हरियाणा के सफ़ाई कर्मचारियों की जुझारू हड़ताल समाप्त—16 सूत्री माँगों पर समझौता!
लेकिन भाजपा सरकार की वायदाख़िलाफ़ी से रहना होगा सावधान!
हरियाणा में मई माह की हड़ताल के दौरान हुए समझौते से सरकार के मुकर जाने के बाद 6 अगस्त से सफ़ाई कर्मचारी और अग्निशमनकर्मी दोबारा भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ हड़ताल पर थे। इससे पहले मई माह में भी कर्मचारी यूनियन ने 14 दिनों तक हड़ताल की थी। इस हड़ताल के दौरान 13 मई को सरकार और कर्मचारी यूनियन के बीच हुई बातचीत में उनकी 22 सूत्री माँगों में से 17 माँगों पर सहमति बनी थी और सरकार ने इन्हें 30 जून तक लागू करने का भरोसा दिया था। लेकिन जैसे ही कर्मचारियों ने हड़ताल स्थगित कर काम पर वापसी की, सरकार ने अपने वायदों से मुकरना शुरू कर दिया। यह भाजपा सरकार की पुरानी चाल रही है।
इसी वजह से अगस्त माह के पहले सप्ताह से हरियाणा की नगर पालिकाओं, नगर निगमों और नगर परिषदों से जुड़े हज़ारों कर्मचारी हड़ताल पर चले गये। हरियाणा की नगर पालिकाओं, नगर निगमों और नगर परिषदों में क़रीब 35 हज़ार कर्मचारी हैं। इन कर्मचारियों में पक्के कर्मचारियों की संख्या नाममात्र की है। ज़्यादातर कर्मचारी पे-रोल और डोर-टू-डोर कूड़ा उठाने वाली ठेका कम्पनियों के ठेका मज़दूर हैं।
कर्मचारियों की प्रमुख माँगों में कच्चे कर्मचारियों को पक्का करना, न्यूनतम वेतन 30,000 रुपये करना और समान काम के लिए समान वेतन लागू करना आदि माँगें शामिल थीं। साथ ही, अग्निशमन कर्मचारी यूनियन ने भी अपने साथियों के साथ न्याय की माँग को लेकर हड़ताल में भाग लिया। उनकी प्रमुख माँगों में 16 फ़रवरी को फ़रीदाबाद में हुई आगजनी की घटना में मारे गये दो कर्मचारियों को शहीद का दर्जा देना और उनके परिवारों को एक करोड़ रुपये का मुआवज़ा देना शामिल था।
37 दिनों तक चली इस हड़ताल के दौरान भाजपा सरकार हड़ताल को तोड़ने के लिए पुलिस-प्रशासन से लेकर सरकारी दलालों तक का इस्तेमाल करती रही। हिसार-हांसी से लेकर सिरसा तक सफ़ाईकर्मी महिलाओं के साथ पुलिस द्वारा ज़ोर-ज़बरदस्ती की गयी और उन्हें रात-रात भर पुलिस हिरासत में रखा गया। असल में सरकार डरा-धमकाकर हड़ताल को तोड़ना चाहती थी। लेकिन महिला मज़दूरों ने सड़कों पर पूरी चौकसी के साथ मोर्चा सम्भाले रखा और हड़ताल को तोड़ने व कमज़ोर करने के सरकार के सारे मंसूबों को नाकाम कर दिया। इसके बाद भाजपा सरकार ने 5 सितम्बर को एस्मा (ESMA) के तहत कार्रवाई करते हुए हड़ताल को तोड़ने की कोशिश की जिसमें सैकड़ों कर्मचारियों को निलम्बित किया गया और कई मज़दूर नेताओं को काम में बाधा डालने के नाम पर जेल में डाल दिया गया। लेकिन मज़दूरों पर चले इस दमनचक्र के बावजूद हड़ताल कर रहे मज़दूरों का हौसला नहीं टूटा।
10 सितम्बर से हड़ताल कर रहे मज़दूरों ने जनसमर्थन जुटाने के लिए शहरों की कॉलोनियों में अभियान शुरू कर दिया। साथ ही, यूनियन द्वारा 13 सितम्बर को कुरुक्षेत्र में होने वाली महापंचायत में अन्य मज़दूर-कर्मचारी संगठनों तथा छात्र-युवा संगठनों से शामिल होने की अपील की गयी। हड़ताल के पक्ष में बढ़ते जनसमर्थन और उसके दबाव में हरियाणा सरकार ने 11 सितम्बर को यूनियन प्रतिनिधियों से वार्ता की और 16 सूत्री माँगों पर समझौता किया।
ज़ाहिरा तौर पर यह सफ़ाई कर्मचारी आन्दोलन की एक बड़ी जीत हो सकती है यदि नायब सिंह सैनी सरकार इन सभी माँगों को पूरी तरह लागू करती है तो। लेकिन भाजपा का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड वायदों से मुकरने का रहा है। इसलिए मज़दूरों और यूनियन को चौकस रहना होगा और लगातार सड़क के आन्दोलन की तैयारी रखनी होगी। वहीं इस समझौते के लागू होने पर पे-रोल पर कार्यरत अस्थायी कर्मचारियों के पक्का होने का रास्ता ज़रूर खुलता है। मगर इस हड़ताल में बड़ी संख्या में ठेका मज़दूर भी शामिल थे, जिनके सम्बन्ध में समझौते में सरकार ने यूनियन से कोई ठोस बात नहीं की है।
