सब याद रखा जायेगा! उत्तर प्रदेश के मेहनतकशों और मज़दूरों को 2027 के विधानसभा चुनावों के समय भूलना नहीं है
भाजपा की योगी सरकार द्वारा मालिकों और पूँजीपतियों की सेवा में मेहनतकशों-मज़दूरों पर थोपा गया अमानवीय शोषण, दमन, अन्याय और आतंक का राज
गायत्री भारद्वाज
2027 में आबादी के अनुसार देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हैं। कहते हैं कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। 2029 में देश के लोकसभा चुनाव हैं। पूरे देश में छात्रों-युवाओं ने मोदी सरकार के विरुद्ध अपनी भावनाओं को स्पष्ट कर दिया है। परीक्षा घोटालों, महँगी होती शिक्षा, घटती सीटों और बेरोज़गारी से त्रस्त छात्रों-युवाओं का देशव्यापी आन्दोलन पहला चरण पूरा करने के बाद अभी जारी है। छात्रों-युवाओं के दबाव के कारण मोदी सरकार को अपने शिक्षा मंत्री से इस्तीफ़ा दिलावाना पड़ा। मोदी-शाह अपने नेता-मंत्रियों से कह रहे हैं कि जेन-ज़ी की युवा पीढ़ी के बीच प्रचार करें! ज़ाहिरा तौर पर, झूठा प्रचार! लेकिन यह फ़ासीवादी तरीक़ा हमेशा काम नहीं करता है। इस समय छात्रों-युवाओं की करोड़ों की आबादी में मोदी सरकार की कोई तरक़ीब, कोई नुस्खा, कोई जुमला काम नहीं कर रहा है। हालिया दिनों में कई सर्वेक्षण सामने आ चुके हैं, जिसमें यह बात साफ़ तौर पर सामने आयी है कि देश के युवाओं की दो-तिहाई से भी बड़ी बहुसंख्या भाजपा और मोदी सरकार के बिल्कुल ख़िलाफ़ है। अब स्कूली छात्रों द्वारा भी उत्तर प्रदेश समेत देश के तमाम हिस्सों में स्कूलों की दयनीय स्थिति के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया गया है। यानी स्कूली छात्रों की बहुसंख्या भी अब मोदी सरकार और भाजपा सरकारों के विरुद्ध है। इनमें से लाखों-करोड़ों छात्र एक या दो साल बाद 2027 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों और 2029 के आम चुनावों में वोट डालने वाले हैं। छात्रों-युवाओं ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। हम मेहनतकशों और मज़दूरों का क्या? क्या हमने अपनी स्थिति स्पष्ट की है?
हम मज़दूर–मेहनतकश जानते हैं कि महज़ चुनावों से समाज में कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं आता है। न तो इतिहास में कभी आया है और न ही आयेगा। यह जनता के जुझारू क्रान्तिकारी आन्दोलन रहे हैं, जो सही राजनीतिक नेतृत्व और कार्यक्रम के मातहत समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने में सफल रहे हैं। मौजूदा मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर एक मानव-केन्द्रित समाजवादी व्यवस्था का निर्माण भी महज़ चुनावों के ज़रिये सम्भव नहीं है। एक क्रान्तिकारी मज़दूर-मेहनतकश पार्टी के नेतृत्व में जनता का जुझारू क्रान्तिकारी आन्दोलन ही इस लक्ष्य को हासिल कर सकता है।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि जब पूँजीवादी समाज में पूँजीवादी चुनावों की प्रक्रिया जारी हो तो मज़दूर–मेहनतकश तटस्थ बैठे रहते हैं, उस प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं करते? नहीं। यह क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग की सोच नहीं है, बल्कि काल्पनिक चिन्तन से ग्रस्त हिरावलपन्थियों और दुस्साहसवादियों की सोच है। क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग मज़दूर वर्ग के व्यापक जनसमुदायों को पूँजीवादी चुनावों की प्रक्रिया में रणकौशलात्मक हस्तक्षेप करने के लिए गोलबन्द और संगठित करता है। इसका लक्ष्य यह होता है कि पूँजीवादी चुनावों के क्षेत्र में एक स्वतंत्र मज़दूर-मेहनतकश विकल्प खड़ा किया जाय ताकि मज़दूरों, मेहनतकशों, ग़रीब किसानों की व्यापक बहुसंख्या को अपने ही शत्रु वर्गों यानी औद्योगिक, वित्तीय, वाणिज्यिक और खेतिहर पूँजीपति वर्ग तथा उसके पिछलग्गू उच्च मध्यवर्ग की नुमाइन्दगी करने वाली पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियों का पिछलग्गू बनने की त्रासदी का शिकार न होना पड़े और साथ ही चुनावों की प्रक्रिया में रणकौशलात्मक हस्तक्षेप के ज़रिये ही मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था की शोषण, दमन, उत्पीड़न, अन्याय और असमानता की घिनौनी सच्चाइयों को जनता की बहुसंख्या के सामने उजागर किया जा सके। मुख्यत: इन दो लक्ष्यों के मद्देनज़र चुनावी प्रक्रिया में क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी को रणकौशलात्मक हस्तक्षेप करना ही चाहिए और जनता के व्यापक जनसमुदायों में एक क्रान्तिकारी कार्यक्रम के आधार पर सघन और व्यापक क्रान्तिकारी प्रचार को आयोजित करना चाहिए।
