डीटीसी के कॉण्ट्रैक्ट कर्मचारियों का संघर्ष ज़िदाबाद!
डीटीसी के कॉण्ट्रैक्ट कर्मचारियों का संघर्ष ज़िदाबाद! मज़दूर एकता ज़िन्दाबाद! डीटीसी के बस चालक और कण्डक्टर बीते 16 नवम्बर से प्रदर्शनरत हैं। दिल्ली के भयंकर प्रदूषण और ठण्ड को झेलते…
डीटीसी के कॉण्ट्रैक्ट कर्मचारियों का संघर्ष ज़िदाबाद! मज़दूर एकता ज़िन्दाबाद! डीटीसी के बस चालक और कण्डक्टर बीते 16 नवम्बर से प्रदर्शनरत हैं। दिल्ली के भयंकर प्रदूषण और ठण्ड को झेलते…
विदा कॉमरेड सोहल! तनी मुट्ठियों से लाल सलाम! 20 अक्टूबर को कॉमरेड जगजीत सिंह सोहल का पटियाला में निधन हो गया। वे 96 वर्ष के थे। उनका जन्म संगरूर के…
Our position on Ambedkar, Phule and Ayyankali and their historical role and relevance to the anti-caste movement in the present times. We came across an Instagram post about our position…
आज के अनुभव ने सिद्ध कर दिया है कि मोदी-शाह की फ़ासिस्ट सत्ता किसी भी जुझारू जन-उभार की संभावना से थरथर काँप रही है। इसीलिए, देश के किसी भी कोने में होने वाले किसी जनांदोलन को कुचलने के लिए वह पुलिस और अर्धसैनिक बलों की पूरी ताक़त झोंक दे रही है, जेनुइन जनांदोलनों के नेताओं पर आतंकवाद और देशद्रोह आदि की धाराएँ लगाकर फर्जी मुकदमे ठोंक रही है और उनके ज़मानत तक नहीं होने दे रही है। लेकिन जैसाकि हमेशा होता है, किसी भी सत्ता का जनता से भय जितना अधिक बढ़ता जाता है, वह उतना ही नग्न-निरंकुश दमनकारी होती जाती है। जनता को डराने की एक हद जब पार हो जाती है तो फिर जनता धीरे-धीरे डरना बंद कर देती है। इतिहास के अध्येता जानते हैं कि जीना मुहाल होने पर और अपने सारे अधिकारों के छिनते जाने पर जनता सड़कों पर उतरती ही है। शुरूआती दौरों में सत्ता के दमन और आतंक के प्रभाव से वह दब और बिखर जाती है। लेकिन शोषण, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के विरुद्ध वह फिर -फिर सड़कों पर उतरती है। फिर सत्ता तंत्र का दमन भी बढ़ता जाता है और फिर ऐसा दौर आता है कि जनता डरना बंद कर देती है। सभी आततायी शासक उसी दिन के बारे में सोचकर भयाक्रांत हो जाते हैं।
दंगे भड़काने में जिन लोगों की स्पष्ट भूमिका थी, जिनके भड़काऊ़ बयानों के दर्जनों वीडियो हैं, अख़बारों में छपी ख़बरें हैं, ख़ुद पुलिस के अफ़सरों सहित सैकड़ों चश्मदीद गवाह हैं, उनकी गिरफ़्तारी तो दूर, उनको पूछताछ के लिए बुलाने का नोटिस भी नहीं दिया गया है। कपिल मिश्रा, प्रवेश वर्मा, रागिनी तिवारी जैसे लोगों की ओर पुलिस की नज़र भी नहीं गयी है। जिनकी छत से हथियार लहराते लोगों के वीडियो हैं उनसे पुलिस पूछने भी नहीं गयी है। जो लोग अनेक वीडियो में हिंसा करते नज़र आ रहे हैं उनकी पहचान करके पूछताछ करना पुलिस के “स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल” में नहीं आता है जिसकी दुहाई दिल्ली पुलिस के आला अफ़सर दे रहे हें।
ऐसी आलोचना से कुछ सीखा नहीं जा सकता; उल्टे उसकी मूर्खताओं का खण्डन करने में कुछ समय ही खर्च हो जाता है। लेकिन फिर भी, यदि आन्दोलन में ऐसे भोंपू लगातार बज रहे हों, जो कि वज्र मूर्खताओं की सतत् ब्रॉडकास्टिंग कर रहे हों, तो यह मार्क्स के शब्दों में बौद्धिक नैतिकता का प्रश्न बन जाता है और साथ ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं के शिक्षण-प्रशिक्षण का प्रश्न बन जाता है, कि इन मूर्खताओं का खण्डन सिलसिलेवार तरीके से और विस्तार से पेश किया जाय।
