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उन्मुक्त स्त्री / रामवृक्ष बेनीपुरी

सोवियत ने स्त्रियों को स्वतन्त्र पेशा अख्तियार करने के लिए सारे दरवाज़े खोल दिये हैं। आज वहाँ ऐसी स्त्री का मिलना मुश्किल है; जो पति की कमाई पर गुज़ारा करती हो। स्थलीय, समुद्री और वायवीय – तीनों सेनाओं में साधारण सिपाही से लेकर बड़े-बड़े अफ़सर बनने तक का अधिकार स्त्रियों को प्राप्त है। वायुसेना में तो उनकी काफ़ी तादाद है। राजनीति में वह खुलकर हिस्सा लेती हैं; और राष्ट्रीय प्रजातन्त्रों तथा सोवियत संघ प्रजातन्त्र के मन्त्री जैसे दायित्वपूर्ण पदों पर वह पहुँच रही हैं। पार्लियामेण्ट के मेम्बरों में उनकी ख़ासी संख्या है। इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, डॉक्टर ही नहीं, बड़ी-बड़ी फ़ैक्टरियों में कितनी ही डायरेक्टर तथा डिप्टी डायरेक्टर तक स्त्रियाँ हैं। वर्तमान सोवियत पार्लियामेण्ट के सबसे कम उम्र के सदस्य क्लाउदिया सखारोवा को ही ले लीजिए। सखारोवा की उम्र अभी 19 साल है। वह रोदिन्की स्थान में पैदा हुई थी। उसके माँ-बाप उसी जगह कपड़े की मिल में मज़दूर थे। आजकल की बोल्शेविक बुनाई मिल, जिसकी सखारोवा डिप्टी डायरेक्टर है, क्रान्ति के पहले एक व्यापारी की सम्पत्ति थी।

अक्टूबर क्रान्ति से सबक लो! नई समाजवादी क्रान्ति की मशाल जलाओ!!

कठिन विचारधारात्मक संघर्ष, अटल विचारधारात्मक दृढ़ता और गहरी विचारधारात्मक समझ के बिना कोई सच्ची सर्वहारा पार्टी क्रान्ति करना तो दूर, गठित ही नहीं हो सकती और यदि गठित हो भी गयी तो जल्दी ही बिखर जायेगी। लेनिन और उनके साथी बोल्शेविकों ने एकदम अलग-थलग पड़ जाने का खतरा मोल लेते हुए भी विचारधारा के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं किया और मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी विचारधारा में किसी भी तरह की मिलावट की मेंशेविकों और कार्ल काउत्स्की के चेलों की साजिशों को एकदम से खारिज कर दिया। उन्होंने पार्टी को कभी भी चवन्निया मेम्बरी वाली महज़ चुनावबाज, यूनियनबाज, धन्धेबाज संगठन नहीं बनने दिया।

भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन पर दो विचारोत्तेजक व्याख्यान

नक्सलबाड़ी का जन-उभार भारत में क्रान्तिकारी वामपन्थ की नयी शुरुआत और संशोधनवादी राजनीति से निर्णायक विच्छेद की एक प्रतीक घटना सिद्ध हुआ। इसने मज़दूर-किसान जनता के सामने राज्यसत्ता के प्रश्न को एक बार फिर केन्द्रीय प्रश्न बना दिया। तेलंगाना-तेभागा-पुनप्रा वायलार और नौसेना विद्रोह के दिनों के बाद, एक बार फिर देशव्यापी स्तर पर जनसमुदाय की क्रान्तिकारी ऊर्जा और पहलक़दमी निर्बन्ध हुई, लेकिन ”वामपन्थी” दुस्साहसवाद के विचारधारात्मक विचलन और विरासत के तौर पर प्राप्त विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना एवं राज्यसत्ता की प्रकृति की ग़लत समझ और उस आधार पर निर्धारित क्रान्ति की ग़लत रणनीति एवं आम रणकौशल के परिणामस्वरूप यह धारा आगे बढ़ने के बजाय गतिरोध और विघटन का शिकार हो गयी।

पहला पार्टी स्कूल

लेनिन का स्कूल, जो लोंजूमो की सड़क के दूसरे छोर पर था, एक निराले तरह का स्कूल था, देखने में भी वह और स्कूलों की तरह नहीं था। पहले यहाँ एक सराय हुआ करती थी। पेरिस जाते हुए डाकगाड़ियाँ यहाँ रुका करती थीं। गाड़ीवान आराम करते थे, घोड़ों को दाना-पानी देते थे। मगर यह बहुत पहले की बात थी…

स्त्रियों को पहली बार वास्तविक आज़ादी की राह पर आगे बढ़ाने का काम अक्टूबर क्रान्ति के बाद स्थापित सोवियत समाजवाद ने किया

