जन साहित्यकार एदुआर्दो गालिआनो के जन्मदिवस (3 सितम्बर) पर उनकी रचनाओं से दो अंश
दुनिया
कोलम्बिया के सागर तट पर, नेगुआ शहर का एक आदमी आसमान में ऊपर चढ़ जाने में कामयाब हो गया।
वापस लौटने पर उसने अपनी यात्रा का वर्णन किया। उसने बताया कि ऊँचाई से कैसे उसने मानव जीवन का अवलोकन किया। उसने बताया कि हम छोटी-छोटी लपटों के सागर हैं।
उसने यह रहस्योदघाटन किया, “यह दुनिया लोगों का एक ढेर है, छोटी-छोटी लपटों का सागर है।”
हर व्यक्ति अपनी ख़ुद की रोशनी से चमकता है। कोई भी दो लपटें एकसमान नहीं होतीं। छोटी लपटें हैं और बड़ी लपटें हैं, हर रंग की लपटें हैं। कुछ लोगों की लपटें इतनी स्थिर हैं कि वे हवा में फड़फड़ाती तक नहीं, जबकि कुछ की उग्र लपटें हैं जो हवा को स्फुलिंगों से भर देती हैं। कुछ गावदी लपटें हैं जो न जलती हैं न रोशनी देती हैं, लेकिन कुछ दूसरी इतनी प्रचण्डता के साथ ज़िन्दगी से धधकती रहती हैं कि कोई बिना पलक झपकाये उनकी ओर देख नहीं सकता और अगर कोई उनके पास जाता है तो आग में चमकने लगता है।
साहित्य को इस ग़ुलाम समाज की आज़ादी की लड़ाई की उम्मीद बनना होगा
तो लोगों को झकझोर कर जगा देने और उन्हें आस-पास की सच्चाई से रू-ब-रू करने का काम कैसे किया जाये? जब दुनिया इस दौर के कठिन हालात से रू-ब-रू है तो क्या साहित्य हमारे काम आ सकता है? संस्कृति का जो रूप सरकारें लेकर आती हैं वह तो सत्ता में बैठे चन्द लोगों के लिए ही है- यह सरकारी संस्कृति बर्बर व्यवस्था को ‘विकास’ और ‘मानवता’ का चेहरा देकर लोगों को गुमराह करती और व्यवस्था का ग़ुलाम बना देती है- ऐसे में अपनी क़लम से नयी दुनिया का राह बनाने वाला लेखक ‘सब ठीक है’ जैसे झूठे दावों पर टिकी व्यवस्था से कैसे लड़े? ऐसे समय में जब हम अपनी अलग-अलग इच्छाओं और सपनों के साथ एक-दूसरे को सिर्फ़ फ़ायदे और नुकसान के नज़रिये से देख-समझ और परख पा रहे हैं तब सबको साथ लेकर चलने और दुनिया की तस्वीर बदलने का ख़्वाब संजोने वाले साहित्य की क्या भूमिका हो? हमारे आस-पास के हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लिखना और कुछ नहीं बल्कि एक के बाद दूसरी समस्याओं की बात करना और उनसे भिड़ना हो गया है- तब हमारा लिखना किन लोगों के ख़िलाफ़ और किनके लिए हो? लातिन अमेरिका में हम जैसे लेखकों की क़िस्मत और सफ़र बहुत हद तक बड़े सामाजिक बदलावों की ज़रूरत से सीधे-सीधे जुड़ा है- लिखना इस बदलाव के लिए लड़ना ही है क्योंकि यह तो तय है कि जब तक ग़रीबी, अशिक्षा और टी.वी. तथा बाक़ी संचार माध्यमों के फैलते जाल पर बैठी सत्ता का राज क़ायम रहेगा तब तक हमारी सबसे जुड़ने और सबके साथ लड़ने की सभी कोशिशें बेकार ही रहने वाली हैं।
जब किसानों-मज़दूरों सहित आबादी के बड़े हिस्से की आज़ादी ख़त्म की जा रही है तब सिर्फ़ लेखकों के लिए कुछ रियायतों या सुविधाओं की बात से मैं सहमत नही हूँ। व्यवस्था में बड़े बदलावों से ही हमारी आवाज़ अभिजात महफ़िलों से निकल कर खुले और छिपे सभी प्रतिबन्धों को भेद कर उस जनता तक पहुँचेगी जिसे हमारी ज़रूरत है और जिसकी लड़ाई का हिस्सा हमें बनना है। अभी के दौर में तो साहित्य को इस ग़ुलाम समाज की आज़ादी की लड़ाई की उम्मीद ही बनना है।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026














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