मार्क्स और उनके अभिन्न मित्र एंगेल्स ने सर्वहारा वर्ग के शोषण और पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में अन्तर्निहित अराजकता एवं अन्तरविरोधों को उजागर करते हुए यह दिखलाया कि किस तरह पूँजीपति द्वारा हड़पा जाने वाला अतिरिक्त मूल्य मज़दूरों के शोषण से आता है। उन्होंने राजनीति, साहित्य-कला-संस्कृति, सौन्दर्यशास्त्र, विधिशास्त्र, नीतिशास्त्र – सभी क्षेत्रों में चिन्तन एवं विश्लेषण की द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी पद्धति को स्थापित करके वैज्ञानिक समाजवाद के विचार को समृद्ध किया। मार्क्स और एंगेल्स ने अपने समय की पूँजीवादी क्रान्तियों, सर्वहारा संघर्षों और उपनिवेशों में जारी प्रतिरोध संघर्षों एवं राष्ट्रीय मुक्तियुद्धों का सार-संकलन किया, मज़दूर आन्दोलन को सिर्फ़ सुधारों तक सीमित रखकर मूल लक्ष्य से च्युत कर देने के अवसरवादियों के प्रयासों की धज्जियाँ उड़ा दीं, पूँजीवादी बुद्धिजीवियों और भितरघातियों की संयुक्त बौद्धिक शक्ति का मुक़ाबला करते हुए राज्य और क्रान्ति के बारे में मूल मार्क्सवादी स्थापनाओं को निरूपित किया और सर्वहारा वर्ग के दर्शन को समृद्ध करने के साथ ही उसे रणनीति एवं रणकौशलों की एक मंजूषा भी प्रदान की।
फ़्रेडरिक एंगेल्स का लेख ‘कार्ल मार्क्स’ और मार्क्स की क़ब्र पर दिया गया उनका भाषण तथा व्लादीमिर लेनिन का लेख ‘कार्ल मार्क्स’ मज़दूर वर्ग की मुक्ति का दर्शन देने वाले इस महान विचारक के जीवन और कार्यों की संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित जानकारी देते हैं। मार्क्स के सहयोगी और मज़दूर आन्दोलन के दो महान नेताओं पॉल लफ़ार्ग तथा विल्हेल्म लीबनेख़्त के आत्मीय संस्मरण मार्क्स के व्यक्तित्व के अन्तरंग पहलुओं को सामने लाने के साथ ही उनके सोचने और काम करने के तरीक़़े़े के बारे में भी बहुत कुछ सीखने और जानने में मदद करते हैं।
राज्य सत्ता की संगठित हिंसा की प्रतिरोधी प्रतिकारी शक्ति क्रांतिकारी संगठित हिंसा होती है। अतीत के दास विद्रोहों और किसान विद्रोहों पर भी यह बात किसी हद तक लागू होती है। अमेरिका और फ्रांस की महान बुर्जुआ जनवादी जनक्रांतियों ने अपनी लक्ष्य प्राप्ति के लिए बड़े पैमाने पर संगठित क्रांतिकारी हिंसा का सहारा लिया था। बीसवीं शताब्दी के सभी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों में क्रांतिकारी हिंसा या बल-प्रयोग की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका थी। बुर्जुआ राज्य सत्ता की संगठित हिंसा इतिहास में सर्वाधिक संगठित है और इसका प्रतिकार जनसमुदाय अपनी सारी शक्तियों को व्यापकतम स्तर पर, कुशलतम ढंग से और सूक्ष्मतम रूपों में संगठित करके ही कर सकता है। जनता द्वारा संगठित क्रांतिकारी, हिंसा या बल प्रयोग का सहारा लेना एक ऐतिहासिक अनिवार्यता होती है। जनता द्वारा बल-प्रयोग राज्य सत्ता द्वारा बल-प्रयोग का प्रतिकार होता है। बल द्वारा स्थापित एवं बल द्वारा संचालित सत्ता को बल द्वारा ही विस्थापित किया जा सकता है। यह गति का ऐतिहासिक नियम है, किसी व्यक्ति की इच्छा नहीं।
भाजपा और नरेन्द्र मोदी आज पूंजीपति वर्ग की ज़रूरत है। आज विश्वभर में आर्थिक मन्दी छायी हुई है जिसके कारण मालिकों का मुनाफा लगातार गिरता जा रहा है। ऐसे में मालिकों को ऐसी ही सरकार की ज़रूरत है जो मन्दी के दौर में डण्डे के ज़ोर से मज़दूरों को निचोड़ने में उनके वफादार सेवक का काम करे और मज़दूरों की एकता को तोड़े। यही कारण है कि मोदी सरकार पूरी मेहनत और लगन से अपने मालिकों की सेवा करने में लगी हुई है। परिणामस्वरूप बेरोज़गारी भयंकर रूप से बढ़ती जा रही है और जिनके पास रोज़गार है उनके शोषण में भी इज़ाफ़ा होता जा रहा है व छँटनी का ख़तरा लगातार सिर पर मँडरा रहा है। इसके अलावा महंगाई बेतहाशा बढ़ती जा रही है; स्कूल-कॉलेजों की फीस, इलाज का खर्च भी बढ़ता जा रहा है। हमारी जेबों को झाड़ने के लिए लगातार टैक्स बढ़ाये जा रहे हैं और बुनियादी सुविधाओं में कटौती की जा रही है। जनता के गुस्से को शान्त रखने के लिए जनता को धर्म के नाम पर बाँटने की साजिशें की जा रही है। दलितों और अल्पसंख्यकों पर भयंकर जुल्म ढाये जा रहे हैं। कुल मिलाकर मोदी सरकार के “अच्छे दिन” ऐसे ही हैं।
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