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फ़ासीवादी ताक़तों द्वारा इतिहास को विकृत करने का एक और प्रयास

इतिहास पर यह हमला कोई आकस्मिक घटना नहीं है। इतिहास को विकृत करना उस वृहद फ़ासीवादी परियोजना का अभिन्न हिस्सा है, जिसका उद्देश्य वास्तव में मुनाफ़े पर आधारित इस पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गयी तमाम समस्याओं और संकट के लिए एक नक़ली व काल्पनिक दुश्मन का निर्माण करना और फिर उससे ही इन समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराना और उस नक़ली दुश्मन के बहिष्कार तथा विरोध के आधार पर एक विशुद्ध विचारधारात्मक समुदाय-अर्थात् “आर्यन राइख” या “हिन्दू राष्ट्र” का निर्माण करना है। इसके ज़रिये ही फ़ासीवाद टुट्टपूंजिया वर्गों के संगठित प्रतिक्रियावादी आन्दोलन को विशिष्ट तौर पर बड़ी पूँजी की सेवा और आम तौर पर पूँजी की सेवा में सन्नद्ध करता है। लेकिन न तो यह तथाकथित “नक़ली दुश्मन” और न ही यह विशुद्ध विचारधारात्मक समुदाय, मसलन ‘हिन्दू राष्ट्र’, किसी वास्तविक ऐतिहासिक आधार पर मौजूद है। इसलिए एक ऐसे स्वर्णिम, अखण्ड अतीत की काल्पनिक तस्वीर गढ़ी जाती है, जिसमें उस विचारधारात्मक समुदाय को हमेशा से महान और एकीकृत दिखाया जाता है तथा उसके ऊपर किसी “दुश्मन” द्वारा किये गये पतनकारी हमले की कहानी प्रस्तुत की जाती है।