पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार और बुलडोज़र का आतंक!
अनन्त
विगत 4 मई को पश्चिम बंगाल में चुनाव सम्पन्न हुए। चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में आया। पहली बार भाजपा बंगाल की धरती पर सत्तासीन हुई। जिस प्रकार से केंचुआ (केन्द्रीय चुनाव आयोग) ने चुनाव में भाजपा के लिए जीत के रास्ते को आसान बनाने का काम बाक़ी राज्यों में किया था, उसी शिद्दत से बंगाल में भी केंचुआ ने अपनी भूमिका निभायी। यहाँ विशेष गहन पुनरीक्षण के द्वारा लाखों लोगों को मतदान प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। यह पूरी क़वायद इस प्रकार से की गयी कि इसका लाभ फ़ासिस्टों को मिले। चुनाव पश्चात् आँकड़ों के साथ किये गये कुछ अध्ययन इस बात की पुष्टि भी करते हैं। हर चुनाव के साथ ईवीएम की संदिग्ध भूमिका पर सवाल और भी गम्भीर रूप से उठ खड़े होते हैं। यह अनायास नहीं है कि चुनाव परिणाम के एक महीने से कुछ समय बाद, 10 जून को, कोलकाता में जिस इमारत में 4,000 ईवीएम रखे थे वहाँ आग लग गयी। मज़ेदार है कि आग तीसरे और चौथे माले पर लगी थी, फिर पांचवें, छठे, सातवें माले को छोड़ आग आठवें तथा नवें माले पर लग गयी, जहाँ ईवीएम रखे थे! ये ईवीएम दस विधानसभा क्षेत्रों में चुनावों को कराने के लिए इस्तेमाल किए गए थे। यह घटना किसी भी तरह सामान्य नहीं है। यह ईवीएम के प्रयोग में हुए धांधलेबाजी की आशंका को और बल देता है।
बहरहाल, भाजपा बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम पर भयानक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने, ममता सरकार के निरंकुश शासन, भ्रष्टाचार, गुण्डागर्दी से आम जनता में जन्मे आक्रोश का लाभ उठाने, बेतहाशा पैसे का प्रयोग करने, तथा तमाम अन्य तरह के जोड़-तोड़ करने के परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में सरकार में आ गयी। गोदी मीडिया लहालोट होकर इस जीत का बखान करने लगता है। वह मोदी-योगी के गुणगान कर रहा होता है। इसी के साथ अब बंगाल में भी होगा “बुलडोज़र राज”, “बुलडोज़र न्याय” जैसे टेम्पलेट मीडिया में दौड़ने लगते हैं। आने वाले समय में होने वाले बुलडोज़र राजनीति का मीडिया पहले से ही मौहाल बनाने लगता है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होता है जिसमें दावा किया जाता है कि फ़रीदाबाद से एक मालगाड़ी में भरकर 227 बुलडोज़र हावड़ा पहुँचाया जा रहा है। यानी योगी मार्का बुलडोज़र मॉडल अब यूपी से निकल कर बिहार के रास्ते होते हुए बंगाल पहुँच रहा है। फ़ासिस्टों के राज में बुलडोज़र महज एक यन्त्र नहीं रहा गया है, बल्कि वह फ़ासीवादी दमन की राजनीति का एक क्रूर प्रतीक बन गया है।
पश्चिम बंगाल में भाजपा चुनाव प्रचार के दौरान से ही बुलडोज़र राजनीति को हवा देने का काम कर रही थी, वह आम तौर पर बंगाल चुनाव अभियान के दौरान भगवा बुलडोज़र के नमूनों का इस्तेमाल कर रही थी, और यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के साथ विशेष तौर पर इस प्रतीक का प्रचार किया जा रहा था। योगी आदित्यनाथ की एक सभा में बाक़ायदा बुलडोज़र खड़ा किया गया था, जिसपर चढ़कर भाजपा समर्थक झण्डे लहरा रहे थे। योगी अपनी सभाओं में यूपी के तथाकथित बुलडोज़र मॉडल, डबल इंजन की सरकार आदि की ही तुरतुरी बजा रहे थे।
