स्त्री दिवस के सरकारी नारे और ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के जुमलों के पीछे मेहनतकश स्त्रियों के वास्तविक हालात क्या हैं?

इस साल भी 8 मार्च को मोदी सरकार द्वारा बड़े-बड़े मंचों से स्त्री अधिकारों, समानता और सम्मान की बातें की गयीं। मज़दूर-विरोधी चार लेबर कोड में स्त्री कामगारों के लिए नाईट शिफ्ट की मंज़ूरी को स्त्री सशक्तिकरण के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन मेहनतकश स्त्रियों की वास्तविक स्थिति इन फ़र्ज़ी दावों से बिल्कुल अलग दिखायी पड़ती है।

पिछले बीस–पच्चीस वर्षों में खास तौर पर दुनिया की हवा कुछ उल्टी दिशा में बहती दिख रही है। हमारे देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में मेहनतकशों पर लुटेरी ताकतों का दबदबा बढ़ता गया है। लूट-खसोट का बोलबाला है और मजदूरों ने जिन अधिकारों को लम्बे संघर्षों के बाद हासिल किया था, वे धीरे-धीरे छीने जा रहे हैं। कानून बदले जा रहे हैं और पुलिस व दमनकारी ताक़तों के सहारे हक़ की हर आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है।

आज हालत यह है कि मजदूर, औरत-मर्द दोनों ही, बारह–चौदह घंटे तक कड़ी मेहनत करने के बाद भी दो वक्त की रोटी, तन ढँकने के कपड़े, सिर पर छत, इलाज और बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम मुश्किल से कर पाते हैं। दूसरी ओर पूँजीपतियों, बड़े अफ़सरों और नेताओं की दौलत और ऐशो-आराम की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उसके लिए पन्ने भी कम पड़ जाते हैं।

मेहनतकश औरतों की स्थिति तो और भी भयावह है। कई जगहों पर हमारी दिहाड़ी पुरुष मजदूरों से भी कम होती है, जबकि सबसे कठिन, उबाऊ और बारीक काम हमसे ही कराये जाते हैं। क़ानून किताबों में लिखे रह जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ हमें नहीं मिलते। अनेक फ़ैक्ट्रियों में महिलाओं के लिए अलग शौचालय तक नहीं होते, पालनाघर जैसी सुविधाएँ तो दूर की बात है। दमघोंटू माहौल में दस-दस, बारह-बारह घंटे काम करने के बाद भी हर समय नौकरी से निकाल दिये जाने का डर बना रहता है। इसके साथ ही मैनेजरों, सुपरवाइज़रों और फोरमैनों की भद्दी टिप्पणियों, गंदी निगाहों और छेड़छाड़-यौन शोषण का सामना भी हमें करना पड़ता है।

घर के भीतर भी ग़रीबी और तनाव का जो नर्क जैसा माहौल बनता है, उसका सबसे ज़्यादा बोझ भी औरतों के ही कंधों पर पड़ता है। इस तरह मेहनतकश औरतें दोहरी – कभी-कभी तिहरी – मार झेलती हैं : काम की जगह पर शोषण, समाज में असमानता और घर में बढ़ती परेशानियाँ।

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2026

 

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