केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों से एक बार फिर अपील
एकदिनी रस्मी हड़तालों से न कुछ हासिल हुआ है न हासिल होगा!
मज़दूर-विरोधी लेबर कोड वापस लेने पर मोदी सरकार को बाध्य करने के लिए देशव्यापी अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करें!

सम्पादकीय अग्रलेख

हमने ‘मज़दूर बिगुल’ के पिछले अंक में भी लिखा था कि मोदी-शाह निज़ाम द्वारा देश के मज़दूरों पर थोपे गये अन्यायपूर्ण नये लेबर कोडों को वापस लेने के लिए मजबूर करने का एक ही रास्ता है: देशव्यापी अनिश्चितकालीन आम हड़ताल। इसमें संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र, दोनों के ही व्यापक मज़दूर जनसमुदायों को शामिल करना होगा। लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं कि इसमें संख्या में कम होने के बावजूद संगठित क्षेत्र के मज़दूरों और उनकी ट्रेड यूनियनों की विशेष भूमिका होगी। पूँजीवादी व्यवस्था जिन अंगों-उपांगों से काम करती है, उसमें रेलवे, डाक व टेलीग्राफ़, सड़क परिवहन, बैंक, बीमा व तमाम भारी, शिपिंग, संचार, आधारभूत, इंजीनियरिंग, रासायनिक उद्योगों की सबसे अहम भूमिका होती है। इन उद्योगों में काम करने वाली मज़दूर आबादी आज निश्चित तौर पर कुल मज़दूर आबादी का महज़ 12-15 फ़ीसदी ही बनती है। लेकिन रणनीतिक तौर पर अर्थव्यवस्था के इन सेक्टरों की अहमियत को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। इन सेक्टरों में काम का रुकना, मतलब पूँजीवादी व्यवस्था के राज्य-उपकरण का रुक जाना और नतीजतन समूची मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था का ठप्प पड़ जाना। इन सभी सेक्टरों को मज़दूर व कर्मचारी अपनी मेहनत के बल पर चलाते हैं। इन्हें चलाने के लिए धन्नासेठों की औलादें नहीं आतीं। वे तो विदेशों में गुलछर्रे उड़ाती हैं, या देश के भीतर ही बड़े-बड़े सरकारी पदों पर विराजमान होती हैं, या फिर सरकारी सहायता से देश की जल-जंगल-ज़मीन से जनता को बेदख़ल कर लूट-पाट कर रही होती हैं! लेकिन अब इन्हीं धन्नासेठों की मुनाफ़े की दर को बढ़ाने के लिए दमनकारी-अन्यायकारी नयी श्रम संहिताओं को मोदी-शाह सरकार लेकर आयी है। तो ऐसे में मज़दूरों को अपनी शक्ति के प्रदर्शन की आवश्यकता है। और आज के हालात में केवल एक क़दम ही कारगर हो सकता है: अनिश्चितकालीन आम हड़ताल। और विशेष तौर पर संगठित क्षेत्र के मज़दूरों को इसमें पहल लेनी होगी और अगुवाई करनी होगी। केवल इसके ज़रिये ही आज मोदी-शाह की फ़ासीवादी सरकार को अन्यायपूर्ण लेबर कोड्स को वापस लेने के लिए त्वरित गति से बाध्य किया जा सकता है।

पिछले एक महीने के दौरान पूरे देश में तमाम क्रान्तिकारी मज़दूर संगठनों यूनियनों द्वारा इस सन्देश को संगठित क्षेत्र के हज़ारों मज़दूरों तक पहुँचाया गया है और अभी भी पहुँचाया जा रहा है। तमाम केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के स्थानीय, राज्य-स्तरीय और उससे ऊपर के नेतृत्व से मिलकर तमाम स्वतन्त्र यूनियनों व क्रान्तिकारी मज़दूर संगठनों ने उन्हें अपील-पत्र सौंपा है। इसमें उनसे अपील की गयी है कि लेबर कोड्स को वापस करवाने के लिए देशव्यापी अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का आह्वान करें। उन्हें इस हड़ताल में तमाम स्वतन्त्र यूनियनों व मज़दूर संगठन से पुरज़ोर समर्थन का वायदा भी किया है। इन सेक्टरों में काम करने वाली मज़दूर कर्मचारी आबादी ने इस प्रस्ताव का भारी समर्थन किया है। कई स्थानों पर स्थानीय उससे ऊपर के नेतृत्वकारी यूनियन सदस्यों ने भी इस प्रस्ताव की तार्किकता को फ़ौरन समझा है, उसका समर्थन किया है और राष्ट्रीय नेतृत्व तक इस प्रस्ताव को पहुँचाने का वायदा किया है। इन अभियानों के दौरान यह आम राय स्पष्ट तौर पर संगठित मज़दूरों के बीच से सामने आयी है कि ऐसी आम हड़ताल के ज़रिये ही मोदी सरकार की इन नयी तानाशाहाना श्रम संहिताओं को वापस करवाया जा सकता है।

