एक इंसान जैसी ज़िन्दगी जीने के लिए न्यूनतम मज़दूरी कितनी होनी चाहिए?
हमारे देश में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा अनौपचारिक मज़दूरों की औसत मासिक आय 10 से 12 हज़ार रुपये के क़रीब है! यह हमारी मानवीय गरिमा पर चोट नहीं है तो क्या है? हमें कीड़ा-मकोड़ा और कॉकरोच समझा जाता है। हमें न तो इंसान माना जाता है और न ही इंसानों जैसा बर्ताव हमारे साथ किया जाता है। पूँजीपतियों के लिए हम बोझा ढोने वाले पशुओं से ज़्यादा और कुछ नहीं हैं, जिन्हें बस जीने की ख़ुराक़ दे दी जाय और बदले में वे कमरतोड़ मेहनत कर धन्नासेठों की तिजोरियाँ भर सकें, उनकी औलादों की ऐय्याशियों का ख़र्च उठा सकें, उनकी सात पुश्तों का भविष्य सुरक्षित कर सकें, जबकि हमारे बच्चे हमेशा भूख और कुपोषण की रेखा पर जियें, दवा-इलाज से वंचित रहें, शिक्षा उनकी पहुँच से बाहर रहे और हम पुश्त-दर-पुश्त रोज़ ग़ुलामों के समान खटने का अभिशप्त हों।














Recent Comments