चुनाव? लुटेरों के गिरोह जुटने लगे हैं! जोड़-तोड़, झूठ-फरेब, धार्मिक उन्माद, नफ़रत, रक्तपात, भ्रष्टाचार से भरपूर भारतीय लोकतंत्र की पंचवर्षीय महानौटंकी का मंच सज रहा है!
कभी नीला कुर्ता पहनकर,
कभी सफेद, कभी हरा
तो कभी लाल कुर्ता पहनकर।
महान हैं मालिक लोग
पहले पाँच साल पर आते थे
पर अब तो और भी जल्दी-जल्दी आते हैं
हमारे द्वार पर याचक बनकर।
मालिक लोग चले जाते हैं
तुम वहीं के वहीं रह जाते हो
आश्वासनों की अफीम चाटते
किस्मत का रोना रोते;
धरम-करम के भरम में जीते।
आगे बढ़ो!
मालिकों के रंग-बिरंगे कुर्तें को नोचकर
उन्हें नंगा करो।
तभी तुम उनकी असलियत जान सकोगे।
तभी तुम्हें इस मायाजाल से मुक्ति मिलेगी।
तभी तुम्हें दिखाई देगा
अपनी मुक्ति का रास्ता।
भेड़ियों, कुत्तों, लकड़बग्घों और सुअरों के बीच से आखिर हम किसको चुनें?
ये सभी पूँजीवादी नरभक्षी राक्षसों के टुकड़खोर पालतू हैं!
यह चुनाव एक धोखा है!
विकल्प क्या है? – संसदीय राजनीति के भ्रम से निकलो! क्रान्ति के मार्ग पर आगे बढ़ो!!
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मेहनतकश साथियो! नौजवान दोस्तो!
सोचो!
62 सालों तक
चुनावी मदारियों से
उम्मीदें पालने के बजाय
यदि हमने इंकलाब की राह चुनी होती
तो भगत सिंह के सपनों का भारत
आज एक हकीकत होता।
असली चुनाव
इस या उस
पूंजीवादी चुनावी पार्टी
के बीच नहीं
बल्कि
इंकलाबी राजनीति
और पूंजीवादी राजनीति
के बीच है।
चुन लो
चुनावी मृगमरीचिका में
जीना है
या
इंकलाब की तैयारी की
कठिन राह पर चलना है?
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बिगुल, मार्च 2009















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