मुनाफ़ाख़ोर पूँजीवादी व्यवस्था, फ़ासिस्ट सरकार और पानी में फैलता ज़हर

प्रसेन

अभी हाल ही में मध्यप्रदेश के इन्दौर शहर के भागीरथपुरा इलाक़े में दूषित पानी पीने से 1400 से अधिक लोग डायरिया के चपेट में आ गये। इसमें 17 से अधिक लोगों की मृत्यु ही गयी। सैकड़ों लोग अस्पताल में भर्ती किये गए। इस भयानक घटना के तत्काल बाद ही गुजरात में इसी तरह की घटना घटी जिसमें 10 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गयी। इसके बाद योगी के “उत्तम प्रदेश” की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले गौतमबुद्ध नगर के ग्रेटर नोएडा में 8 जनवरी को दूषित पानी पीने से क़रीब 40 लोग बीमार पड़ गये। उसके दो दिन पहले भी ग्रेटर नोएडा के ही डेल्टा वन सेक्टर में गन्दा पानी पीने से करीब 20 लोग बीमार पड़ गए थे। सोचने वाली बात यह है कि इन्दौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया था और गुजरात को विकास के मॉडल के रूप में। हालाँकि यह सब जानते हैं कि ये सर्टिफिकेट फ़ासीवादी भाजपा ने ही खुद को दिया था और पूँजीवादी मीडिया ने जनता में इस झूठ को सच बनाकर फैलाया था। दूषित पानी से होने वाली ये मौतें केवल प्रशासकीय लापरवाही और किसी समय-विशेष में होने वाली मौतें नहीं हैं बल्कि मुट्ठी भर लुटेरों के मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था के हाथों होने वाली नियमित बर्बर हत्याएँ हैं जो कि फ़ासीवादी भाजपा के दौर में तेज़ रफ़्तार से की जा रही है।

पूँजीवादी व्यवस्था आज उस मुकाम पर पहुँच गयी है जहाँ वह न केवल मेहनतकश आबादी की श्रमशक्ति को बेरहमी से लूट रही है, उन्हें बेरोज़गारी, महँगाई की सौगात दे रही है अपितु पूरी प्रकृति को ही विनाश की ओर तेज़ी से ले जा रही है। मेहनतकश आबादी न केवल पूँजीपतियों द्वारा मेहनत की लूट का शिकार है बल्कि पूँजीपतियों के मुनाफ़े की हवस से आने वाली प्राकृतिक आपदा-विपदा को सबसे अधिक झेलने के लिए बाध्य है। इसलिए मेहनतकश आबादी को यह जानना बेहद ज़रूरी है कि इन्दौर, गाँधीनगर जैसी घटनाएँ क्यों हो रही हैं? ट्रिपल इंजन की फ़ासीवादी भाजपा सरकार की इसमें क्या भूमिका रही है? और कि आखिरकार लोगों को पानी की जगह ज़हर कौन पिला रहा है?

देश के विभिन्न शहरों (और अब गाँवों में भी) की तरह इन्दौर में भी लोग लम्बे समय से प्रदूषित पानी पीने के लिए बाध्य थे। हेपेटाइटिस, किडनी की समस्या, टायफायड, डायरिया जैसी तरह-तरह की बीमारियों के शिकार बन रहे थे। लोग इसकी कई साल से शिकायत कर रहे थे। मज़ेदार बात तो यह है कि इन्दौर नगर निगम अपने कुल बजट का लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा पानी और स्वच्छता पर ख़र्च करता है। यह ख़र्च 2021-22 में 1,680 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में प्रस्तावित 2,450 करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है। इतने ख़र्च के बाद यह स्थिति साफ़ तौर पर बताती है कि यह सारा पैसा पानी और स्वच्छता पर ख़र्च होने की जगह नेताओं, अफ़सरों और ठेकेदारों के पेटों में चला गया।