इसके अलावा, मज़दूरों–मेहनतकशों को यह नहीं भूलना चाहिए कि पूँजीपति वर्ग के सभी राजनीतिक प्रतिनिधियों की प्रकृति और चरित्र हूबहू एकसमान नहीं होता है। उनमें से फ़ासीवादी पार्टी जैसे कि भाजपा व संघ परिवार और उसका शासन मज़दूर वर्ग और व्यापक मेहनतकश आबादी के सबसे बड़े शत्रु होते हैं। क्यों? क्योंकि वे आर्थिक मन्दी के दौर में संकट से बिलबिलाये पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े की हिफ़ाज़त के लिए जनता के दमन की किसी भी सीमा पर जाने को तैयार होते हैं। वे जनता को धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर इस क़दर बाँटते हैं जिस क़दर कोई अन्य पूँजीवादी दल नहीं बाँट सकता। वे किसी अल्पसंख्यक आबादी (जैसे कि मुस्लिम आबादी) को बहुसंख्यक समुदाय (हिन्दू आबादी) के समक्ष एक नक़ली दुश्मन के तौर पर खड़ा कर देते हैं ताकि उसके असली दुश्मन यानी पूँजीपति वर्ग और उसके शासन को बचाया जा सके और जनता अपने वर्ग के आधार पर संगठित न हो सके। इस प्रकार वे देश के मेहनतकशों-मज़दूरों, क्रान्तिकारी छात्रों-युवाओं, मेहनतकश दलितों-आदिवासियों और स्त्रियों के विरुद्ध टुटपुँजिया वर्गों का एक अन्धा प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन खड़ा करते हैं, जिसकी उन्मादी भीड़ में छोटे दुकानदारों, छोटे व्यवसायियों, व्यापारियों, दलालों, बिचौलियों, प्रापर्टी डीलरों, ट्रांसपोर्टरों, पूँजीवादी किसानों-कुलकों और भूस्वामियों की जमातों के लम्पट शामिल होते हैं। बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद् आदि के जुलूसों और जुटानों पर एक निगाह डालिये और आपको समझ में आ जायेगा कि हम क्या कह रहे हैं।
इस फ़ासीवादी उन्मादी भीड़ को पुलिस प्रशासन के संरक्षण में फ़ासीवादी पार्टी की सरकार हर उस जनान्दोलन पर कटखन्ने कुत्ते की तरह छोड़ देती है, जो फ़ासीवादी सरकार पर, फ़ासीवादी संगठन पर, पूँजीवादी व्यवस्था पर, पूँजीपति वर्ग की लूट और भ्रष्टाचार पर सवाल खड़े करते हैं और उसका विरोध करते हैं। हाल में, छात्रों-युवाओं के प्रगतिशील आन्दोलन पर क्या इसी प्रकार संघ परिवार और भाजपा की मोदी-शाह सरकार ने अपने लम्पटों के गिरोहों को हमला करने के लिए नहीं छोड़ दिया था? इसका जवाब जनता के संगठित और जुझारू फ़ासीवाद-विरोधी दस्ते ही दे सकते हैं। फ़ासीवाद के विरुद्ध जनता की जुझारू गोलबन्दी और संगठन के ज़रिये ही इनका मुक़ाबला किया जा सकता है। महज़ उदारवादी-सुधारवादी बातें करने से इनको सबक नहीं सिखाया जा सकता। जहाँ कहीं संघ परिवार के इन गुण्डा गिरोहों का सामना जुझारू तौर पर संगठित जनता से होता है, वहाँ वे अपनी हाफ़ पैण्ट गीली करते हुए भाग खड़े होते हैं। ये ऐसे श्वान दलों के समान होते हैं, जो तभी हमला करते हैं जब वे देखते हैं कि सामने ऐसे कमज़ोर लोग हैं, जो लड़ने को तैयार नहीं। जहाँ प्रतिरोध के लिए तैयार लोग होते हैं, वहाँ इनका क्या होता है, यह जन्तर-मन्तर पर जारी छात्र-युवा आन्दोलन के दौरान सभी ने देखा था। कुछ बार युवा जनता द्वारा सेवा-सत्कार होने के बाद, ये दिल्ली पुलिस के पीछे छिपकर ‘जय श्रीराम’ और ‘वन्दे मातरम’ चिल्लाने से ज़्यादा कुछ करने का साहस नहीं कर सके थे।