लेकिन इसके बावजूद केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों ने काफ़ी मन्त्रणा के बाद मज़दूरों के दिल की आवाज़ को अनसुना कर दिया है और फिर से एक रस्मी एकदिनी हड़ताल का आह्वान किया है, जो 12 फ़रवरी को होगी। निश्चित तौर पर, हरेक औद्योगिक क्षेत्र, हरेक कारख़ाने, हरेक दुक़ान, दफ़्तर और कार्यस्थल के मज़दूर को इसमें शामिल होना चाहिए। यह मज़दूर वर्ग द्वारा अपनी एकजुटता के प्रदर्शन के लिए अनिवार्य है। लेकिन फिर से वही यक्ष-प्रश्न हमारे सामने खड़ा हो जाता है:

  • अगर पिछले तीन दशकों से लगभग हर वर्ष की गयी रस्मी एकदिनी या दोदिनी हड़तालों के बावजूद हम श्रम क़ानूनों की एक धीमी हत्या, श्रम विभाग की एक धीमी हत्या और मज़दूरों के बचेखुचे हक़ोहुक़ूक पर लगातार डाले जा रहे डाके को नहीं रोक पाये, अगर पिछले दस वर्षों में मज़दूरों के हक़ों पर मोदी सरकार द्वारा किये गये एक के बाद एक हमलों का हम कोई जवाब नहीं दे पाये, तो फिर से एकदिनी हड़ताल करके क्या हम एक बार और रस्मअदायगी के गड्ढे में नहीं गिर रहे हैं?
  • इससे पहले भी जब मज़दूरों कर्मचारियों की ओर से केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के समक्ष लम्बी या अनिश्चितकालीन आम हड़ताल आयोजित करने की माँग आती थी, तो केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व के साथियों द्वारा हम मज़दूरों को बताया जाता था कि अनिश्चितकालीन आम हड़ताल हमाराब्रह्मास्त्रहै और इसे सही समय पर इस्तेमाल करेंगे! अब इससे ज़्यादा सही समय क्या हो सकता है?
  • तीन दशकों से जारी रस्मअदायगी वाली हड़तालों के बावजूद हम तो संगठित क्षेत्र में भर्तियों पर लगने वाली रोक को हटवा पाये, हम संगठित क्षेत्र में जारी ठेकाकरण, दिहाड़ीकरण और कैजुअलीकरण को रोक पाये और ही हम मज़दूरों के यूनियननिर्माण जैसे जनवादी अधिकारों पर हमला रोक पाये। बहुसंख्यक अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए तो काग़ज़ी क़ानूनों का मतलब दशकों पहले ख़त्म हो चुका था, लेकिन अब वह संगठित होकर भी इन हक़ों के लिए नहीं लड़ पायेंगे क्योंकि काग़ज़ों से ही इन क़ानूनों को मिटा दिया गया है। जिन संगठित क्षेत्र के मज़दूरों को सीमित तौर पर ये आधेअधूरे सही लेकिन कुछ श्रम अधिकार मिलते रहे थे, वे भी अब नहीं मिलेंगे। तो यह सवाल हम सब मज़दूरों के सामने और विशेष तौर पर संगठित क्षेत्र के मज़दूरों के सामने है कि पिछले तीन दशकों की रस्मी एकदिनी/दोदिनी हड़ताल से हासिल क्या हुआ है?
  • इन नये लेबर कोड्स का अर्थ यह होगा कि हमारे बच्चे भी आने वाले समय में अनौपचारिक असंगठित ठेका, दिहाड़ी कैज़ुअल मज़दूरों की क़तार में शामिल होने को बाध्य होंगे, चाहे वे मानसिक श्रमिक हों या शारीरिक श्रमिक। हर प्रकार क़ानूनी सुरक्षा, पक्की नौकरी की गारण्टी श्रम अधिकार उनसे छीने जा चुके हैं। क्या हम अब भी मज़दूर वर्ग के हक़ों पर हो रहे इन हमलों को चुपचाप बर्दाश्त करने को तैयार हैं? अगर हाँ, तो फिर हम शायद इसी योग्य हैं कि पीठ झुकाकर पूँजीपतियों, मालिकों, धन्ना सेठों और उनकी मैनेजिंग कमेटी का काम करने वाली पूँजीवादी सरकारों के कोड़े अपनी पीठों पर खाएँ और अपने बच्चों को भी ग़ुलामी की यही विरासत सौंप कर जाएँ! यह बात सहज समझने योग्य है कि ये लेबर कोड एक दूरगामी क़दम हैं, जो मज़दूर वर्ग के हितों को अभूतपूर्व नुक़सान पहुँचाने वाले हैं। यही वक़्त है कि मज़दूर वर्ग और विशेष तौर पर संगठित क्षेत्र का मज़दूर कर्मचारी वर्ग अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का बिगुल फूँके और यह ऐलान कर दे कि जब तक मोदी सरकार के फ़ासीवादी लेबर कोड वापस नहीं लिए जाते, तब तक आम हड़ताल जारी रहेगी।

