चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति के कमाण्डर-इन-चीफ़ लू शुन के जन्मदिवस (25 सितम्बर) के मौक़े पर
अतिरिक्त ज्ञान

लू-शुन

दुनिया में अतिरिक्त उत्पादन के कारण आर्थिक संकट पैदा हो गया है। हालाँकि तीन करोड़ से भी ज़्यादा मज़दूर भूखे मर रहे हैं पर खाद्यान्न का अतिरिक्त भण्डार एक “वस्तुगत सच्चाई” है। ऐसा न होता तो अमेरीका हमें गेहूँ उधार नहीं दे पाता और हमें “ज़बरदस्त फसल की आपदा” नहीं झेलनी पड़ती।

लेकिन ज्ञान भी अतिरिक्त हो सकता है जिसके चलते और भी गम्भीर संकट पैदा हो जाता है। कहा जा रहा है कि आज गाँवों में शिक्षा का जितना ही विस्तार होगा, देहातों की कंगाली ही उतनी तेज़ी से होगी। निस्सन्देह यह एक ज़बरदस्त मानसिक फसल की आपदा है। कपास बेहद सस्ती हो गयी है इसलिए अमेरीकी अपने यहाँ कपास के खेतों को ही ख़त्म कर रहे हैं। इसी तरह चीन को भी ज्ञान का ख़ात्मा कर देना चाहिए। यह पश्चिम से सीखा गया एक बेहतरीन नुस्ख़ा है।

पश्चिमी लोग बड़े क़ाबिल हैं। पाँच-छह साल पहले जर्मनी वालों ने शिकायत की कि उनके यहाँ कॉलेजों में छात्र-छात्राओं की तादाद बहुत ज़्यादा हो गयी है और कई राजनीतिज्ञों तथा शिक्षाशास्त्रियों ने युवाओं को यह सलाह देने के लिए ख़ास शोर-शराबा किया कि उन्हें विश्वविद्यालयों में दाख़िला नहीं लेना चाहिए। आज जर्मनी में ये न केवल यह सलाह दे रहे हैं, बल्कि ज्ञान को समाप्त करने की प्रक्रिया भी शुरू कर चुके हैं। वे चुन-चुन कर किताबें जला रहे हैं, लेखकों को अपनी पाण्डुलिपियाँ निगल जाने का हुक्म दे रहे हैं और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के समूहों को लेबर कैम्पों में बन्द कर रहे हैं- इसे “बेरोज़गारी की समस्या के समाधान” के रूप में जाना जाता है।

क्या आज  चीन से भी यह शिकायत नहीं की जा रही है कि क़ानून और कला के विषयों में बहुत अधिक विद्यार्थी हो गये हैं? यही नहीं, हमारे यहाँ तो हाई स्कूल के विद्यार्थी भी बहुत ज़्यादा है। इसलिए एक “सख़्त” परीक्षा प्रणाली को लोहे के झाड़ू की तरह चलाये जाने की ज़रूरत है सड़ाक, सड़ाक, सड़ाक, सभी फालतू युवा बुद्धिजीवियों को बुहार कर “जनसाधारण” के ढेर में गिरा देना चाहिए।

अतिरिक्त ज्ञान से संकट कैसे हो सकता है? क्या यह एक तथ्य नहीं है कि क़रीब नब्बे प्रतिशत चीनी जनता निरक्षर है? हाँ! लेकिन अतिरिक्त ज्ञान भी एक “वस्तुगत सच्चाई”  है और इससे पैदा होने वाला संकट भी। जब ज़रूरत से ज़्यादा आपके पास ज्ञान हो जाता तो आप या तो बहुत ज़्यादा कल्पनाशील हो जाते हैं या बहुत ज़्यादा नरमदिल। अगर आप बहुत ज़्यादा कल्पनाशील होंगे तो आप बहुत ज़्यादा सोचेंगे। अगर आप बहुत ज़्यादा नरमदिल होंगे तो आप निर्मम नहीं हो पायेंगे या तो आप अपना सन्तुलन खो बैठेंगे या फिर दूसरों के सन्तुलन के साथ छेड़छाड़ करेंगे, और इसी तरह आपदा आती है। इसीलिए ज्ञान को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए।

लेकिन सिर्फ़ ज्ञान को ख़त्म करना ही काफ़ी नहीं है। उचित व्यावहारिक शिक्षा भी ज़रूरी है। पहली ज़रूरत है एक भाग्यवादी दर्शन – लोगों को ख़ुद की नियति के हाथों में छोड़ देना चाहिए और अगर उनका भाग्य दुःख भरा हो तो भी उन्हें सन्तुष्ट रहना चाहिए। दूसरी ज़रूरत है मतलबपरस्ती में महारत। हवा का रुख़ पहचानो और आधुनिक हथियारों की ताक़त के बारे में जानो। कम से कम इन व्यावहारिक पाठ्यक्रमों को तुरन्त बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इन्हें बढ़ावा देने का तरीक़ा बड़ा सीधा-सादा है।

पुराने ज़माने में भाववाद का विरोध करने वाले एक दार्शनिक का कहना था कि अगर तुम्हें इसमें सन्देह है कि आटे के कटोरे का अस्तित्व है या नहीं, तो तुम इसे खा लो और देखो कि तुम सन्तुष्ट महसूस करते हो या नहीं। इसलिए अगर आप लोगों को बिजली के बारे में समझाना चाहते हैं तो आप उन्हें बिजली का झटका देकर देख सकते हैं कि उन्हें चोट लगती है या नहीं। अगर आप उन्हें हवाई जहाजों या ऐसी ही चीज़ों के कारनामों से प्रभावित करना चाहते हैं तो आप उनके सिरों के ऊपर से हवाई जहाज़ उड़ा कर बम गिरा सकते हैं, यह देखने के लिए कि वे मरते हैं या नहीं…. इस तरह की व्यावहारिक शिक्षा हो तो अतिरिक्त ज्ञान की समस्या कभी होगी ही नहीं। आमीन।

रचनाकाल-1933

मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026

 

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