यह भी याद रखना चाहिए कि आज के दौर में फ़ासीवादी पार्टी सरकार में आने पर पूँजीवादी लोकतंत्र के खोल को समाप्त करेगी, इसकी सम्भावना नगण्य है। कहने को पूँजीवादी चुनाव होते रहेंगे, पूँजीवादी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ सतही तौर पर जारी रहेंगी, संसदीय विपक्षी पार्टियों पर औपचारिक तौर पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जायेगा, कहने को ट्रेड यूनियन व अन्य जन संगठन बनाने की आज़ादी होगी। लेकिन वास्तव में ईवीएम-एसआईआर और चुनाव मतगणना घपले के ज़रिये पहले से ही तय रहेगा कि सरकार किसकी बनेगी। देश के कई स्वतंत्र पत्रकार इस पूरी प्रक्रिया में मौजूद घालमेल को उजागर कर चुके हैं। विपक्षी पार्टियाँ भी इसके प्रमाण दे चुकी हैं। एसआईआर की साज़िश क्या है? जो मत देता है वह सरकार बनाता है, लेकिन आज के समय में भाजपा सरकार एसआईआर के ज़रिये तय कर रही है कि मत कौन देगा! यानी जनता सरकार को चुन पाये, उसके पहले सरकार जनता को चुनेगी! इसके अलावा, एसआईआर के ज़रिये एनआरसी लागू करने की ख़तरनाक फ़ासीवादी साज़िश भी पीछे के दरवाज़े से की जा रही है। इसके अलावा, ईवीएम के ज़रिये चुनावों में जो घपला हो रहा है, उस पर बार-बार पत्रकारों, वक़ीलों, विपक्षी पार्टियों समेत तमाम लोगों ने प्रमाणों के साथ सवाल खड़े किये हैं। और तो और, मतगणना में होने वाले घपले भी अब सामने आ रहे हैं। लेकिन भाजपा और संघ परिवार की सरकार की इस पूरी चार सौ बीसी पर न तो चुनाव आयोग कुछ कर रहा है और न ही न्यायपालिका। ज़रा सोचिये, एसआईआर में एक वैध मतदाता के नाम काटे जाने पर जब वह सर्वोच्च न्यायालय गया, तो सर्वोच्च न्यायालय ने उसे कहा कि इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं, एक चुनाव में वोट नहीं दे पाओगे तो क्या हो जायेगा!? मतलब, एसआईआर के ज़रिये भाजपा द्वारा उन वोटरों के नाम काटे जाने पर जिनके भाजपा के विरुद्ध वोट करने की सम्भावना है (मसलन, मुसलमान, दलित, ओबीसी, आदि) पर देश के सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि एक चुनाव में कोई वोट नहीं डाल पायेगा तो क्या हो जायेगा? नतीजतन, हो यह रहा है कि लोकतांत्रिक चुनावों का बस खोल ही बचा हुआ है, उसकी अन्तर्वस्तु ह्रास की लम्बी प्रक्रिया से गुज़र रही है।
उसी प्रकार, संसदीय विपक्षी पार्टियों पर औपचारिक तौर पर प्रतिबन्ध नहीं है, मगर ईडी-सीबीआई व न्यायपालिका द्वारा उनके काम करने और प्रकार्य को ही वस्तुत: इतना अवरुद्ध कर दिया गया है कि अपने बूते पर फ़ासीवादी संगठन और सरकार (यानी आर.एस.एस.-भाजपा) के लिए चुनौती बन पाना कांग्रेस, सपा, राजद, आदि जैसी विपक्षी पार्टियों के लिए लगभग नामुमकिन हो गया है। यह बात दीगर है कि किसी स्वत:स्फूर्त जनान्दोलन की पीठ पर सवार होकर विपक्षी पार्टियों का गठबन्धन चुनावों में भाजपा को हरा दे, यह बिल्कुल असम्भव बात नहीं है। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है कि भाजपा और संघ परिवार ने राज्य के समूचे उपकरण पर अपने आन्तरिक कब्ज़े द्वारा पूँजीवादी संसदीय विपक्ष को भी अधिक से अधिक निष्प्रभावी बनाने का काम किया है। इसके अलावा, संसद और विधानसभा में होने वाली कार्रवाइयों का ही कोई विशेष मतलब नहीं रह गया है। संसद अध्यक्ष द्वारा विपक्षी पार्टियों द्वारा हस्तक्षेप को ही इतना मुश्किल बना दिया गया है कि उनके द्वारा कोई असरदार दख़लन्दाज़ी करना ही लगभग नामुमकिन हो गया। ऊपर से समूचे मुख्यधारा मीडिया का मालिकाना दो-तीन बड़े कारपोरेट पूँजीपतियों के हाथ में सिमट गया है और मोदी-शाह उनके चहेते हैं। नतीजतन, मुख्यधारा मीडिया आज गोदी मीडिया ही हो सकता है। संक्षेप में, जिन्हें “लोकतंत्र के खम्बे” कहा जाता है, वे फ़ासीवादी शक्तियों के आन्तरिक कब्ज़े में हैं।
लेकिन असल बात यह है कि भाजपा और संघ परिवार तथा उसकी सरकार उपरोक्त सारे कारनामे करने में क़ामयाब इसलिए होते हैं क्योंकि पिछले क़रीब आठ दशकों में संघ परिवार ने भारत की समूची पूँजीवादी राज्यसत्ता में आन्तरिक घुसपैठ की दीर्घकालिक प्रक्रिया चलाकर उस पर, मूलत: और मुख्यत:, अन्दर से कब्ज़ा जमा लिया है। यही वजह है कि न्यायपालिका, ईडी, सीबीआई, केचुआ (केन्द्रीय चुनाव आयोग) से लेकर पुलिस और सशस्त्र बलों तक किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मातहत या किसी लोकतांत्रिक जवाबदेही के मातहत नहीं, बल्कि संघ परिवार और भाजपा के इशारों पर काम करते हैं और सीधे-सीधे पूँजीवादी लोकतंत्र के नियमों का भी उल्लंघन करते हुए जनता के ऊपर दमन और अन्याय का राज थोपते हैं। हालिया छात्र-युवा आन्दोलन के दौरान जो पुलिसिया दमन हुआ वह इसी बात को साबित करने वाला एक उदाहरण था। सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अगस्त को जो मज़दूर-विरोधी फ़ैसला दिया उसके अनुसार ‘उद्योग’ की व्यापक परिभाषा को रद्द कर दिया गया। इसका नतीजा यह होगा कि बहुत सारे सरकारी उद्यमों और उपक्रमों के मज़दूर अब उद्योग में रोज़गारशुदा माने ही नहीं जायेंगे और नतीजतन उनके सारे श्रम अधिकार उनसे छीन लिये जायेंगे। कहने को ट्रेड यूनियन बनाने की आज़ादी है, लेकिन श्रम विभागों को अनकहा आदेश है कि कोई नयी ट्रेड यूनियन पंजीकृत ही नहीं की जायेगी और ऊपर से नये लेबर कोड वैसे भी ट्रेड यूनियन बनाने और सामूहिक मोलभाव के मज़दूरों के अधिकार को प्रभावत: समाप्त ही कर देते हैं। इस फैसले के पहले भी राम मन्दिर मसले पर, सीएए-एनआरसी मसले पर, राजनीतिक क़ैदियों को बिना मुक़दमा चलाये सालों-साल तक जेलों में रखने आदि के मसलों पर न्यायपालिका पहले ही दिखला चुकी है कि उसका प्रकार्य मौजूदा फ़ासीवादी सरकार के मंसूबों को सफल करने में सहायता करना और सहयोगी भूमिका निभाना रह गया है।
ख़़ैर, इस बात को, जो ‘मज़दूर बिगुल’ पिछले 18 साल से कहता रहा है (जब मोदी सरकार बनी भी नहीं थी), आज सभी गम्भीर लोग मानते हैं कि 21वीं सदी में फ़ासीवाद हूबहू उसी प्रकार से नहीं आयेगा, जिस प्रकार वह 1920 के दशक के इटली और 1920-30 के दशकों में जर्मनी में आया था। यानी, आज पूँजीवादी लोकतंत्र के खोल या रूप को त्यागने की कोई आवश्यकता फ़ासीवाद को नहीं है क्योंकि पूँजीवादी लोकतंत्र और एक राजनीतिक वर्ग के तौर पर पूँजीपति वर्ग की लोकतांत्रिक सम्भावनाओं में इस क़दर गिरावट आयी है, कि उसके रूप को बरक़रार रखते हुए फ़ासीवाद पूँजी की सेवा में अपने ऐतिहासिक कार्यभार को पूरा कर सकता है: यानी मन्दी के दौर में मज़दूर वर्ग व मेहनतकश जनता का तानाशाहाना दमन और मज़दूर वर्ग के किसी भी सम्भावित प्रतिरोध के विरुद्ध टुटपुँजिया वर्गों का एक प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन खड़ा करना, जिसके निशाने पर एक नक़ली दुश्मन होगा, जैसे कि भारत में मुसलमान, ताकि असली दुश्मन यानी पूँजीपति वर्ग और पूँजीवादी व्यवस्था को कठघरे से बाहर किया जा सके और हर प्रकार के राजनीतिक विरोध का दमन करना। यह काम करने के लिए आज के फ़ासीवाद को पूँजीवादी लोकतंत्र के खोल को त्यागने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि बीसवीं सदी की शुरुआत से ही और विशेष तौर पर 1970 के दशक से यानी दीर्घकालिक मन्दी के दौर में पूँजीवादी लोकतंत्र की पूँजीवादी लोकतांत्रिक अन्तर्वस्तु ही कमज़ोर होती गयी है। आज वह पूँजीवादी राज्यसत्ता के समूचे उपकरण पर, पूँजीवाद के विचारधारात्मक उपकरणों मसलन मीडिया, शिक्षा तंत्र आदि पर आन्तरिक कब्ज़ा कर इस काम को कर सकता है।
लेकिन यह बिल्कुल मुमकिन है कि इसके बावजूद फ़ासीवादी शक्तियाँ विशिष्ट स्थितियों में सरकारी सत्ता से बाहर जा सकती हैं, हालाँकि इससे राज्यसत्ता के उपकरण में और सामाजिक ताने-बाने में उनकी पहुँच-पकड़ समाप्त नहीं होती। ऐसे में, चूँकि पूँजीवादी लोकतंत्र का रूप क़ायम रहता है, इसलिए अभूतपूर्व और आपवादिक जनअसन्तोष की स्थितियों में फ़ासीवादी पार्टी चुनाव हारकर सरकारी सत्ता से बाहर जा सकती है, हालाँकि यह उसकी निर्णायक पराजय या अन्त नहीं होगा। वह पूँजीवादी मन्दी के गहराने, क्रान्तिकारी शक्तियों के बिखराव और जनता के बीच उनकी पहुँच-पकड़ की कमी, और नतीजतन समाज में अन्धी प्रतिक्रिया के माहौल के फिर से गरमाने की सूरत में वापस सरकारी सत्ता पर भी कब्ज़ा हासिल करती है। यह उसके लिए अपेक्षाकृत सुगम इसलिए भी होता है क्योंकि राज्यसत्ता के समूचे उपकरण पर फ़ासीवादी शक्तियों की पहले ही गहरी पकड़ होती है, चाहे वह पुलिस, सेना व सशस्त्र बल हों, नौकरशाही हो, कार्यपालिका के अन्य अंग-उपांग हों, न्यायपालिका हो या फिर सरकारी मीडिया तंत्र। इस तौर पर, अब फ़ासीवादी शक्तियों का निर्णायक अन्त मज़दूर समाजवादी क्रान्ति के साथ ही सम्भव है। इसलिए दीर्घकालिक संकटग्रस्त पूँजीवाद के दौर में यदि किसी देश में फ़ासीवादी शक्तियाँ संगठित हों तो ऐसे देशों में एक फ़ासीवादी राजनीतिक अवधि की अवधारणा को समझना आज महत्वपूर्ण है। इस अवधि में फ़ासीवादी शक्तियाँ पूँजीवादी राज्यसत्ता के फ़ासीवादी रूपान्तरण की अन्तरविरोधपूर्ण प्रक्रिया को जारी रखती हैं, जो कभी पूर्णता पर नहीं पहुँचती। वे सरकारी सत्ता में अधिकांश समय मौजूद रहती हैं। लेकिन उससे आपवादिक जनअसन्तोष के अधिक ठोस रूप ग्रहण करने की सूरत में सरकारी सत्ता से बाहर भी जा सकती हैं। सरकारी सत्ता से बाहर जाने पर भी फ़ासीवादी शक्तियाँ राज्यसत्ता के समूचे उपकरण में मौजूद फ़ासीवादी घुसपैठ और समाज के पोरों में अपनी पहुँच-पकड़ (आणविक व्याप्ति) बरक़रार रहती हैं, उसे बढ़ाने का निरन्तर प्रयास करती हैं और फिर से सरकारी सत्ता को प्राप्त करने की प्रक्रिया चलाती हैं।
यह भी ग़ौरतलब है कि इस दौर में भी कोई अन्य पूँजीवादी पार्टी, जैसे कि कांग्रेस या विपक्षी दलों का कोई गठबन्धन, फ़ासीवादी शक्तियों पर कोई निर्णायक चोट न तो कर सकता है और न ही करना चाहता है। आज चाहे राहुल गाँधी या अखिलेश यादव कितने ही तेवर क्यों न दिखा लें, जब और अगर वे सत्ता में आते हैं, तो क्या वे आर.एस.एस. और उसके अनुषंगी संगठनों पर लगाम कसेंगे जो जनता और मेहनतकश वर्गों को अपने फ़ासीवादी दस्तों से आतंकित करने का काम लगातार करते हैं? नहीं। वजह? वजह यह है कि पूँजीपति वर्ग के लिए दीर्घकालिक मन्दी के दौर में अपने फ़ासीवादी राजनीतिक दल की आवश्यकता निरन्तर बनी रहती है। इसलिए वह अपने किसी अन्य पूँजीवादी राजनीतिक दल मसलन कांग्रेस को भी फ़ासीवादी शक्तियों पर लगाम कसने की इजाज़त नहीं देता। ऊपर से ऐतिहासिक तौर पर कांग्रेस के भीतर ही एक धुर-दक्षिणपंथी और अक्सर धार्मिक पुनरुत्थानवादी लॉबी हमेशा से ही रही है। यही कारण है कि राहुल गाँधी ने बयान दिया कि अगर कांग्रेस–नीत कोई भी सरकार बनती है, तो वह आर.एस.एस. की अभिव्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करेंगे! लेकिन जिस फ़ासीवादी शक्ति ने कभी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की परवाह ही नहीं की, जिसके गुरू गोलवलकर खुले तौर पर इतालवी फ़ासीवाद और जर्मनी नात्सीवाद के समर्थक थे, जिसकी सरकारों ने पूँजीवादी लोकतंत्र को हमेशा बरबाद करने का ही प्रयास किया है, उसके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की बात कैसे की जा सकती है? यह वैसी ही बात होगी कि हम हिटलर और मुसोलिनी के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करेंगे! यही कारण है कि कर्नाटक में सरकार बनाने पर बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने के अपने वायदे से भी सरकार बनने के बाद कांग्रेस पार्टी मुकर गयी। कांग्रेस की तमाम सरकारों के दौरान ही फ़ासीवादी विषबेल को पनपने और फलने-फूलने का पूरा अवसर दिया गया और उसके प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन को भी खाद-पानी दिया गया ताकि क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनता के प्रतिरोध से निपटने का एक ‘ट्रम्प कार्ड’ पूँजीपति वर्ग के पास हमेशा मौजूद रहे। और समाजवादियों ने तो गाँधी की हत्या के बाद हाशिये पर चली गयी आर.एस.एस. को मुख्यधारा की पूँजीवादी राजनीति में वापस लाने में विशेष भूमिका निभायी थी। इसीलिए सरकारी सत्ता से चुनाव हारकर बाहर जाने के बाद भी फ़ासीवादी अवधि के दौरान कोई अन्य पूँजीवादी पार्टी भी सरकार में होने पर आर.एस.एस. और समूचे संघ परिवार पर कोई लगाम नहीं कसने वाली, हालाँकि इस बात के पर्याप्त प्रमाण मौजूद है जिसके आधार पर पूँजीवादी क़ानून के दायरे में ही आर.एस.एस. और उसके अनुषंगी संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित करके प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए। ग़ौरतलब है कि खुद यशवन्त सहदेव शिन्दे नामक एक भूतपूर्व आर.एस.एस. प्रचारक ने गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर तमाम बम विस्फोटों और सशस्त्र कार्रवाइयों में आर.एस.एस. की संलग्नता के आधार पर उसे आतंकवादी संगठन घोषित कर उस पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग की है। लेकिन क्या कोई कांग्रेस या तीसरे मोर्चे की सरकार ऐसा करेगी? नहीं। सवाल राहुल गाँधी की इच्छाशक्ति का नहीं है (वैसे तो ऐसी कोई इच्छाशक्ति भी अब तक गाँधी द्वारा दिखायी नहीं गयी है), बल्कि इस बात का है कि देश का मालिक वर्ग क्या चाहता है।
लेकिन फिर भी सरकारी सत्ता से फ़ासीवादी शक्तियों के अस्थायी तौर पर बाहर जाने के कारण क्रान्तिकारी मज़दूर शक्तियों को और समूचे मज़दूर वर्ग को एक मोहलत और राहत मिलती है। फ़ासीवादी शक्तियों को सरकारी सत्ता से बाहर जाने पर एक तात्कालिक झटका अवश्य लगता है। उसके लम्पटों की ब्रिगेड के हौसले कुछ पस्त हो जाते हैं, हालाँकि आर.एस.एस. के कैडर संगठन के तत्वों को ऐसी घटनाओं से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। वे समाज की जड़ों में ज़हर घोलने के अपने प्रोजेक्ट पर निरन्तर काम जारी रखते हैं। लेकिन सरकारी सत्ता से बाहर होने पर उनकी आक्रामक क्षमताओं में तात्कालिक तौर पर कमी आती है। इसलिए मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनता को एक तात्कालिक कार्यभार के तौर पर जब भी और जहाँ भी मौक़ा मिले, फ़ासीवादी पार्टी भाजपा को सरकारी सत्ता से चुनावों में हराकर बाहर करने के विशिष्ट रणकौशल पर अमल करना चाहिए।
उत्तर प्रदेश की मेहनतकश जनता और मज़दूर वर्ग के लिए यह एक महत्वपूर्ण सबक है। योगी आदित्यनाथ के राज में अगर किसी वर्ग के ऊपर पूँजी की तानाशाही को सबसे नग्न और बर्बर तौर पर लागू किया गया है, तो वह मज़दूर और मेहनतकश हैं। इसके कई उदाहरण पिछले दस वर्ष में योगी सरकार ने मुहैया कराये हैं, चाहे वह तमाम सरकारी विभागों के कर्मचारियों व मज़दूरों का मसला हो, कारखाना-मज़दूरों का मसला हो या आँगनवाड़ी व आशाकर्मियों का मसला हो। लेकिन इसका सबसे प्रातिनिधिक उदाहरण हालिया दिनों में वेतन वृद्धि, डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान और अन्य वाजिब श्रम अधिकारों के लिए मज़दूरों द्वारा नोएडा में किया गया आन्दोलन था। इस आन्दोलन को योगी आदित्यनाथ की सरकार ने किस बेरहमी से कुचला, उससे हर मज़दूर-मेहनतकश वाक़िफ़ है।
मज़दूर वर्ग नोएडा में सड़कों पर उतरने को मजबूर हुआ क्योंकि कमरतोड़ महँगाई, बढ़ते आवास किराये, रसोई गैस की भयंकर रूप से बढ़ती क़ीमतों के कारण मज़दूरों के लिए जीवन व्यतीत करना ही मुश्किल हो गया था। स्वयं सोचें: भला 10-11 हज़ार रुपये महीने में मज़दूर अपना और अपने परिवार का गुज़ारा कैसे कर सकता है? कहने के लिए आदित्यनाथ की सरकार ने वेतन में मामूली सी बढ़ोत्तरी कर उसे 13-15 हज़ार रुपये करने का ऐलान किया, लेकिन एक ओर तो यह बढ़ोतरी ही मज़दूरों का अपमान था और दूसरी ओर नोएडा की तमाम कम्पनियों ने इस बढ़ोतरी को भी समुचित तरीक़े से लागू नहीं किया।
वहीं दूसरी ओर, योगी सरकार ने सैकड़ों मज़दूरों को और दर्जनों मज़दूर एक्टिविस्टों व सामाजिक कार्यकर्ताओं को, जो नोएडा के मज़दूर आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे, हिंसा फैलाने के नाम पर गिरफ़्तार कर लिया। कई हफ़्तों और कई महीनों तक मज़दूरों, यहाँ तक कि नाबालिक लड़कों तक को जेलों में बन्द रखा गया और प्रताड़ित किया। इसका खुलासा कई अख़बारों व मीडिया संस्थानों की रपटों में किया जा चुका है। अभी भी कई मज़दूर और मज़दूर कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र-युवा और पत्रकार इस आन्दोलन के समर्थन और उसमें शिरक़त के कारण जेलों में हैं। इसमें सत्यम वर्मा, रूपेश राय, आदित्य आनन्द, आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता, मनीषा चौहान, योगेश मीणा और हिमांशु ठाकुर शामिल हैं। इन पर 11-12 एफआईआर दर्ज की गयी हैं। सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी को बस जेल में रखने की ख़ातिर अन्यायपूर्ण तरीके़ से उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून की धारा तक लगा दी गयी है, मानो मज़दूरों के हक़ों से “राष्ट्र” को ख़तरा हो। इन एक्टिविस्टों पर पुलिस अभी तक अदालत में जारी मामलों में कोई भी ठोस प्रमाण नहीं पेश कर पायी है, जैसा कि न्यायालय को भी कई एफआईआर में ज़मानत देते हुए मानना पड़ा है। इस बारे में भी तमाम अख़बारों और मीडिया संस्थानों में विस्तृत रिपोर्टें आ चुकी हैं। यहाँ तक कि इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की गयी गिरफ़्तारियों में भी तयशुदा क़ानूनी प्रक्रिया पर अमल न करने के गम्भीर आरोप मौजूद हैं और इसके कई प्रमाण मीडिया में खुले तौर पर मौजूद भी हैं। इसके अलावा, इस बात के भी स्पष्ट संकेत और प्रमाण पेश किये गये हैं और आरोप लगाये गये हैं कि एक शान्तिपूर्ण रूप से न्यायपूर्ण माँगों पर जारी मज़दूर संघर्ष में हिंसा भड़काने में कहीं न कहीं उत्तर प्रदेश पुलिस का ही हाथ था क्योंकि उनके लोग ही व्हाट्सएप ग्रुपों में घुसकर हिंसा भड़काने वाले सन्देश व तस्वीरें डाल रहे थे। इसकी पूरी सच्चाई तभी सामने आयेगी जब सर्वोच्च न्यायालय में इस बाबत जारी मुक़दमे में न्यायपालिका किसी उच्चस्तरीय न्यायिक जाँच का आदेश दे।जो भी हो, यह स्पष्ट है कि नोएडा के मज़दूर कोई अपराध नहीं कर रहे थे। वे कोई आतंकवादी नहीं हैं। वे बस अपनी वाजिब आर्थिक माँगों के लिए आन्दोलन कर रहे थे। लेकिन पूँजीपतियों और नोएडा की कम्पनियों के इशारे पर योगी सरकार की उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनका बर्बर दमन किया और उनका उत्पीड़न अभी भी जारी है। उत्तर प्रदेश के मज़दूरों और मेहनतकशों को प्रण लेना चाहिए कि वे इस बर्ताव को भूलेंगे नहीं, इस दमन के विरुद्ध एक जुझारू प्रतिरोध संगठित करेंगे। साथ ही, तात्कालिक तौर पर मज़दूरों और मेहनतकशों को याद रखना चाहिए कि योगी सरकार और उसकी पुलिस के इस अन्यायपूर्ण और दमनकारी बर्ताव के मद्देनज़र 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में उन्हें भाजपा का पूर्ण बहिष्कार करना है।
भाजपा सरकारें, केन्द्र में व हर राज्य में, मज़दूरों की सबसे बड़ी दुश्मन साबित हुई हैं। यह बात हरेक सचेत मज़दूर और मेहनतकश को पता है। न सिर्फ़ नोएडा में बल्कि बरौनी में, पानीपत में, सूरत में और हर जगह भाजपा सरकारों के राज में पूँजीपतियों के हितों को साधने के लिए मज़दूरों की हर आवाज़ का क्रूरता से दमन किया गया है। अगर आप मज़दूरों की औसत मज़दूरी की राज्यवार पड़ताल करें, तो पाएँगे कि दिल्ली को छोड़ दें (जहाँ क़ानूनी काग़ज़ी न्यूनतम मज़दूरी कुछ ज़्यादा होने के ऐतिहासिक व आर्थिक कारण हैं और जो लागू भी नहीं होती!), तो अधिकांश भाजपा-शासित राज्यों में मज़दूरों की औसत मज़दूरी सबसे निचली कतारों में आती है। सभी भाजपा-शासित राज्यों में ठेकाकरण की रफ़्तार सबसे तेज़ है। श्रम कानूनों के उल्लंघन के मामले में भी भाजपा-शासित राज्य ही सबसे आगे हैं।
ऐसे में, सवाल यह उठता है कि क्या मज़दूर और मेहनतकश अपने ही सबसे बड़े शत्रु को चुनावों में वोट देंगे? क्या वे धर्म के नाम पर, साम्प्रदायिक उन्माद में बहकर वोट देंगे? या फिर वे अपने वर्ग हितों पर संगठित होकर, वर्ग चेतना के साथ अपने सबसे बड़े शत्रु को सरकारी सत्ता से बाहर करेंगे? कोई अन्य पूँजीवादी सरकार भी मज़दूरों के पक्ष में कोई बड़ा क़दम नहीं उठाने वाली है। वह भी ज़रूरत आन पड़ने पर दमन का रास्ता अख्तियार करेगी। वह भी पूँजी के हितों की ही सेवा करेंगी। इसीलिए तो वे पूँजीवादी पार्टियाँ हैं! लेकिन सभी पूँजीवादी पार्टियों में भी फ़ासीवादी पूँजीवादी पार्टी भाजपा मज़दूरों की सबसे बड़ी दुश्मन है। इस बात को विशेष तौर पर पिछले डेढ़ दशक के अनुभव से देश के मज़दूर-मेहनतकश भी समझ रहे हैं। इसलिए अपने संघर्ष को पुनर्गठित करने और मज़दूरों को गोलबन्द और संगठित करने का पहला क़दम यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस ने उत्तर प्रदेश के मज़दूरों के साथ नोएडा और अन्य तमाम ज़िलों में जो अन्याय किया है, उनका जो दमन किया, उनका जिस प्रकार उत्पीड़न किया, जिस प्रकार धन्नासेठों और पूँजीपतियों की सेवा की है, उसके बदले में 2027 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का पूर्ण बहिष्कार किया जाय।
