देशव्यापी लॉक डाउन में दिल्ली पुलिस का राजकीय दमन

सत्यम

सारे देश में आम लोगों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के लॉकडाउन के कारण घरों में बन्द रहने का फ़ायदा उठाकर मोदी सरकार लगातार अपने गन्दे एजेंडा को आगे बढ़ाने में लगी हुई है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की जाँच के बहाने एकदम ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से लोगों को उनके घरों से उठाने, घंटों पूछताछ के नाम पर बैठाये रहने, पुलिस रिमांड पर लेने या जेल भेज देने का सिलसिला लगातार जारी है। इस मामले में अब तक 800 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है जिनमें से ज़्यादातर मुसलमान हैं। 22 मार्च के बाद से ही उत्तर-पूर्वी दिल्ली से 25-30 लोग गिरफ़्तार किये गये हैं। गिरफ़्तारियों और फ़र्ज़ी मुक़दमों का सिलसिला उत्तर प्रदेश में भी जारी है। जामिया और अलीगढ विश्वविद्यालय के कई छात्र गिरफ्तार किये गए हैं।

पुलिस गुण्डों की तरह घरों में घुसती है, बिना कोई वारंट दिखाये या कोई कारण बताये गिरफ़्तारी करती है और कई बार उस व्यक्ति को सीधे जेल लेकर जाती है जहाँ आजकल ड्यूटी मजिस्ट्रेट लगातार बैठा रहता है, पुलिस के मनमाफ़िक आदेश जारी करने के लिए। गिर‍फ़्तार लोगों के मामले देख रहे वकीलों तक को जानकारी नहीं दी जाती। कई बार वकीलों को यह भी नहीं पता नहीं होता कि उस व्यक्ति को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है या औपचारिक तौर पर गिरफ़्तार किया गया है।

पूछताछ के लिए ले जाये गये लोगों को टॉर्चर करने या बाद में परेशानी खड़ी कर देने की धमकियाँ देकर उनसे कोई ऐसी बात निकलवा लेने के पुलिसिया हथकण्डे आज़माए जाते हैं जिससे ऐन-केन-प्रकारेण दंगों से उन्हें जोड़ा जा सके।

दूसरी तरफ़, दंगे भड़काने में जिन लोगों की स्पष्ट भूमिका थी, जिनके भड़काऊ़ बयानों के दर्जनों वीडियो हैं, अख़बारों में छपी ख़बरें हैं, ख़ुद पुलिस के अफ़सरों सहित सैकड़ों चश्मदीद गवाह हैं, उनकी गिरफ़्तारी तो दूर, उनको पूछताछ के लिए बुलाने का नोटिस भी नहीं दिया गया है। कपिल मिश्रा, प्रवेश वर्मा, रागिनी तिवारी जैसे लोगों की ओर पुलिस की नज़र भी नहीं गयी है। जिनकी छत से हथियार लहराते लोगों के वीडियो हैं उनसे पुलिस पूछने भी नहीं गयी है। जो लोग अनेक वीडियो में हिंसा करते नज़र आ रहे हैं उनकी पहचान करके पूछताछ करना पुलिस के “स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल” में नहीं आता है जिसकी दुहाई दिल्ली पुलिस के आला अफ़सर दे रहे हें।

फ़ासिस्ट सत्ता के लिए देश के करोड़ों आम लोगों के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा पहली प्राथमिकता नहीं है। वे बीमारी के इस हमले का भी इस्तेमाल सत्ता पर अपनी पकड़ को मज़बूत बनाने और हिन्दू राष्ट्र के अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। दरअसल दंगों की जाँच के बहाने उनका असली निशाना सीएए-एनआरसी के विरुद्ध उठ खड़े हुए आन्दोलन के प्रमुख भागीदार हैं ताकि उन्हें डरा-धमकाकर इतना शान्त कर दिया जाये कि कोरोना का संकट हल्का पड़ते ही वे फिर से एनपीआर-एनआरसी की अपनी कार्रवाई को शुरू कर दें और कहीं से कोई आवाज़ न उठे।

ये अलग बात है कि हर बार की तरह फ़ासिस्टों का यह मंसूबा भी एक मुग़ालता ही साबित होगा। वे भूल रहे हैं कि बर्बर दमन की ही प्रतिक्रिया में शाहीन बाग़ और फिर सारे देश में आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था।

बेहद ज़रूरी है कि देशभर से दिल्ली पुलिस की इस मनमानी के विरोध में और दिल्ली के दंगों के सबसे बड़े दोषियों को गिरफ़्तार करने की मांग पर ज़ोरदार आवाज़ उठायी जाये।

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