प्रदूषित पानी पीने की वजह से लगातार मौतें हो रही थीं लेकिन जब यह एक विकराल समस्या की तरह फूट पड़ी तब जाकर यह कोई मसला बना। खुद इन्दौर के मेयर ने यह स्वीकार किया है कि भागीरथपुरा के निवासी 2024 से लगातार प्रदूषित पानी की शिकायतें कर रहे थे, लेकिन उस समय सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी। दिसम्बर से इलाक़े के लोगों ने स्थानीय पार्षद कमल बाघेल और विधायक कैलाश विजयवर्गीय से भी कई बार शिकायत की थी कि सप्लाई का पानी बेहद गन्दा हो चुका है और उससे बदबू आ रही है। इसके बावजूद प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा और समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाये गये। उलटे, सरकार इस दौरान मुस्लिम-विरोधी भावनाएँ भड़काने, ‘वन्दे मातरम्’ पर फ़र्ज़ी बहसें छेड़ने और क्रिसमस सभाओं पर हमले करवाने में व्यस्त रही। नतीजतन, लोगों को वही नालियों से होता हुआ गन्दा और प्रदूषित पानी पीने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे डायरिया और उल्टी जैसी बीमारियाँ बड़े पैमाने पर फैल गयी।

यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि सत्ता में बैठी यह फ़ासीवादी निज़ाम आम लोगों की ज़िन्दगियों के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन है। इसकी पराकाष्ठा तब सामने आयी जब इस मुद्दे पर एक पत्रकार के स्थानीय विधायक, शहरी विकास मन्त्री और राज्य के सबसे बड़े दँगाई नेता कैलाश विजयवर्गीय से सवाल पूछने पर कैमरे के सामने पत्रकार को अभद्र गालियाँ दी गईं। जब इन्दौर के विभिन्न अस्पतालों में बेगुनाह बच्चे और लोग तड़प-तड़प कर मर रहे थे तब इस घटना के विरोध में होने वाले प्रदर्शन के सामने भाजपा के कार्यकर्ता नाच रहे थे। स्थानीय पार्षद झूला झूल रहा था और कैलाश विजयवर्गीय ट्विटर भाजपा नेताओं को जन्मदिन की बधाइयाँ देने में व्यस्त था। इस मामले में लीपा-पोती करने के लिए प्रशासन ने दावा किया कि सिर्फ़ चार लोगों की मौत डायरिया से हुई है और बाक़ी की “प्राकृतिक मृत्यु” हुई है। यही नहीं, इस घटना के तुरन्त बाद जिलाधिकारी शिवम वर्मा और मेयर पुष्यमित्र भार्गव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यालय में हाजिरी देते हुए पाए गए। यह स्थिति बताती है कि देश के प्रशासन असल में कौन चला रहा है! खैर, जब इन्दौर के लोगों का ग़ुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा और भागीरथपुरा की महिलाओं ने कैलाश विजयवर्गीय को इलाक़े से दुम दबाकर भागने पर मजबूर कर दिया, तब प्रशासन ने डैमेज कण्ट्रोल के नाम पर दो-तीन निचले स्तर के कर्मचारियों को निलम्बित कर दिया, ताकि कैलाश विजयवर्गीय जैसे बड़े नेताओं को बचाया जा सके—जो इन 18 मासूम लोगों की मौत के असली ज़िम्मेदार हैं।

लेकिन इन्दौर, गुजरात और उत्तर प्रदेश की घटना तो महज़ समुद्र में डूबे विशाल हिमखण्ड का छोटासा दिख रहा शीर्ष मात्र है। असली स्थिति बहुत भयावह है। कम शब्दों में कहा जाए तो जो ज़हर लोग लगातार पी रहे हैं वह केवल बड़ी संख्या में लोगों की जान ले रहा है बल्कि ये घटनाएँ आने वाले भयानक आपदा का संकेत हैं। 3 जनवरी को नगर निगम द्वारा जीवाणु परीक्षण के लिए भागीरथपुरा से एकत्र किए गए 51 नमूनों में से 35 में मल कोलीफॉर्म जीवाणु की मात्रा पाई गई। यह मात्रा 13 से 360 प्रति मिलीलीटर तक थी जबकि भारतीय मानकों के अनुसार सुरक्षित मानी जाने वाली संख्या शून्य है। एक शोध पत्र के अनुसार, इन्दौर में 20 प्रतिशत गन्दा पानी सीधे जलस्रोतों में छोड़ दिया जाता है, जबकि 80 प्रतिशत सीवर लाइनें या तो अवरुद्ध हैं या उनका पूरा उपयोग नहीं हो रहा है। 2019 में प्रकाशित एक सरकारी आँकड़े के अनुसार, राज्य के दो सबसे बड़े शहरों—भोपाल और इन्दौर—में केवल 56 प्रतिशत परिवारों के पास ही नल कनेक्शन थे। नतीजतन, 2018 तक इन दोनों शहरों में पानी से फैलने वाली बीमारियों के 5.45 लाख मामले आधिकारिक रूप से दर्ज किये गये।