कोई भी मज़दूर साथी इस बात को सहज ही समझ सकता है। हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक है। हड़ताल का मक़सद होता है मुनाफ़े का चक्का रोककर पूँजीपति वर्ग को अपनी माँगों पर झुकने के लिए मजबूर किया जाय। इसका मक़सद एकदिनी रोष-प्रदर्शन नहीं होता है। हड़ताल के इस बेहद अहम हथियार को पिछले तीन दशकों से जारी सालाना रस्मअदायगी वाली “हड़तालों” ने बेअसर कर दिया है। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग पर निर्भर करता है। बिना उत्पादन के कोई मूल्य नहीं पैदा होता, कोई समृद्धि नहीं पैदा होती इसलिए कोई बेशी-मूल्य या मुनाफ़ा भी नहीं पैदा होता। और पूँजीपति को केवल एक ही बात से फ़र्क पड़ता है: मुनाफ़ा।

हड़ताल करना और अपनी जायज़ माँगों के लिए काम रोकना हमारा जनवादी अधिकार है। आज इस जनवादी अधिकार पर भी हमला बोला जा रहा है और नये लेबर कोड्स का एक मक़सद यूनियन बनाने और अधिकार और हड़ताल करने के अधिकार को भी प्रभावत: रद्द कर देना है। वजह यह कि इन अधिकारों पर अमल के लिए ऐसी शर्तें रख दी गयी हैं जो अन्यायपूर्ण हैं और सीधे शासक वर्ग की हिमायत के लिए बनायी गयी हैं।

ऐसे में, हम एक बार फिर से केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्व से दिली अपील करते हैं कि वे वक़्त की नज़ाकत और ज़रूरत को समझें। मोदी-शाह सरकार और कुछ भी करने, कोई भी रस्मी क़वायद करने, ज़ुबानी जमाख़र्च करने, प्रतीकात्मक प्रदर्शन आदि करने से हमारी बात नहीं सुनेगी। उसे बात सुनने पर मजबूर करना होगा। यह तभी किया जा सकता है जब मज़दूर वर्ग अपने सबसे अहम हथियारों में से एक यानी आम हड़ताल का इस्तेमाल करे। आज जो हो रहा है, उससे बुरा कुछ और हो नहीं सकता है। तो फिर इस शस्त्र का प्रयोग करने में प्रतीक्षा किस बात की?

अगर अब भी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन ये क़दम उठाने से घबरा जाते हैं, पीछे हट जाते हैं, सरकार से कोई समझौता कर लेते हैं, तो फिर उनकी नीयत और इरादों पर गम्भीर प्रश्न-चिह्न खड़े हो जायेंगे। अगर वे संघर्ष के आज के ज़रूरी क़दम पर मज़दूरों को नेतृत्व देने के लिए तैयार नहीं हैं, उनके मन की आवाज़ को सुनने को, उनकी एकदम जायज़ इच्छा को अभिव्यक्ति देने के लिए तैयार नहीं हैं, तो फिर ऐसे नेतृत्व की वास्तविक भूमिका क्या है? यह तो मज़दूर वर्ग के संघर्षों को सीमित रख उसे शासक वर्ग के लिए क्षतिशून्य और हानिहीन बना देने की भूमिका होगी, मज़दूर वर्ग को दंतनखविहीन बना देने की भूमिका होगी! हम उम्मीद करते हैं कि केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनें इस बात को समझती हैं, मज़दूरों व कर्मचारियों की भावनाओं को समझती हैं और इस समझ के साथ वे उपयुक्त क़दम उठायेंगी। यही मौक़ा है कि हम देश के धन्नासेठों, मालिकों, सट्टेबाज़ों, ठेकेदारों, दलालों, कुलकों-धनी किसानों को याद दिला दें कि समृद्धि के निर्माता अडाणी-अम्बानी, टाटा-बिड़ला नहीं होते, बल्कि देश के मज़दूर और ग़रीब किसान होते हैं। दुनिया के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जब बिना पूँजीपतियों के मज़दूरों-मेहनतकशों ने देश चलाये हैं, लेकिन ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है, जब मज़दूरों-मेहनतकशों के बिना पूँजीपतियों ने कोई देश चलाया हो।

