब यह अपने ही देश में फ़िलिस्तीन के समर्थन में बोलने वाले आम छात्रों व नागरिकों पर पुलिसिया बर्बरता करती है, उनके ऊपर झूठे मुक़दमे और फ़र्ज़ी एफ़आईआर करती है। एक ऐसी ही हालिया घटना मुम्बई में सामने आयी। 15 सितम्बर को फ़िलिस्तीन के साथ एकजुट भारतीय जन (IPSP) और बीडीएस इन इण्डिया (bdsinindia) की तरफ़ से फ़िलिस्तीनी बच्चों के समर्थन में एक देशव्यापी पतंगबाज़ी का कार्यक्रम रखा गया था। इस कार्यक्रम के महज़ तीन दिन बाद 18 सितम्बर को मुम्बई में आईपीएसपी के कुछ कार्यकर्ताओं को पुलिस पूरे दिन पूछताछ के सिलसिले में हिरासत में रखती है। इसके साथ ही एक महिला कार्यकर्ता के घर पहुँचकर बिना किसी सर्च वारण्ट के 9 घण्टे तक उसके घर की मुम्बई पुलिस द्वारा तलाशी ली जाती है, उसे डराया और धमकाया जाता है। इससे पहले भी मोदी सरकार ने फ़िलिस्तीन के समर्थन में आवाज़ उठाने वाले लोगों को चुप कराया है। अलग-अलग कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में फ़िलिस्तीन के समर्थन में होने वाले कार्यक्रमों को रद्द करवाना हो या फिर छात्रों, आम नागरिकों पर झूठे मुक़दमे लगाना हो, यह मोदी राज में आम ज़मीनी परिघटना बनती जा रही है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आख़िर भारत में फ़िलिस्तीन के समर्थन में बोलना अपराध कब से हो गया? अगर यह अपराध है तो सबसे पहले क्या मोदी सरकार ख़ुद अपराधी साबित नहीं होगी? या फिर फ़िलिस्तीन के समर्थन में मोदी सरकार सिर्फ़ दिखावे के लिए ज़बानी जमाख़र्च कर रही है जबकि उसकी असल यारी इज़रायली ज़ायनवादियों के साथ है? हालात तो यही बयां करते हैं कि मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद से भारत की मित्रता इज़रायली सेटलर कोलोनियल स्टेट के साथ कहीं अधिक प्रगाढ़ हुई है। जब दुनिया के अधिकांश देश इज़रायली नरसंहार को रोकने के लिए क़दम उठा रहें हैं तब ऐसे वक़्त में मोदी सरकार एक हत्यारे राज्य के साथ अपनी गलबहियाँ कर रही है चाहे वह हथियारों के सौदों के ज़रिये हो या फ़िर अन्य राजनीतिक और कूटनीतिक समझौतों का बढ़ना हो। यह साफ़ दिखलाता है कि भारत के फ़ासीवादीयों की नैसर्गिक एकता ज़ायनवादी इज़रायल के साथ है और इसलिए ही वे भारत में फ़िलिस्तीन समर्थकों के ख़िलाफ़ हर क़िस्म की ग़ैर-क़ानूनी कार्रवाई कर रहे  हैं ताकि उन्हें डराया और चुप कराया जा सके। मगर इज़रायली सेटलर्स की तरह ही यह फ़ासीवादी मोदी सरकार की एक कायराना हरक़त है और यह दरअसल सत्ताधारियों के भय को ही दिखलाता है। फ़िलिस्तीन का मुक्ति के लिए जारी संघर्ष दमन के तमाम तरीक़ों से रोका नहीं जा सकता है और जल्द ही यह साम्राज्यवादी शक्तियों के विनाश का कारण भी बनेगा।

 

मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026

 

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