इसी तरह,  गुजरात मेंनल से जलयोजना के बड़ेबड़े खण्डों के बीच केन्द्रीय जल शक्ति मन्त्रालय की रसोई रिपोर्टआकलन रिपोर्ट ) ने कड़वी सच्चाई को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के 43 प्रतिशत घरों में ही नलों में पीने लायक शुद्ध पानी पहुँच रहा है, जिसका अर्थ है कि 57 प्रतिशत आबादी तक अभी भी साफ पानी नहीं पहुँच रहा है। गुजरात में वॉटर क्वालिटी इण्डेक्स (जल गुणवत्ता सूचकांक) पूरे देश में 30वें स्थान पर है, जो राज्य की स्वास्थ्य सुरक्षा पर गम्भीर सवाल खड़ा करता है। गाँधीनगर जैसे विकसित शहरों में भी यही स्थिति है, जहाँ क्रमशः 31.9% और 46.1% घरों में ही शुद्ध पेयजल की आपूर्ति हो रही है।

प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के अनुसार बीओडी और कोली फॉर्म के आधार पर गुजरात का स्कोर अन्य पिछड़ा राज्य श्रेणी के राज्यों की तुलना में भी कम आ रहा है। बनासकांठा और दाहोद में तो स्थिति और भी बुरी है जहाँ एक भी घर में नल के माध्यम से पीने योग्य पानी नहीं मिल रहा है। यहाँ भी यह घटना 24×7 पानी सप्लाई परियोजना में 257 करोड़ रुपये के निवेश के बाद हुई है, जिसके तहत सीवर लाइनों के पास नई पानी की पाइपलाइनें बिछाई गई थीं।

इन्दौर और गुजरात की स्थिति जानने के बाद अब ज़रा देश की स्थिति पर नज़र डाली जाए। भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन दुनियाभर में मौजूद ताजे पानी के स्रोत में से सिर्फ़ 4 प्रतिशत ही भारत में हैं। ये स्रोत भी समय और खपत के साथ तेजी से कम हो रहे हैं। इतने कम स्रोतों का असर है कि भारत की एक बड़ी आबादी ऐसा पानी पीने को मजबूर है जो जानलेवा साबित हो रहा है। देश में सतह पर मौजूद 70 प्रतिशत पानी ऐसा है जिसे पिया नहीं जा सकता है। नीति आयोग की कम्पोजिट वाटर रिसोर्स मैनेजममेण्ट रिपोर्ट, 2023 के मुताबिक, भारत के 82 करोड़ लोगों के पास पानी की उपलब्धता 1000 मीटर क्यूब या इससे कम है जबकि अन्तरराष्ट्रीय स्तर 1700 मीटर क्यूब प्रति साल को जल संकट माना जाता है। पीने के साफ़ पानी की अनुपलब्धता के चलते भारत में हर साल औसतन दो लाख लोगों की मौत हो जाती है। भारत दुनिया का ऐसा देश है जहाँ भूजल का इस्तेमाल सबसे ज़्यादा होता है। देश के 87 प्रतिशत भूजल का इस्तेमाल सिंचाई के लिए और 11 प्रतिशत पानी की इस्तेमाल घरेलू कामों के लिए होता है। ऐसे में ज़मीन के नीचे के पानी में इस तरह के प्रदूषकों का पाया जाना ख़तरनाक है।

केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB) की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 20 प्रतिशत भूजल ऐसा है जिसमें नाइट्रेट, यूरेनियम और आर्सेनिक जैसे ख़तरनाक तत्व पाए गए हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि देशभर में पानी को प्रदूषित करने वाला सबसे बड़ा केमिकल कैल्शियम बाई कार्बोनेट (CaHCO3) है। इस रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2023 में कुल 15259 सैम्पल लिए गए। इनमें से 20.7 प्रतिशत सैम्पल में नाइट्रेट की मात्रा BIS के मानक यानी 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज़्यादा थी।  भारत के 56 प्रतिशत जिले ऐसे हैं जहाँ के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित से ज़्यादा है। राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह मात्रा काफी ज़्यादा है। पश्चिम बंगाल, झारखण्ड , बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और मणिपुर राज्यों के सैम्पल में आर्सेनिक पाया गया। देश के 263 जिले ऐसे हैं जहाँ के भूजल में फ्लोराइड तक पाया गया। ‘जल शक्ति मन्त्रालय’ की वेबसाइट पर उपलब्ध डेटा के मुताबिक़ देश के 1668 गाँव ऐसे हैं जिनके पानी में ख़तरनाक आर्सेनिक पाया गया है। इसी तरह 12338 गाँवों के पानी में आयरन, 431 गाँवों में सल्फेट, 3460 गाँवों में फ्लुओराइड और 8379 गाँवों के पानी में नाइट्रेट पाया गया। 1650 गाँवों का पानी pH और 2516 गाँवों का पानी TDS के मानकों पर खरा नहीं उतरता। अगर बैक्टीरिया वाले प्रदूषण की बात करें तो 17394 गाँवों के पानी में टोटल कोलीफॉर्म (मल वाले जीवाणु) पाए गए, जिसे पीने का मतलब है बीमार पड़ना। ‘केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड’ (CBCB) की 2025 की रिपोर्ट बताता है कि नेशनल वाटर क्वालिटी मॉनीटरिंग प्रोग्राम (NWMP) के तहत देश की 645 नदियों में 2155 जगहों पर पानी की गुणवत्ता की जाँच से पता चला कि नदियों में 804 जगहों का पानी नहाने लायक नहीं था क्योंकि इस पानी में बायोलॉजिकन ऑक्सीजन डिमाण्ड (BOD) मानक से ज़्यादा थी। इसे 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होना चाहिए। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो वाटर क्वालिटी इण्डेक्स में कुल 122 देशों में भारत 120वें नम्बर पर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट बताती है कि साल 2022 में दुनियाभर के 170 करोड़ लोगों ने ऐसे स्रोतों का पानी पिया जो दूषित थे।

भारत के शहर हर दिन भारी मात्रा में अपशिष्ट जल उत्पन्न करते हैं। नीति आयोग के अनुमानों के अनुसार, 2020-21 के दौरान शहरी क्षेत्रों में लगभग 72,368 मिलियन लीटर प्रति दिन (MLD) अपशिष्ट जल उत्पन्न हुआ। इस अपशिष्ट जल का लगभग 72% अनुपचारित रहता है और नदियों, झीलों या भूजल में छोड़ दिया जाता है। इससे हैजा, दस्त, पेचिश, हेपेटाइटिस ए, टाइफाइड और पोलियो जैसी बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है, ख़ासकर घनी आबादी वाली शहरी बस्तियों में। इसके अलावा पुरानी पाइपलाइन, रेगुलर मेंटेनेंस की कमी, और नई ट्रीटमेण्ट सुविधाओं आदि की कमी और सरकारी भ्रष्टाचार के करण यह स्थिति और भी भयंकर हो जाती है। इस स्थिति के बारे में पूँजीवादी उत्पादन के शुरुआती दौर में ही मार्क्स ने लन्दन में टेम्स नदी में बढ़ते प्रदूषण के बारे में लिखा था – “लन्दन में वे यानी नीति-नियन्ता इससे बेहतर कुछ नहीं कर ही नहीं सकते कि 45 लाख लोगों के मलमूत्र को काफी पैसा ख़र्च कर पर टेम्स नदी में मिलने दें।”