4 मई को चुनाव परिणाम में भाजपा के बहुमत में आने के महज़ कुछ घण्टों बाद ही बुलडोज़र राजनीति की धमक कोलकाता की सड़कों पर देखने को मिली। जब 5 मई की देर शाम को भाजपा समर्थक जीत का जश्न मनाने के लिए बुलडोज़र लेकर ही सड़कों पर उतरे। फ़ासिस्टों की इस भीड़ ने पुलिस तथा केन्द्रीय बलों की उपस्थिति में कोलकाता के न्यू मार्केट, हॉग स्ट्रीट, बर्ट्रम स्ट्रीट और चार्ली चैपलिन स्क्वायर के इलाक़े में बुलडोज़र चलाया गया। जहाँ उन्होंने टीएमसी-समर्थित हॉकर्स यूनियनों के अस्थायी दफ़्तरों तथा अन्य दुकानों को ढहा दिया। कुछ सड़क विक्रेताओं ने घबराकर अपनी दुकानें बन्द कर दीं; जबकि अन्य ने चुपचाप भाजपा-समर्थित यूनियन का दामन थाम लिया। ग़ौरतलब है कि इन स्थानों पर ज़्यादातर दुकानें मुस्लिम दुकानदारों की थीं।
पश्चिम बंगाल में नयी सरकार का गठन 9 मई, 2026 को हुआ, जब मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी और उनके प्रारम्भिक मंत्री परिषद ने शपथ ली। इस सरकार ने शपथ-ग्रहण लेने के साथ ही अपना मंशा ज़ाहिर कर दी कि यह फ़ासीवादी भाजपा की उन्हीं दमनकारी नीतियों को लागू करेगी जिनका प्रतीक चिह्न बुलडोज़र बन चुका है। बुलडोज़र न केवल सड़कों पर दौड़ेगा, बल्कि सरकार की योजनाएँ और नीतियाँ भी जनता को बुलडोज़ करेंगी। सुवेन्दु सरकार के शुरुआती कदमों ने ही यह संकेत दे दिया है कि शासन में “बुलडोज़र राज” किस प्रकार लागू होगा। सुवेन्दु सरकार ने आते साथ जो पहला बुलडोज़र चलाया वह, सड़कों पर नहीं था, बल्कि यह घोषणा करना था कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिये गये हैं, या जिनकी अपीलें अभी लम्बित हैं, उन्हें कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित कर दिया जाएगा।
बहरहाल, नयी-नवेली सरकार की सड़कों पर बुलडोज़र चलाने की पहली कार्रवाई तिलजिला इलाक़े में हुई। 12 मई को तिलजला में एक बहुमंजिला इमारत के दूसरे तले में चल रहे अनाधिकृत कारख़ाने में आग लग गयी। जिसकी वजह से वहाँ काम करने वाले दो श्रमिक दम घुटने से मौक़े पर तथा एक की अस्पताल में इलाज़ के दौरान मृत्यु हो गयी और कई गम्भीर रूप से घायल हुए। सरकार ने आजतक श्रमिकों को न न्याय दिया है न कोई मुआवज़ा। सच यह है कि मज़दूर उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं हैं। सरकार की प्राथमिकता साम्प्रदायिक राजनीति है, “बुलडोज़र राज” है।
इस घटना के अगले दिन सुवेन्दु अधिकारी ने बिजली आपूर्ति कम्पनी CESC को अवैध इमारतों, जिनमें फैक्ट्रियाँ चल रही हैं, की पहचान के लिए ऑडिट करने और उनकी बिजली आपूर्ति काटने का निर्देश दिया है। मार्के की बात यह है कि इसके लिए उन्होंने कोलकाता के चार इलाक़ों — कसबा, तिलजला, मोमिनपुर और इक़बालपुर — का नाम लिया, जहाँ उनके अनुसार यह समस्या गम्भीर थी। इन इलाक़ों में मुस्लिम आबादी काफ़ी संख्या में है। 13 मई को इस घोषणा के महज़ एक-दो घण्टे के भीतर तिलजला में शाम लगभग 3:30 से 4 बजे के बीच, चार से पाँच बुलडोज़र पहुँचता है। उसके साथ केन्द्रीय सशस्त्र बलों और कोलकाता पुलिस के जवानों की एक बड़ी तैनाती भी होती, जिन्होंने ध्वस्तीकरण शुरू होने से पहले पूरे इलाके की घेराबन्दी कर दी। उपरोक्त इमारत में अनधिकृत कारखाने के अलावा लोगों के रिहायशी मकान भी थे, उन्हें न समय रहते कोई सूचना दी गयी, न उन्हें अपने समानों को निकालने का अवसर दिया गया।