अन्त में, यह याद दिलाना ज़रूरी है कि इसी समय मोदी सरकार ने प्रभावत: मनरेगा क़ानून को भी समाप्त ही कर दिया है। यानी ग्रामीण मज़दूरों के बुनियादी हक़ों पर एक अभूतपूर्व हमला किया गया है। 100 दिन के रोज़गार की गारण्टी कोई वास्तविक रोज़गार गारण्टी नहीं थी, लेकिन वह भी खेतिहर मज़दूरों की मोलभाव की क्षमता को बढ़ा रही थी, आम तौर पर औसत मज़दूरी पर बढ़ने का दबाव पैदा कर रही थी और धनी किसानों-कुलकों समेत पूरे पूँजीपति वर्ग की निगाह में चुभ रही थी। अभी ग्रामीण मज़दूरों को यह अधूरी राहत मिलना भी पूँजीपति वर्ग को गँवारा नहीं है। यही वजह है धनी किसानों-कुलकों के संगठन इस पर ज़ुबानी जमाख़र्च की नौटंकी करने के अलावा न तो सिंघू बॉर्डर जाम कर रहे हैं और न ही हरियाणा-पंजाब शंभू बॉर्डर को जाम कर रहे हैं! उल्टे यह बात सभी आम ग्रामीण मज़दूरों को स्पष्ट है कि धनी किसान व कुलक यह चाहते हैं और प्रच्छन्न तौर पर उनकी माँग भी रही है कि मनरेगा क़ानून ख़त्म किया जाय या उसे निष्प्रभावी बना दिया जाय। मोदी सरकार ने यही काम किया है।

इसलिए इस आम हड़ताल का एक प्रमुख मसला हमें मनरेगा को समाप्त किये जाने के मसले को भी बनाना होगा और इस सवाल पर व्यापक ग्रामीण मेहनतकश आबादी, यानी ग्रामीण मज़दूर ग़रीब किसानों को एकजुट और लामबन्द करना होगा। इसके आधार पर गाँव के ग़रीबों को भी इस आम हड़ताल में शामिल करना होगा। बिना गाँव के ग़रीबों, यानी ग्रामीण मज़दूरों, अर्द्धसर्वहारा, ग़रीब व परिधिगत किसानों के साथ आये, मज़दूर वर्ग की कोई भी लड़ाई कमज़ोर और अधूरी साबित होगी। वहीं गाँव के ग़रीबों की मुक्ति का प्रश्न अभिन्न तौर पर मज़दूर वर्ग की मुक्ति के प्रश्न से जुड़ा हुआ है। यह बात न सिर्फ़ दूरगामी तौर पर लागू होती है, बल्कि आज के समय के विशिष्ट संघर्षों के सन्दर्भ में भी लागू होती है। आज का सबसे अहम विशिष्ट संघर्ष नये लेबर कोड्स के विरुद्ध और मनरेगा क़ानून को ख़त्म किये जाने के विरुद्ध एक देशव्यापी अनिश्चितकालीन आम हड़ताल का संघर्ष है।

केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों को और ग़रीब किसानों और ग्रामीण मज़दूरों की नुमाइन्दगी का दावा करने वाले यूनियनों संगठनों को ऐसी आम हड़ताल का आह्वान करना चाहिए। व्यापक मज़दूरमेहनतकश आबादी को इन संगठनों यूनियनों पर ऐसी आम हड़ताल का ऐलान करने का दबाव बनाना चाहिए। इस समय यही हमारे अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए सबसे अहम क़दम है। हम जितनी जल्दी इस बात को समझेंगे, उतना बेहतर होगा।

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026

 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन