दिहाड़ी मज़दूरों की जिन्दगी!

जीउत राम, दिल्ली

मैं एक भवन निर्माण मज़दूर हूँ। मैं बिहार से रोजी-रोटी के लिए दिल्ली आया हूँ। यहाँ मुश्किल से 30 दिनों में 20 दिन ही काम मिल पाता है। जिसमें भी काम करने के बाद पैसे मिलने की कोई गारन्टी नहीं होती है। कहीं मिल जाते हैं तो कहीं दिहाड़ी भी मार ली जाती है। कोई-कोई मालिक तो जबरन पूरा काम करवाकर पैसे पूरे नहीं देते हैं और ज़्यादा समय तक काम करने पर उसका अलग से मज़दूरी भी नहीं देते हैं।

कई जगह मालिक पैसे के लिए इतना दौड़ाते हैं कि हमें लाचार होकर अपनी दिहाड़ी ही छोड़नी पड़ती है। यहाँ जगह-जगह लेबर चौक भी लगता है। जहाँ न बैठने की जगह है न पानी पीने की। चौक से जबरन कुछ मालिक काम पर ले जाते हैं, नहीं जाने पर पिटाई भी कर देते हैं।

दूसरी तरफ दिहाड़ी मज़दूरों की बदतर हालात सिर्फ़ काम की जगह नहीं बल्कि उनकी रहने की जगह पर भी है जहाँ हम तंग कमरे में रहते हैं। हमारे बच्चे मुश्किल से ही पढ़ने-लिखने जा पाते हैं। अगर हमारे परिवार में कोई बीमार हो जाता हैं तो हमारे सामने सस्ते इलाज के लिए झोलाछाप डाक्टर के सिवा कोई नहीं है और हमारी बीमार का भी कारण पीने का गन्दा पानी और नालियों में बजबजाते मच्छर हैं। हमें पेट काटकर ही जीना पड़ता है और ये स्थिति आसपास भी दिहाड़ी मज़दूरों की दिखती है।

वैसे तो अब कारख़ानों में भी मज़दूरों की यूनियन खत्म कर दी गयी है लेकिन निर्माण मजदूरों की हालत तो बहुत खराब है। यहाँ कोई एकजुटता नहीं होने से हमारा बहुत शोषण है। मजदूर आज यहाँ तो कल वहाण काम करते हैं, इसलिए भी एक जगह बँधकर एकजुट नहीं हो पाते। हालाँकि मैंने सुना हैै कि बाहर देशों में कंस्ट्क्शन लेबर की यूनियन भी होती हैं। हमें भी यूनियन बनाकर एक होना पड़ेगा वरना ये  मालिक हमको जीने नहीं देंगे और हमारे बच्चे भी ऐसे ही ग़रीबी-कंगाली में जीने के लिए मजबूर रहेंगे।

बिगुल के लेख अच्छे लगते हैं

राकेश कुमार, पानीपत

मैं ‘मज़दूर बिगुल’ लगभग हर अंक पढ़ता हूँ। मुझे इसके लेख बहुत अच्छे लगते हैं। यह अख़बार बहुत अच्छा काम कर रहा है क्योंकि इससे हमें वो सच्चाइयाँ मालूम पड़ती हैं जो कोई नहीं बताता।

मज़दूरों के साथ इस देश में क्या हो रहा है इसे कोई मीडिया नहीं दिखाता न ही कोई अख़बार इसे छापता है जबकि हम मज़दूरों के बिना ये चैनल और अख़बार भी नहीं चल सकते हैं।

चौबीसों घण्टे चलने वाले टीवी चैनलों में हम मज़दूरों के जीवन पर न तो कोई समाचार होता है और न ही मनोरंजन के नाम पर परोसे जाने वाले कार्यक्रमों में हमारी असली ज़िन्दगी दिखाई देती है।

मज़दूरों के संघर्षों के इतिहास के बारे में बिगुल में और भी जानकारी देते रहना चाहिए जिससे आज के निराशा के माहौल में हमें भी लड़ने की प्रेरणा मिले।

 

मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2025

 

 

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