हमें 5 किलो अनाज की भीख और चुनावों के दौरान बँटने वाले लिफ़ाफ़ों पर नहीं बिकना है। हमें धार्मिक उन्माद और जातिवाद की हवा में कतई नहीं बहना है। हमें अपने वर्ग हितों पर एकजुट होकर अपने संघर्ष का यह पहला क़दम उठाना है और भाजपा को उत्तर प्रदेश में सरकारी सत्ता से बाहर करना है। यह बात हरेक मेहनतकश को याद रखनी है, चाहे वह मज़दूर हो, ग़रीब किसान हो, बिजली विभाग से लेकर शिक्षा विभाग के ‘सी’ व ‘डी’ ग्रुप के तथा ठेका कर्मचारी हों, उत्तर प्रदेश के आन्दोलनरत छात्र-युवा हों, ग़रीब दलित, आदिवासी व स्त्री हों। किसी नये जुमले के चक्कर में नहीं आना होगा। किसी प्रकार की नयी ख़ैरात बँटने पर अपने वर्ग हितों को तिलांजलि नहीं देनी होगी क्योंकि चुनाव आते ही तरह-तरह की ख़ैरात योगी सरकार बाँटकर आपको घूस देने का प्रयास करेगी ताकि उत्तर प्रदेश के मज़दूर-मेहनतकश योगी सरकार द्वारा पिछले दस वर्षों में उनके साथ किये गये अन्यायपूर्ण और अपमानजनक व्यवहार को भूल जायें, हिन्दू-मुसलमान के फ़र्ज़ी मसलों में उलझ जाएँ और धार्मिक उन्माद में बहकर वोट दें। इस झाँसे में कतई नहीं आना है।
वैसे तो भाजपा और संघ परिवार के “धर्मध्वजाधारियों” का चाल–चेहरा–चरित्र राम मन्दिर के चन्दा–चोरी घोटाले में उजागर हो चुका है! घपले-घोटाले करके भाजपा और संघ परिवार के नेतागण इहलोक में ही परलोक का पूरा मज़ा लेने पर आमादा हैं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने मुख्य आरोपी और भाजपा के चहेते चम्पत राय को दोषमुक्त कर दिया है! भाजपा नेता जिस नारे पर अमल कर रहे हैं वह है ‘राम नाम की लूट मची है, लूट सके तो लूट!’ अगर कोई बहुत धार्मिक भी है, तो इससे कम-से-कम भाजपा के धर्मध्वजाधारियों के बारे में उसकी आँखें खुल जानी चाहिए!
वैसे भी मज़दूर वर्ग का नारा है – ‘धर्म को पूर्ण रूप से व्यक्तिगत मसला बनाओ! धर्म को राजनीति और सामाजिक जीवन से पूर्ण रूप से अलग करो!’ इस नारे को आप कभी न भूलें। यह बात भारत में सबसे उम्दा तरीक़े से मज़दूर वर्ग का पक्ष लेने वाले महान क्रान्तिकारी शहीदे–आज़म भगतसिंह ने बतायी थी जब उन्होंने कहा था कि अलग-अलग धर्म मानने या कोई धर्म न मानने के बावजूद तमाम मज़दूरों को अपनी राजनीति पर अपने वर्ग हितों के अनुसार एकजुट होना चाहिए, चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हों, बौद्ध हों या फिर नास्तिक। जैसे ही धर्म का चश्मा उतरता है, इंसान को अपने जीवन की ठोस सच्चाइयाँ नज़र आने लगती हैं। इसलिए अपने राजनीतिक व सामाजिक जीवन के निर्णयों में धर्म को कोई स्थान न दें। धर्म, पूजा पद्धति आपका निजी मसला है और आप अपने घर में कौन-सा धर्म या पूजा पद्धति अपनाते हैं, इसका आपके वर्ग हितों से कोई लेना-देना नहीं है।
इसलिए उत्तर प्रदेश के मज़दूरों-मेहनतकशों को अपने जुझारू जनान्दोलन खड़े करने की तत्काल तैयारी करनी होगी। उन्हें संगठित होना होगा। उन्हें साम्प्रदायिक फ़ासीवाद की राजनीति को नकारना होगा। उन्हें किसी भी प्रकार के धार्मिक व जातिगत बँटवारे को नकारना होगा। और एक महत्वपूर्ण तात्कालिक कार्यभार के तौर पर अगले वर्ष के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मेहनतकश जनता की सबसे बड़ी दुश्मन फ़ासीवादी भाजपा का पूर्ण बहिष्कार करना होगा। यह एक विशिष्ट तात्कालिक रणकौशलात्मक क़दम है, जो उत्तर प्रदेश के उन मेहनतकशों-मज़दूरों को उठाना होगा जो बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, दमन, घटती वास्तविक मज़दूरी और बोझ ढोने वाले पशुओं के समान काम करवाये जाने से त्रस्त हैं, परेशानहाल हैं और उकता चुके हैं।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026














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