तिलजला में बुलडोज़र की त्वरित कार्रवाई की वजह थी उस इलाक़े का मुस्लिम बहुल होना, तथा आग लगने वाली इमारत एक मुसलमान का होना। तिलजला की आड़ में हिन्दू-मुस्लिम की साम्प्रदायिक राजनीति की हवा बनायी गई। ग़ौरतलब है कि 5 मई की बुलडोज़र की कार्रवाई भी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में हुई थी। इसके साथ ही गोदी मीडिया अपने काम में लग जाता है। बुलडोज़र नीति को केवल मुस्लिम-विरोधी कार्रवाई के तौर पर पेश करते हुए, “डायरेक्ट एक्शन” बताते हुए, “यूपी मॉडल”, “बुलडोज़र जस्टिस” आदि कहकर उसका जश्न मनाया जाता है। “मुसलमानों को सबक सिखाया जा रहा है”, “मुसलमानों के ऊपर बुलडोज़र चल रहा है”, जैसे आख्यान हवा में तैरने लगे। इन क़वायदों का असल मक़सद बुलडोज़र की दमनकारी कार्रवाइयों का सामान्यीकरण करना था ताकि आसानी से आबादी के बाकी हिस्सों के ऊपर बुलडोज़र चलाया जा सके, और इसके ख़िलाफ़ कोई भी स्वर न उठे। बुलडोज़र की इस मनमानी कार्रवाई के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को पुलिस गिरफ़्तार करके ले गई। उन्हें तरह तरह से बदनाम किया गया, फ़र्ज़ी मुक़दमों में फँसाया गया।
सरकार बनने के ठीक एक हफ़्ते बाद बुलडोज़र हावड़ा तथा सियालदह स्टेशन के आसपास चलाया जाता है। शनिवार-रविवार की दरम्यानी रात में बुलडोज़र सैकड़ों वेंडर्स, हॉकर्स की रोज़ी-रोटी छिन लेता है। हावड़ा और सियालदह के आसपास उस रात जो कुछ हुआ, उसका पैमाना गम्भीर ध्यान की माँग करता है। इन दोनों स्टेशनों के पास एक ही रात के अभियान में लगभग 400 फेरीवालों को हटा दिया गया। चार सौ लोग। यदि मान लिया जाए कि हर फेरीवाला औसतन चार सदस्यों वाले एक परिवार का भरण-पोषण करता था, तो इसका अर्थ हुआ कि 1,600 से अधिक लोगों के लिए एक रात में जीवनयापन का साधन छीन लिया गया। अमृत भारत स्टेशन स्कीम के तहत स्टेशन का पुनर्निर्माण के नाम पर वेंडर्स और हॉकर्स पर हमला किया जा रहा है। हावड़ा, सियालदह, दम दम, सोनारपुर, मेमारी और उत्तरपाड़ा के रेलवे स्टेशन पर, तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में ये बेदख़ली अभियान चलाये गये, बुलडोज़र दौड़ाये गये। इसके बाद बुलडोज़र यहीं नहीं रुका, वह कोलकाता की अन्य सड़कों पर भी पहुँचा, और अभी भी पहुँच रहा है। कोलकाता के अलावा आसनसोल, बर्दवान, हुगली आदि जगहों तक यह फैल रहा है।
