क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षणमाला – 34 : मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धान्त (खण्ड-2)
अध्याय-6
पूँजी का टर्नओवर (जारी)

अभिनव

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निवेशित पूँजी का सकल टर्नओवर

टर्नओवर के प्रश्न के समाधान के लिए बुनियादी अवधारणाओं को स्पष्ट करने के बाद, मार्क्स निवेशित पूँजी के कुल टर्नओवर के प्रश्न पर आते हैं। यह प्रश्न पूँजी के दूसरे खण्ड में हल किया जाने वाला एक प्रमुख प्रश्न है।

इस बिन्दु पर जो पहली ग़ौरतलब बात है वह यह है कि निवेशित पूँजी के विभिन्न तत्त्वों के पुनर्नवीकरण की अवधियाँ अलग-अलग होती हैं। यहाँ तक कि स्वयं चल पूँजी के भी सभी तत्त्वों के भौतिक पुनर्नवीकरण की अवधियाँ एक बराबर नहीं होती हैं। इसी प्रकार अचल पूँजी के विभिन्न तत्त्वों का भौतिक पुनर्नवीकरण अलग-अलग अन्तरालों पर करना पड़ता है। तो फिर प्रश्न यह उठता है कि समूची निवेशित पूँजी के कुल टर्नओवर और उसकी अवधि का आकलन कैसे किया जाये?

निवेशित पूँजी का सकल या कुल टर्नओवर वस्तुत: इसके विभिन्न अंगों के टर्नओवर का औसत होता है। हमें हरेक संघटक अंग के पुनर्नवीकरण की अवधि का आकलन करना होता है, उन सबका औसत निकालना होता है और इस प्रकार हमें कुल निवेशित पूँजी का सकल टर्नओवर प्राप्त हो जाता है। लेकिन यहाँ भी एक समस्या सामने आती है। हम यहाँ निवेशित पूँजी के इन विभिन्न हिस्सों के भौतिक पुनर्नवीकरण, यानी उपयोग-मूल्य के रूप में उनके पुनर्नवीकरण, पर विचार करें या उनके मूल्य के संचरण पर? मतलब, अचल पूँजी के तमाम तत्त्वों के भौतिक पुनर्नवीकरण का समय काफ़ी लम्बे अन्तराल के बाद आता है। लेकिन इस दौर में उत्पादन में उनकी घिसाई-दर के अनुसार उनका मूल्य संचरित होता रहा है, जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं। उसी प्रकार, अचल पूँजी के विभिन्न तत्त्वों का भौतिक पुनर्नवीकरण भी अलग-अलग तरीक़े से होता है। जैसे कि कुछ तत्त्वों को पूरा का पूरा नया ख़रीदा जाता है, जब वे पूरी तरह से इस्तेमाल हो जाते हैं। मसलन, मशीनें व विभिन्न श्रम के उपकरण। लेकिन कुछ चीज़ें नियमित मरम्मतों के दौरान अंशत: पुनर्नवीकृत होती रहती हैं, जैसे कि सड़कें, इमारतें, गोदाम, आदि। इसलिए भी जब हम पूँजी के सभी हिस्सों के औसत टर्नओवर का आकलन करते हैं, तो उनके भौतिक पुनर्नवीकरण या उनके गुणात्मक पहलू पर ध्यान नहीं केन्द्रित कर सकते हैं, बल्कि उनके मूल्य संचरण के पहलू पर या उनके परिमाणात्मक पहलू पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। दूसरे शब्दों में, हम उनके पुनर्नवीकरण का मूल्यांकन करते हुए उनके उपयोग–मूल्य वाले पहलू पर नहीं बल्कि मूल्य वाले पहलू पर विचार करते हैं। अन्यथा, निवेशित पूँजी के सभी अलग-अलग हिस्सों के टर्नओवर के औसत का, या, कुल निवेशित पूँजी के सकल टर्नओवर का मूल्यांकन ही लगभग असम्भव हो जायेगा।

