ईरान में तख़्तापलट की कोशिश में नाकाम रहने के बाद अमेरिका अब हमला करके पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंकने पर आमादा
अमेरिकी साम्राज्यवाद और ख़ामेनेई की निरंकुश हुकूमत दोनों ही ईरान की मेहनतकश अवाम के दुश्मन हैं!
आनन्द
ईरान में लगातार बिगड़ते आर्थिक हालात और ईरानी मुद्रा रियाल के तेज़ी से होते अवमूल्यन से तंग आकर पिछले साल के अन्त में दुकानदारों और व्यापारियों ने राजधानी तेहरान की सड़कों पर प्रदर्शन करना शुरू किया था। जल्द ही इस प्रदर्शन में अन्य तबक़ों के लोग भी शामिल हो गये और देखते ही देखते इस प्रदर्शन ने अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के नेतृत्व वाली ईरान की निरंकुश शिया कट्टरपन्थी हुकूमत के ख़िलाफ़ एक व्यापक आम जनबग़ावत की शक़्ल अख़्तियार कर ली। इस साल के शुरुआती दिनों में तेहरान सहित ईरान के तमाम शहरों व क़स्बों में भारी संख्या में लोग ख़ामेनेई की ज़ालिम व भ्रष्ट सत्ता के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे। यह हाल के वर्षों में ईरान में हुआ सबसे बड़ा जनविद्रोह था। इस बीच अमेरिकी साम्राज्यवाद के सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने वेनेज़ुएला में हमला करके वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण करने के फ़ौरन बाद अपनी गिद्ध दृष्टि ईरान पर डालते हुए वहाँ के आन्तरिक संकट का फ़ायदा उठाकर ईरान में सैन्य हस्तक्षेप की धमकी भी दी। ट्रम्प ने प्रदर्शनकारियों को उकसाते हुए कहा कि वे प्रदर्शन करते रहें और अमेरिका उनकी मदद के लिए आगे आयेगा। इसी बीच ख़बरों के मुताबिक़ इज़रायल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोस्साद ने ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शनों में घुसपैठ करके उसे हिंसक रूप देने का काम किया। इन बाहरी हस्तक्षेपों और उकसावेबाज़ी ने ईरान की हुकूमत को इस जनबग़ावत को बर्बरता से कुचलने का बहाना दे दिया। उसके बाद हुए बर्बर राजकीय दमन में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतार दिया गया और इस प्रकार इस बार भी ईरान की हुकूमत ने जनबग़ावत को ख़ून के दरिया में डुबो दिया। उसके बाद ख़ामेइनी हुकूमत ने तेहरान सहित ईरान के विभिन्न हिस्सों में अपने समर्थकों की रैलियाँ निकालकर यह जताया कि उसका समर्थन अभी भी बरक़रार है। यह लेख लिखे जाने तक जहाँ एक तरफ़ फ़ारस की खाड़ी में अमेरिका के जंगी बेड़े जंग की तैयारियों में जुटे हैं वहीं दूसरी तरफ़ ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका व ईरान के बीच समझौते के लिए बातचीत चल रही है।
ईरान में जारी उथल-पुथल को लेकर ईरान व दुनिया के अन्य हिस्सों में मोटे तौर पर दो तरह के दृष्टिकोण प्रचलित हैं। कुछ लोग इसमें ईरान में हुई हिंसा व उथल-पुथल के लिए सिर्फ़ वहाँ की निरंकुश धार्मिक कट्टरपन्थी हुकूमत को ज़िम्मेदार ठहराते हैं और इसमें अमेरिका व इज़राइल की भूमिका को या तो पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ करते हैं या फिर इन बाहरी हस्तक्षेपों को सकरात्मक दृष्टि से देखते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ईरान में हुए प्रदर्शनों को पूरी तरह से साम्राज्यवादी ताक़तों द्वारा प्रायोजित बताते हैं और आन्तरिक कारणों को नज़रअन्दाज़ करते हैं। वास्तव में ये दोनों ही दृष्टिकोण सच्चाई से दूर हैं। यह सच है कि लगातार बदहाल होते आर्थिक हालात और तमाम सामाजिक पाबन्दियों की वजह से ईरान की अवाम में वहाँ की हुकूमत के ख़िलाफ़ ज़बर्दस्त जनाक्रोश है और यह आर्थिक-सामाजिक संकट ही वहाँ के राजनीतिक संकट की जड़ में है। परन्तु यह भी सच है कि अमेरिकी व इज़रायली हस्तक्षेप ने ईरान की परिस्थिति को और जटिल बनाया है। ऐसे में वहाँ अयातुल्लाह की निरंकुश हुकूमत और अमेरिकी साम्राज्यवाद में से किसी एक का पक्ष लेने के बजाय हमें मज़दूर वर्ग के नज़रिये से इस जटिल परिस्थिति को समझना होगा।