“बुलडोज़र राज” के बाबत राज्य मंत्री दिलीप घोष ने घोषणा की कि यह केवल एक व्यापक अभियान की शुरुआत है। उन्होंने पूरे पश्चिम बंगाल में बुलडोज़र चलाने का संकल्प जताते हुए कहा: “नयी सरकार ने पहले ही दिन से यह प्रक्रिया शुरू कर दी है। हम सरकारी ज़मीन पर किसी भी तरह के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं करेंगे।” किन्तु मंत्री महोदय ने जो नहीं कहा वह यह है कि आख़िर विस्थापित किए जा रहे लोगों का क्या होगा? विस्थापित लोगों के लिए वैकल्पिक स्थानों की कोई घोषणा नहीं की गयी है, न कोई पुनर्वास योजना है, न मुआवज़े का कोई ढाँचा, और न ही प्रभावित लोगों की संख्या तथा उनकी स्थिति का कोई ठोस आकलन किया गया है। यह जानने के लिए कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया कि ये विक्रेता कौन हैं, उनके ऊपर कितने लोग आश्रित निर्भर हैं, वे कितने समय से अपना व्यवसाय चला रहे हैं, या क्या उनमें से कुछ के पास वैध नगरपालिका लाइसेंस थे जो वर्षों से राज्य ने स्वयं जारी किए थे। यह सारे सवाल सिरे से गायब हैं।
बंगाल में नये नवेले पहुँचे “बुलडोज़र राज” ने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी पटरी वालों, फेरीवालों की आजीविका पर गम्भीर असर डाला है। ध्वस्तीकरण अभियान चलाने से पहले, तोड़फोड़ की कार्रवाई करने से पहले कहीं भी उन्हें पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। कई छोटे व्यापारियों का कहना था कि जमींदोज़ की गईं कई दुकानें दशकों से मौजूद थीं और उन्होंने प्रशासन से उसके पुनर्वास या वैकल्पिक वेंडिंग (दुकान लगाने) की व्यवस्था की माँग की थी। लेकिन बजाय उनकी माँग पर ग़ौर फ़रमाने के सरकार ने उन्हें बुलडोज़ कर दिया। ग़ौरतलब है कि,”बुलडोज़र राज” में तमाम वैधानिक, क़ानूनी प्रक्रियाओं को धता बताते हुए, बुलडोज़र चलाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने नवम्बर 2024 में ध्वस्तीकरण, बुलडोज़र कार्रवाई के सम्बन्ध में दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिसमें अनिवार्य 15 दिन की नोटिस अवधि भी शामिल है, इन तमाम कार्रवाइयों में उन दिशानिर्देशों की अवेहलना की जा रही है। विडम्बना है कि बंगाल चुनाव के दौरान झालमुड़ी खाने की नौटंकी करने वाले महामानव की सरकार बनने के बाद झालमुड़ी बेचने वालों को ही दर-बदर किया जा रहा है।
अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े छोटे-मोटे वेण्डर्स, रेहड़ी-खोमचे वालों पर बुलडोज़र इसलिए चलाए जा रहे हैं ताकि बड़े पूँजीपतियों की सेवा में बैठी डबल इंजन की सरकारें अपने आकाओं के लिए रास्ता खाली कर सकें। यह अपने आकाओं के मुनाफ़े के रास्ते में किसी भी तरह की बाधा नहीं चाहते हैं। अतिक्रमण हटाने के नाम पर, शहर के सौंदर्यीकरण के नाम पर, तमाम छोटे मोटे वेण्डर्स, रेहड़ी-खोमचे वालों पर बुलडोज़र चलाया जा रहा है, ताकि बड़े फूड-चेन खोले जा सकें, क्विक कॉमर्स का बाज़ार फैलाया जा सके। साथ ही ये बुलडोज़र महज़ किसी इमारत या संरचना पर नहीं चलते, बल्कि नागरिक, जनवादी अधिकारों पर चलते हैं। यह केन्द्र तथा राज्य में सत्ता पर काबिज़ फ़ासिस्टों के किसी भी प्रकार के विरोधियों को खुली धमकी होती है, कि इस सरकार के सामने अगर तुमने चूँ-चपड़ की तो तुम्हें बुलडोज़ कर दिया जायेगा।
मज़दूर बिगुल, जून 2026













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