यही कारण है कि जब हम कुल निवेशित पूँजी के सकल टर्नओवर का आकलन करते हैं तो हम M…M’, यानी मुद्रा-पूँजी के सर्किट का विश्लेषण करते हैं, न कि P…P’, यानी उत्पादक-पूँजी के सर्किट का, क्योंकि उत्पादक-पूँजी के सर्किट में हम पूँजी को उसके उत्पादक रूप, यानी उत्पादन के ठोस तत्त्वों या कारकों के रूप में देखते हैं, जबकि मुद्रा-पूँजी के सर्किट में हम उत्पादन के तत्त्वों के सभी गुणात्मक गुणों से अमूर्तन करते हैं, यानी उन्हें नज़रन्दाज़ करते हैं और केवल उनके मूल्य के पहलू पर विचार करते हैं। मुद्रा-पूँजी के सर्किट में हम उत्पादन के सभी कारकों के ख़र्च होने को केवल उनके मूल्य-रूप पर अपचयित करते हैं। इसलिए कुल निवेशित पूँजी के सकल टर्नओवर का विश्लेषण करते हुए हम केवल मुद्रा-पूँजी के सर्किट का ही उपयोग करते हैं। मार्क्स लिखते हैं:

“उत्पादन में प्रवेश करने वाली चल पूँजी अपना पूरा मूल्य उत्पाद में स्थानान्तरित कर देती है इसलिए अगर उत्पादन की प्रक्रिया को अबाधित रूप से जारी रखना होता है तो उसे उत्पाद की बिक्री के ज़रिये ठोस तौर पर लगातार पुनर्स्थापित किया जाना होता है। उत्पादन की प्रक्रिया में प्रवेश करने वाली अचल पूँजी केवल अपने मूल्य का एक हिस्सा (घिसाई) उत्पाद में स्थानान्तरित करती है, और उत्पादन-प्रक्रिया में अपनी घिसाई के बावजूद काम करना जारी रखती है; इसलिए उसे छोटे या लम्बे अन्तरालों के बाद बदलने की आवश्यकता होती है, किसी भी स्थिति में उसे चल पूँजी के तत्त्वों के जितना जल्दी बदलने की आवश्यकता नहीं होती। इनको बदलने की यह आवश्यकता, उनकी पुनरुत्पादन-अवधि, अचल पूँजी के विभिन्न संघटक तत्त्वों के लिए केवल परिमाणात्मक रूप से ही भिन्न नहीं होती। जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं, अचल पूँजी का एक हिस्सा, जो लम्बे समय तक स्थायित्व वाला होता है और कई सालों तक फ़िक्स्ड रहता है, उसे वार्षिक या उससे कम अन्तरालों पर बदला जा सकता है, और पुरानी अचल पूँजी में ही उसे वस्तु-रूप में जोड़ा जा सकता है; जबकि एक अलग प्रकार की अचल पूँजी के साथ यह होता है कि उसके जीवन के समापन पर एक बार में ही उसे पूरा का पूरा बदला जा सकता है।

“इसलिए यह अनिवार्य होता है कि अचल पूँजी के अलग-अलग टर्नओवरों को टर्नओवर के एक समान रूप पर अपचयित किया जाये, ताकि अपने टर्नओवर की अवधि के मामले में ये केवल परिमाणात्मक रूप में भिन्न हों।” (वही, पृ. 262, अनुवाद हमारा)

लेकिन ऐसा तभी सम्भव है जब औसत टर्नओवर का मूल्यांकन करते हुए पूँजी के तत्त्वों के उपयोग-मूल्य वाले गुणात्मक पहलू पर नहीं, बल्कि उनके मूल्य वाले परिमाणात्मक पहलू पर विचार किया जाये। इसके बाद मार्क्स बताते हैं कि निवेशित पूँजी के सकल टर्नओवर का आकलन कैसे किया जाता है। इसके लिए मार्क्स एक सरल उदाहरण का इस्तेमाल करते हैं। इस सरल उदाहरण से ही सकल टर्नओवर के आकलन की पद्धति स्पष्ट हो जाती है और उसे अधिक जटिल उदाहरणों पर भी लागू किया जा सकता है।

संघटक तत्त्व (i)  नवेशित पूँजी (ci) टर्नओवर की वार्षिक संख्या (ni) कुल टर्न ओवर (cini)
1 25,000 1/10 2,500
2 12,5000 1/2 6,250
3 12,5000 2 25,000
कुल C=50,000 औसत टर्न ओवर = 0.625 cn=33.750

यहाँ i निवेशित पूँजी के विभिन्न संघटक तत्त्वों को प्रदर्शित करता है। कुल निवेशित पूँजी C = 50,000 है। इसके संघटक तत्त्व हैं c1, c2 और c3। स्पष्ट है कि C = c1 + c2 + c3 है। यहाँ c1 = 25,000 और एक वर्ष में इस संघटक तत्त्व के टर्नओवरों की संख्या (n1) 1/10 है, यानी वह एक वर्ष में अपने मूल्य (25,000) का 1/10 हिस्सा उत्पाद के मूल्य में स्थानान्तरित करता है, यानी 2,500। दूसरे संघटक तत्त्व यानी c2 (=12,500) के साल भर में होने वाले कुल टर्नओवर की संख्या (n2) है 1/2, यानी वह साल भर में अपने मूल्य का आधा हिस्सा यानी 6,250 उत्पाद के मूल्य में स्थानान्तरित करता है। उसी प्रकार निवेशित पूँजी का तीसरा संघटक तत्त्व (c3) है 12,500 जबकि साल भर में उसके टर्नओवरों की संख्या (n3) है 2। यानी वह अपने पूरे मूल्य को दो दफ़ा उत्पाद के मूल्य में स्थानान्तरित करता है। यानी उसके द्वारा स्थानान्तरित मूल्य हुआ 25,000। इस प्रकार साल भर में निवेशित पूँजी के संघटक तत्त्वों द्वारा उत्पाद के मूल्य में जो कुल मूल्य स्थानान्तरित होता है वह है 33,750। इन आँकड़ों के आधार पर निवेशित पूँजी का औसत टर्नओवर निम्न प्रकार से आकलित किया जायेगा:

निवेशित पूँजी का औसत टर्नओवर (n) = सकल टर्नओवर (cn)/कुल निवेशित पूँजी (C)  = cn/C = 33,750/50,000 = 0.675।

अगर हम कुल निवेशित पूँजी का टर्नओवर पूर्ण होने की कुल अवधि की गणना करना चाहते हैं, तो चूँकि टर्नओवर की माप 1 वर्ष होती है इसलिए निवेशित पूँजी के औसत टर्नओवर द्वारा कुल निवेशित पूँजी के औसत टर्नओवर की अवधि की माप में भाग देंगे:

कुल निवेशित पूँजी के टर्नओवर का कुल समय = 1 वर्ष/0.675 = 1/0.675 = 1.48

यानी कुल निवेशित पूँजी का सकल टर्नओवर पूरा होने में 1.48 वर्ष का समय लगेगा। उपरोक्त पद्धति द्वारा हम किसी भी निवेशित पूँजी के सकल टर्नओवर और उसके पूर्ण होने में लगने वाले समय की गणना कर सकते हैं।

जैसा कि हम इस उदाहरण को देखकर समझ सकते हैं, कुल निवेशित पूँजी में से अचल पूँजी की टर्नओवर-अवधि कुल पूँजी के टर्नओवर-अवधि से ज़्यादा हो सकती है और आम तौर पर होती ही है। इसकी वजह यह होती है क्योंकि अचल पूँजी के एक टर्नओवर पूरा होने में चल पूँजी के कई टर्नओवर पूरे हो जाते हैं। अगर चल पूँजी के टर्नओवर की गति ज़्यादा हुई तो यह भी सम्भव है कि एक साल में टर्नओवर होने वाला, यानी मुद्रा-रूप में निवेशित होकर और फिर उत्पादित माल के बिकने पर मुद्रा-रूप में ही पूँजीपति के पास लौटने वाला कुल मूल्य कुल निवेशित पूँजी से ज़्यादा हो सकता है। दूसरे शब्दों में, कुल निवेशित पूँजी की टर्नओवर-अवधि एक वर्ष से कम हो सकती है। नतीजतन, अचल पूँजी के एक टर्नओवर में कई बार कुल निवेशित पूँजी के कई टर्नओवर शामिल होते हैं।

मार्क्स बताते हैं कि पूँजीवादी उत्पादन-पद्धति के विकास के साथ अचल पूँजी के तत्त्वों यानी मशीनों, उपकरणों आदि का टिकाऊपन बढ़ता जाता है। ऐसे में उसका टर्नओवर और भी लम्बा हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही पूँजीवादी उत्पादन-पद्धति के विकास के साथ एक और परिघटना भी घटित होती है, जो विपरीत गति को प्रदर्शित करती है। वह यह कि पूँजी की आपसी प्रतिस्पर्द्धा और पूँजी और श्रम के बीच के अन्तरविरोध के कारण तकनोलॉजी और मशीनरी के उन्नत होने की प्रक्रिया भी त्वरित होती जाती है और इसलिए मशीनें व उपकरण अपने भौतिक रूप से घिस जाने के पहले ही “नैतिक रूप से” घिस जाते हैं। यानी, नयी मशीनें व तकनोलॉजी उत्पादन में आ जाती हैं और हर पूँजीपति अपनी पुरानी मशीनों के भौतिक रूप से पूर्णत: घिसने के पहले ही ये नयी अधिक उन्नत मशीनें ख़रीदने और उन्हें उत्पादन में लगाने को मजबूर हो जाता है। कारण यह कि उसके विभिन्न प्रतिस्पर्द्धी पूँजीपति नयी मशीनों और नयी तकनोलॉजी को लगाकर श्रम की उत्पादकता को बढ़ा देते हैं, अपनी प्रति इकाई लागत को घटा देते हैं और क़ीमतों को कम रखने की प्रतिस्पर्द्धा में उससे आगे निकल जाते हैं। परिणामत: हर पूँजीपति के लिए यह वांछनीय हो जाता है कि वह उन्नततम मशीनों और तकनोलॉजी का इस्तेमाल करे और इसके लिए कई बार उसे अपनी पुरानी मशीनों को पूर्ण रूप से उपयोग योग्य न रह जाने के, यानी भौतिक रूप से पूर्णत: ख़र्च हो जाने के पहले ही हटाना पड़ता है। यानी, मशीनों की भौतिक मृत्यु यानी उपयोग–मूल्य के तौर पर उनकी मृत्यु से पहले ही उनकी “आत्मिक/नैतिक” मृत्यु, यानी मूल्य के रूप में उनका समापन हो जाता है। मार्क्स लिखते हैं:

“पूँजीवादी उत्पादन-पद्धति के विकास के साथ जिस सीमा तक उत्पादन में लगायी गयी अचल पूँजी का मूल्य और टिकाऊपन बढ़ते हैं, उसी हद तक हर विशिष्ट निवेश में उद्योग व औद्योगिक पूँजी का जीवन भी लम्बा होता जाता है, कई बार कई वर्षों तक, मान लें औसतन दस वर्षों तक। एक ओर अगर अचल पूँजी का विकास इस जीवन को लम्बा करता है, तो वहीं दूसरी ओर उत्पादन के साधनों के निरन्तर क्रान्तिकारी रूपान्तरण के कारण, जो स्वयं पूँजीवादी उत्पादन-पद्धति के विकास के साथ बढ़ता है, यह जीवन छोटा भी हो जाता है। यह उत्पादन के साधनों में भी बदलाव लाता है; उनके भौतिक रूप से चुक जाने से काफ़ी पहले ही, उनका नैतिक अवमूल्यन हो जाता है और इसलिए उन्हें लगातार बदलते रहना अनिवार्य हो जाता है।” (वही, पृ. 264, अनुवाद हमारा)

मार्क्स बताते हैं कि जब अचल पूँजी के विशाल तत्त्वों, जैसे कि इमारतों, भारी मशीनरों आदि को बदलने या पुनर्नवीकृत करने का समय आता है, मसलन 8-10 वर्षों में एक बार, तो उस समय पूँजीपति को उसके लिए भारी पूँजी निवेश करना पड़ता है। यह पूँजी या तो माल-उत्पाद के बार-बार बिकने के साथ अचल पूँजी के स्थानान्तरित मूल्य के वास्तवीकरण के ज़रिये उसके पास एकत्र होती जाती है जिसे एमॉर्टाइज़ेशन फ़ण्ड कहते हैं, या फिर अगर पूँजीपति एमॉर्टाइज़ेशन फ़ण्ड को किसी अन्य मद में ख़र्च कर देता है तो पूँजीवाद के उन्नत होने के साथ एक विकसित ऋण व्यवस्था के ज़रिये उधार के तौर पर उसे प्राप्त हो जाती है। इन दोनों में से किस रास्ते से उसे यह पूँजी प्राप्त होती है, इससे मसले की मूलभूत अन्तर्वस्तु व चरित्र पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता है, क्योंकि अन्तत: ऋण भी पूँजीपति अपने द्वारा विनियोजित बेशी मूल्य के एक हिस्से से ही चुकाता है और इससे केवल बेशी मूल्य के पूँजीपति वर्ग के विभिन्न हिस्सों में वितरण पर फ़र्क पड़ता है। बहरहाल, कुल सामाजिक पूँजी (यानी पूँजीवादी समाज में पूँजीपति वर्ग द्वारा निवेशित कुल पूँजी) के लिए ऐसी अवधियों की एक औसत के रूप में गणना की जा सकती है और सभी अर्थशास्त्री ऐसा करते हैं, जिन अवधियों के बाद आम तौर पर अचल पूँजी के तत्त्वों का पुनर्नवीकरण होता है। इन औसत अवधियों के पूर्ण होने पर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर अचल पूँजी के तत्त्वों की बदली होती है, बड़े पैमाने पर पूँजी निवेशित होती है और ये दौर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में एक अस्थायी उथल-पुथल लाते हैं क्योंकि इस दौरान भारी मात्रा में मुद्रा-पूँजी की आवश्यकता होती है। इसलिए कुल सामाजिक पूँजी के स्तर पर अचल पूँजी के औसत टर्नओवर के ये चक्र पूँजीवादी व्यवस्था के लिए एक नये चक्र की शुरुआत करते हैं। इन चक्रों को अर्थशास्त्र की भाषा में व्यवसाय-चक्र (business cycle) कहा जाता है।

यहाँ एक और बेहद अहम पहलू पर बात करना आवश्यक है। इन चक्रों को निर्धारित करने में पूँजीवादी व्यवस्था के मुनाफ़े की औसत दर की भी आधारभूत भूमिका होती है। जब मुनाफ़े की औसत दर ज़्यादा होती है और पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन का वेग भी आम तौर पर ज़्यादा होता है और नतीजतन उत्पादन के दौरान अचल पूँजी के तत्त्वों की घिसाई दर भी ज़्यादा होती है, तो वे जल्दी ख़र्च हो सकते हैं। साथ ही, इस दौर में मशीनों का नैतिक अवमूल्यन भी अधिक तेज़ रफ़्तार से होता है क्योंकि नयी तकनोलॉजी और मशीनों के आने की गति भी अपेक्षाकृत तेज़ होती है। वहीं मन्दी के दौर में उनके ख़र्च होने की दर आम तौर पर अपेक्षाकृत कम हो सकती है, हालाँकि बेकार खड़ी मशीनों का भी प्राकृतिक शक्तियों के कारण अवमूल्यन होता रहता है और अगर संकट दीर्घकालिक होता है तो संकट के अन्त तक अधिकांश मशीनें, यन्त्र, उपकरण आदि बेकार हो चुके होते हैं।

इसके निहितार्थ स्पष्ट हैं। मशीनों के ख़र्च होने की गति महज़ कोई भौतिक प्रक्रिया नहीं है जो केवल मशीनों के भौतिक टिकाऊपन से निर्धारित होती है। यानी, मशीनों के पूर्ण अवमूल्यन का रिश्ता केवल भौतिक तौर पर उनके जीवन-काल से नहीं होता। वास्तव में यह भौतिक जीवन-काल स्वयं पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में मुनाफ़े की औसत दर से निर्धारित होता है। तथाकथित मार्क्सवादी डेविड हार्वी को लगता है कि अचल पूँजी का अवमूल्यन और उनका पुनर्नवीकरण मुनाफ़े की औसत दर से स्वतन्त्र कोई कारक है जो पूर्णत: अचल पूँजी के तत्त्वों की भौतिक प्रकृति से निर्धारित होते हैं, और यही व्यवसाय-चक्र को निर्धारित करता है। लेकिन वास्तव में अचल पूँजी के अवमूल्यन की गति स्वयं पूँजीवादी उत्पादन की गति से निर्धारित होती है। मन्दी के दौर में यह अपेक्षाकृत कम गति से होता है, जबकि तेज़ी के दौर में यह अपेक्षाकृत अधिक गति से होता है। समूची अर्थव्यवस्था में अचल पूँजी के अवमूल्यन की औसत दर का कारणात्मक रिश्ता मुनाफ़े की औसत दर से होता है।

जब समूची अर्थव्यवस्था में अचल पूँजी के तत्त्वों, यानी मशीनों, उपकरणों आदि के पुनर्नवीकरण के दौर आते हैं, तो उस समय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर अचल पूँजी का निवेश होता है। दूसरी ओर, मन्दी या संकट के दौरों के बाद भी अक्सर अचल पूँजी के तत्त्वों के पुनर्नवीकरण के दौर आते हैं। ये दोनों ही कारक पूँजीवादी व्यवस्था में व्यवसाय–चक्रों को निर्धारित करते हैं। जैसा कि हम देख सकते हैं, दोनों ही स्थितियों में इन चक्रों को निर्धारित करने वाला बुनियादी तत्त्व मुनाफ़े की औसत दर है।

इसके बाद मार्क्स उन तीन कारकों पर आते हैं जो पूँजी के टर्नओवर और उसकी गति को प्रभावित करते हैं। ये कारक हैं कार्य-अवधि, उत्पादन-अवधि और संचरण-अवधि।

(अगले अंक में जारी)

मज़दूर बिगुल, सितम्बर 2026

 

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