तुम्हारी चुप्पी को क्या समझा जाए!
गौरव, दिल्ली
जब बहुसंख्यक श्रमिक जन हो श्रमरत
करें उत्पादन का कम पड़े भंडार घर
बदले में पायें श्रम का मोल इतना कमतर
कि बस जीवन चले घिसट-घिसट कर
और मालिक वर्ग कब्जा जमाये उत्पादन पर
लगा मोल बेचे ऊँचे दाम चढ़ाकर
मुनाफ़े की लूट मचाये दिन रात
पल प्रतिपल दिशा-देशांतर
खड़ी कर ऊँची मीनारें
करे धन संचय अति भयंकर
कला-साहित्य-ज्ञान-विज्ञान का मालिक बनकर
धर्म के धूम्रावरण की चादर फैलाकर
जब न्याय, इंसाफ, कानून बन जाये
कुछ लोगों की मिलकियत,
जब याचना की अर्जी
फाइलों के तले दब जाए
जब जिंदा रहने की शर्त
कमरतोड़ मेहनत के बराबर हो जाए
तब तुम्हारी उपस्थिति को किस तरह
आँका जाये?
तुम्हारी चुप्पी का क्या अर्थ
निकाला जाये
क्योंकि चुप रहने का भी मतलब
होता है
तटस्थ होता कुछ भी नहीं!
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2011













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