आखिर इस स्थिति के कौन ज़िम्मेदार है? मज़दूरों और मेहनतकशों को यह साफ़ समझ लेना चाहिए पेयजल की इस बुरी स्थिति, पानी से होने वाली बीमारियों और मौतों की जड़ में मौजूदा मानवद्रोही फ़ासीवादी सरकार की आपराधिक लापरवाही और मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था है। वास्तव में पूँजीवादी व्यवस्था में श्रमशक्ति का शोषण और प्रकृति का भयानक दोहन आम नियम है। जिस तरह श्रमशक्ति की लूट और प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन पूँजीवादी व्यवस्था का आम नियम है उसी तरह औसत मुनाफ़े की दर में कमी की समस्या (आर्थिक संकट) भी पूँजीवादी उत्पादन के नियमों से ही जन्म लेने वाली आम समस्या है। वर्तमान दौर में भारत समेत विश्व पूँजीवादी व्यवस्था दीर्घकालिक आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रही है। मुनाफ़े की औसत दर को बरक़रार रखने के लिए पूँजीपति वर्ग श्रमशक्ति की लागत को घटाने के अलावा प्रकृति के अन्धाधुन्ध दोहन के रास्ते में प्रकृति के संरक्षण से सम्बन्धित क़ानूनों से भी मुक्त होने की पूरी कोशिश करता है ताकी इस ख़र्च से भी वो पल्ला झाड़ सके। (वैसे तो क़ानून होने पर भी पूँजीपति वर्ग शासक वर्ग से साठ-गाँठ कर अवैध तरीक़े से प्रकृति संरक्षण सम्बन्धी क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाता रहता है।) मोदी सरकार और विभिन्न राज्यों में भाजपा सरकार द्वारा पुराने श्रम क़ानूनों में संशोधन कर ‘चार लेबर कोड’ लागू करने के पीछे यही मंशा है।  इसके ज़रिये प्रकृति के संरक्षण सम्बन्धी क़ानूनों को पूँजीपतियों के भरोसे छोड़ दिया गया है। जिन मामलों में उल्लंघन करने पर पूँजीपतियों को कड़ी सज़ा का प्रावधान था, उसे मामूली जुर्माने में बदल दिया है। यानी अब पूँजीपति वर्ग प्रकृति के संरक्षण के सम्बन्ध में होने वाले ख़र्चों से फ़ारिग़ हो गया। पूँजीपति उत्पादन की मूल प्रेरक शक्ति तात्कालिक मुनाफ़ा है, भले ही प्रकृति पूरी तरह तबाह-बर्बाद हो जाए। इसी मुनाफ़े की हवस को अबाध तौर पर पूरा करने के लिए ही पूँजीपतियों ने फ़ासीवादी भाजपा को सत्ता में पहुँचाया था और अब फ़ासीवादी भाजपा इस काम को ब-ख़ूबी अंजाम दे रही है। मेहनतकश आबादी की लूट पहले से काफ़ी तेज़ कर दी गयी है। प्रकृति का अवैज्ञानिक अन्धाधुन्ध दोहन करने के लिए पूँजीपति वर्ग को छूट दे दी गयी है। चूँकि फ़ासीवादी भाजपा ने राज्य मशीनरी को अन्दर से कब्ज़ा कर लिया है इसलिए उनके इस कुकृत्य पर न्यायालय जैसी संस्थाओं का भी कोई नियन्त्रण नहीं है। उलटे उच्चतम न्यायालय के अरावली से लेकर तमाम जंगलों के कटने के मामले में सरकार के समर्थन में फ़ैसले या चुप्पी सच्चाई का बयान करने के लिए काफ़ी है। बाकी काम फ़ासीवादी भाजपा काले क़ानून, डण्डे के ज़ोर और जनता के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के ज़रिये कर लेती है।

मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था मेहनत की लूट और प्रकृति की बर्बादी के ज़रिये मेहनतकशों पर दोहरा हमला करती है। प्रकृति की बर्बादी सबसे अधिक मेहनतकश जनता के जीवन पर बुरा असर डालती है। अत्यधिक मेहनत से कमज़ोर पड़े मेहनतकशों का प्रदूषित हवा-पानी और बदहाल स्वास्थ्य सेवाएँ कचूमर निकाल देती है। मेहनतकश बेमौत मारे जाते हैं। हालाँकि प्रदूषण की मार से मेहनतकश तबके के अलावा अन्य वर्ग भी प्रभावित होते हैं और इस मसले पर वह भी सड़कों पर उतरता है। लेकिन उसकी वर्गीय दृष्टि उसे प्रकृति की बर्बादी के असली कारणों से यानी पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के कार्यभार तक नहीं ले जाती। मेहनतकश आबादी को यह समझना ही होगा कि साफ़ पानी, साफ़ हवा, बेहतर निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा उनका बुनियादी अधिकार है। प्रकृति को बचाने की लड़ाई में अन्य वर्गों को साथ (ज़ाहिरा तौर पर शोषक-शासक वर्ग को छोड़कर) लेकर तात्कालिक मुद्दों पर लड़ने के अलावा मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़कर मानवकेन्द्रित समाजवादी व्यवस्था का निर्माण ही एक मात्र रास्ता है।

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026

 

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