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बढ़ रहे प्रदूषण के बीच मोदी सरकार की जुमलेबाज़ी और ख़राब होते मज़दूर वर्ग के हालात

भारत के कई शहर एक घने, ज़हरीले धुएँ की चादर से ढके हुए हैं जिससे आँखों में जलन और गले में खराश हो रही है। यह ज़हर न उम्र देखता है, न जाति-धर्म, न ही शक्ल-सूरत—यह लगातार साँस के ज़रिये हर किसी के फेफड़ों में समा रहा है। हाँ, एक तबका जिसके पास आर्थिक सामर्थ्य है वह इससे बचने की तात्कालिक कोशिशें ज़रूर कर रहा है। हाल के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में एयर प्यूरीफ़ायर की बिक्री में 72% की बढ़ोतरी हुई है, वहीं महाराष्ट्र 12% के साथ दूसरे स्थान पर रहा है। यानी बढ़ रहे प्रदूषण से फ़ायदा भी पूँजीपतियों को ही हो रहा है! कुछ ऐसे भी लोग हैं जो फिलहाल शहर छोड़कर पहाड़ियों और समन्दर के किनारे बसने चले गये हैं। ज़ाहिरा तौर पर प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचने की ऐसी कोशिशें देश की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी के लिए सम्भव नहीं।

अमीरों के पैदा किये प्रदूषण से मरती ग़रीब अाबादी

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार साल 2016 में प्रदूषण और ज़हरीली हवा की वजह से भारत में एक लाख बच्चों की मौत हुई, और दुनिया में छह लाख बच्चे मौत के मुँह में चले गये। कहने की ज़रूरत नहीं कि इनमें से ज़्यादातर ग़रीबों के बच्चे थे। मुम्बई, बैंगलोर, चेन्नई, कानपुर, त्रावणकोर, तूतीकोरिन, सहित तमाम ऐसे शहर हैं, जहाँ खतरनाक गैसों, अम्लों व धुएँ का उत्सर्जन करते प्लांट्स, फैक्ट्रीयाँ, बायोमेडिकल वेस्ट; प्लांट, रिफाइनरी आदि को तमाम पर्यावरण नियमों को ताक पर रखते हुए ठीक गरीब मेहनतकश मज़दूर बस्तियों में लगाया जाता है। आज तमाम ज़हरीले गैसों, अम्लों, धुएँ आदि के उत्सर्जन को रोकने अथवा उन्हें हानिरहित पदार्थों में बदलने, एसिड को बेअसर करने, कणिका तत्वों को माइक्रो फ़िल्टर से छानने जैसी तमाम तकनीकें विज्ञान के पास मौजूद हैं, लेकिन मुनाफे की अन्धी हवस में कम्पनियाँ न सिर्फ पर्यावरण नियमों का नंगा उल्लंघन करती हैं, बल्कि सरकारों, अधिकारियों को अपनी जेब में रखकर मनमाने ढंग से पर्यावरण नियमों को कमज़ोर करवाती हैं।