हड़ताल को समर्थन दे रही ‘नौजवान भारत सभा’ और ‘भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी’ ने भी यूनियन नेताओं को सुझाव दिया है कि चूँकि हड़ताल में ठेका प्रथा ख़त्म करने की माँग एक प्रमुख माँग थी, ऐसे में यूनियन नेतृत्व को ठेका मज़दूरों को कम-से-कम सरकार के पे-रोल पर लाने की माँग पर अड़ना चाहिए। क्योंकि सफ़ाई मज़दूरों में सबसे ज़्यादा शोषण का शिकार यही ठेका मज़दूर होते हैं।
वहीं, हड़ताल ख़त्म होने के अगले दिन ही ठेका कम्पनियों की मनमानी सामने आने लगी। लगभग 10 से ज़्यादा नगर पालिकाओं और परिषदों में हड़ताल पर गये ठेका मज़दूरों को काम पर लेने से मना कर दिया गया। ऐसे में यूनियन को सरकार को चेतावनी देनी चाहिए कि सभी मज़दूरों को वापस काम पर लिया जाये और निश्चित समय-सीमा के भीतर ठेका कम्पनियों को हटाकर इन ठेका मज़दूरों को पक्का किया जाये।
ठेका व्यवस्था के ज़रिये सफ़ाई कर्मचारियों का खुला शोषण।
हड़ताल में शामिल डोर-टू-डोर कम्पनी में कार्यरत एक सफ़ाईकर्मी ने बताया कि नगर पालिका में पिछले 10–12 वर्षों से बड़ी संख्या में कच्चे और ठेका कर्मचारी काम कर रहे हैं। कलायत नगर पालिका डोर-टू-डोर सफ़ाई के लिए ठेकेदार को क़रीब 25 लाख रुपये प्रति माह देती है और सफ़ाई व्यवस्था के नाम पर क़रीब 10 लाख रुपये अलग से दिये जाते हैं। यानी कुल मिलाकर हर महीने क़रीब 35 लाख रुपये ठेकेदार के पास जाते हैं। इसके बावजूद ठेका कम्पनी मज़दूरों को पूरा मेहनताना देने के बजाय उनके हिस्से में महज़ 12–13 हज़ार रुपये महीना डालती है। बाक़ी रक़म ठेकेदारों की जेब में जाती है। इस तरह सरकार के पैसे से ठेकेदार मोटा मुनाफ़ा कमा रहे हैं और उसकी क़ीमत सफ़ाई मज़दूरों को अपने ख़ून-पसीने से चुकानी पड़ रही है।
हरियाणा की नगर पालिकाओं, नगर परिषदों और नगर निगमों के तहत प्रदेश के क़रीब 80 शहरों और 6,754 गाँवों में लगभग 35 हज़ार सफ़ाई कर्मचारी काम करते हैं। हरियाणा की क़रीब ढाई करोड़ आबादी के लिहाज़ से आबादी के अनुपात में लगभग 62 हज़ार सफ़ाई कर्मचारियों की ज़रूरत है। यानी सरकार ज़रूरत के मुकाबले क़रीब आधे सफ़ाई कर्मचारियों से ही पूरे प्रदेश की सफ़ाई व्यवस्था का बोझ उठवा रही है। उसमें भी बड़ी संख्या में कर्मचारी अस्थायी और ठेका व्यवस्था के तहत काम करने को मजबूर हैं।
सफ़ाई मज़दूरों को कई जगह बिना दस्ताने, मास्क, बूट और दूसरे ज़रूरी सुरक्षा उपकरणों के काम करना पड़ता है। गन्दगी और ज़हरीले पदार्थों के लगातार सम्पर्क में रहने से अनेक मज़दूर गम्भीर बीमारियों का शिकार होते हैं। वहीं, सीवर और गन्दे नालों में बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतज़ामात के उतरने वाले मज़दूर ज़हरीली गैसों का शिकार होकर अपनी जान तक गँवा देते हैं।
यूँ तो मोदी सरकार सफ़ाईकर्मियों के चरण धोने की नौटंकी करती है। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ जैसे तमाशों में तमाम खाये-पिये-अघाये भाजपाई हाथों में झाड़ू उठाकर फ़ोटो खिंचवाने का ढोंग करते हैं, लेकिन इस नौटंकी से आगे बढ़कर सफ़ाईकर्मियों के बदतर हालात की किसी को कोई फ़िक्र नहीं है। वहीं सरकार में बैठे कृष्णा बेदी जैसा अवसरवादी नेता भी हड़ताल के दौरान कर्मचारियों को सबक़ सिखाने और सख़्त कार्रवाई का आदेश देता रहा था। असल में जाति-आधारित पहचान की राजनीति करने वाले इन धोखेबाज़ नेताओं से कोई उम्मीद पालना बेमानी है। मेहनतकश वर्ग का हर आन्दोलन जात-पात के नाम पर खड़े किये गये नक़ली नेताओं की असली पहचान करवा देता है। हरियाणा के सफ़ाई कर्मचारियों के आन्दोलन को तोड़ने में भाजपा के दलित नेता ही ठेकेदार की भूमिका निभा रहे थे और उनके असली चेहरे हड़ताल के दौरान उजगार भी हो गये। इसलिए मेहनतकश वर्ग के संघर्ष में कमेरों की वर्गीय एकजुटता क़ायम रखनी चाहिए और लुटेरे वर्ग का पर्दाफाश करना चाहिए—चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो।
मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026














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