आज तमाम बुर्जुआ नारीवादी, उत्तर आधुनिकतावादी, अस्मितावादी चिन्तक, वर्ग-अपचयनवादी सूत्रीकरण पेश करते हुए स्त्री-प्रश्न पर मार्क्सवादी चिन्तन को गुज़रे ज़माने की चीज़ बताते हैं। अकादमिक हलक़ाें में भी इस तथ्य का उल्लेख हमें नहीं मिलता है कि रूसी क्रान्ति के बाद इतिहास में सोवियत सत्ता ने पहली बार, स्त्रियों को बराबरी का अधिकार दिया, इसे न केवल क़ानूनी धरातल पर बल्कि आर्थिक-राजनीतिक व सामाजिक धरातल पर इसे सम्भव बनाया। ज्ञात इतिहास में पहली बार स्त्रियों को चूल्हे-चौखट की गुलामी से मुक्त किया गया। विवाह, तलाक व सहजीवन जैसे मामलों में राज्य, समाज और धर्म के हस्तक्षेप को ख़त्म किया गया। भारी पैमाने पर स्त्रियों की उत्पादन और समस्त आर्थिक-राजनीतिक कार्यवाहियों में बराबरी की भागीदारी को सम्भव बनाया। यह कहा जा सकता है कि प्रबोधन कालीन मुक्ति और समानता के आदर्शों को पहली बार इतिहास में वास्तविकता के धरातल पर उतारने का काम अक्टूबर क्रान्ति ने किया।

अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

वक्ताओं ने कहा कि पूरी दुनिया में भूख-प्यास, लूट, दमन, जंग, क़त्लेआम, धर्म-नस्ल-देश-जाति-क्षेत्र के नाम पर नफ़रत आदि के सिवाय इस पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था से और कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि हम इस गली-सड़ी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए पुरज़ोर ढंग से लोगों को जगाने और संगठित करने की कोशिशों में जुट जायें।

‘महान अक्टूबर क्रान्ति और इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रान्तियाँ : निरन्तरता और परिवर्तन के तत्व’ पर नयी दिल्ली में व्याख्यान

अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करणों को रचने के लिए जहाँ अक्टूबर क्रान्ति की समस्याओं की समझ अनिवार्य है, वही आज के दिक् और काल में दुनिया के पूँजीवादी समीकरण को समझना भी बेहद ज़रूरी है। आज दुनियाभर के देशों में उपनिवेश, अर्धउपनिवेशों जैसी स्थिति नहीं है और इन देशों में राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के कार्यभार भी सम्पन्न हो चुके हैं इसीलिए आज के युग की क्रान्तियाँ चीन की नवजनवादी क्रान्ति जैसी नहीं होंगी। साथ ही, आज की क्रान्तियाँ अक्टूबर क्रान्ति की हु-ब-हु कार्बन कॉपी या नक़ल भी नहीं हो सकतीं।

”हम लूटमार नहीं, क्रान्ति करने आये हैं!’’

बोल्शेविकों ने शान्ति और भूमि देने का वचन दिया। उन्होंने यह भी वादा किया कि विश्व के मज़दूरों को ‘‘एकजुट हो, युद्ध और पूँजीवादी शोषण को हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म कर देना चाहिए।’’ वे उस रात रूस के भविष्य के बारे में बड़े शानदार सपने देख रहे थे; बड़ी-बड़ी योजनाओं को बना रहे थे और वे इस बात से भी अनभिज्ञ नहीं थे कि उनके सपनों और योजनाओं का इस्तेमाल भविष्य में शेष विश्व द्वारा भी किया जायेगा। शायद आदर्श संरचना के रूप में, शायद केवल भयानक उदाहरण और त्रासद चेताविनयों के रूप में।

मनुस्मृति दहन (25 दिसम्बर, 1927) की 89वीं वर्षगाँठ पर

आज से 89 वर्ष पहले महाड़ में मेहनतकश दलितों ने एक बग़ावत शुरू की थी। इसकी शुरुआत 19-20 मार्च 1927 को बहिष्कृत सम्मेलन से हुई थी। लेकिन वास्तव में इस सम्मेलन का विचार आर बी मोरे ने मई 1924 में पेश किया, जिन्हें बाद में कॉमरेड आर बी मोरे के नाम से जाना गया। इस सम्मेलन में डाॅ. अम्बेडकर को उनकी अकादमिक उप‍लब्धियों के लिए सम्मानित करने की योजना बनायी गयी थी।

सागर में लाल झण्डा – ‘लेनिन कथा’ से एक अंश

युद्धपोत ‘पोत्योम्किन’ का कमाण्डर बहुत ही क्रूर और निर्दयी आदमी था। उसे डर था कि कहीं क्रान्ति की आग जहाज़ पर भी न फैल जाये। इसलिए वह सामरिक अभ्यास के बहाने युद्धपोत को सेवास्तोपोल से, मज़दूर हड़तालों और प्रदर्शनों से दूर समुद्र में ले गया।