ईरान के समाज का आन्तरिक अन्तरविरोध
ग़ौरतलब है कि पिछले कुछ समय से ईरान की अर्थव्यवस्था भीषण आर्थिक संकट से गुज़र रही है। पिछले साल जून में ईरान में इज़रायली और अमेरिकी हमले के बाद से वहाँ के आर्थिक हालात बद से बदतर हो गये हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्य तौर पर तेल व गैस के निर्यात पर निर्भर है और पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों द्वारा लगाये गये प्रतिबन्धों की वजह से ईरान में तेल निर्यात में पिछले कुछ वर्षों से लगातार गिरावट देखने में आयी है। आँकड़ों के मुताबिक़ साल 2025 में ईरान का तेल निर्यात साल 2024 के मुक़ाबले 7 प्रतिशत नीचे गिर गया। महँगाई 60 फ़ीसदी से ऊपर जा चुकी है और ईरान की मुद्रा रियाल का पिछले छह महीने में 60 प्रतिशत अवमूल्यन हो चुका है। ऐसे में लोगों को अपनी बुनियादी ज़रूरतों के सामान ख़रीदने के लिए भी बाज़ार में नोटों की मोटी-मोटी गड्डियाँ ले जानी पड़ती हैं। ज़ाहिर है कि इस आर्थिक तंगी का सबसे बुरा असर वहाँ की मेहनतकश अवाम पर पड़ा है जो भुखमरी की हालत में जीने को मजबूर है। ग़ौरतलब है कि ईरान में इस्लामी निज़ाम के आवरण में एक महाभ्रष्ट पूँजीवादी तन्त्र अस्तित्वमान है जिसकी बागडोर अयातुल्लाह ख़ामेनई के नेतृत्व में कट्टरपन्थी उलेमा और तथाकथित ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड’ के हाथों में है जिनके तार वहाँ के सैन्य औद्योगिक आर्थिक संकुल (मिलिटरी इण्डस्ट्रियल इकोनॉमिक कॉम्पलेक्स) से जुड़े हैं और जो वहाँ की अर्थव्यवस्था के प्रमुख सेक्टरों पर क़ाबिज़ हैं। यह छोटा-सा तबक़ा वहाँ बुनियाद नामक ट्रस्टों के तहत तमाम अनुबन्धों और परमिटों को हासिल करके अकूत मुनाफ़ा कूट रहा है। आर्थिक संकट की परिस्थिति में भी यह शासक तबक़ा विलासिता भरी ज़िन्दगी बिता रहा है जबकि ईरानी अवाम की ज़िन्दगी लगातार बदहाल होती जा रही है।
आर्थिक बदहाली के साथ ही साथ ईरान में पिछले 47 साल से मौजूद धार्मिक कट्टरपन्थी हुकूमत द्वारा वहाँ के लोगों पर थोपी गयी तमाम पाबन्दियों की वजह से भी लोगों के बीच सत्ता के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा लगातार बढ़ता गया है। ईरान की निरंकुश हुकूमत के ख़िलाफ़ लोगों का ग़ुस्सा समय-समय पर फूटता रहा है। याद दिला दें कि साल 2022 में महसा अमीनी नामक एक ईरानी कुर्द महिला की हिरासत में मौत के बाद ईरान की सड़कों पर विशाल जनसैलाब देखने में आया था। महसा अमीनी को ईरान की तथाकथित नैतिक पुलिस ने सिर्फ़ इसलिए गिरफ़्तार कर लिया था क्योंकि उसने “उचित” तरीक़े से हिजाब नहीं पहना था। इस बार भी प्रदर्शनों की शुरुआत तेहरान के प्रसिद्ध ग्रैण्डबाज़ार में दुकानदारों व व्यापारियों के प्रदर्शन से हुई, लेकिन कुछ ही दिनों के भीतर ईरान के विभिन्न हिस्सों में आम लोगों का हुजूम सड़कों पर आ गया और यह प्रदर्शन एक जनबग़ावत में तब्दील होने लगा। पिछले दो दशकों के दौरान ईरान में कुछ सालों के अन्तराल पर ख़ामेनई की हुकूमत के ख़िलाफ़ जनाक्रोश वहाँ की सड़कों पर दिखता आया है। ईरान पर लगे प्रतिबन्धों की वजह से वहाँ आर्थिक संकट गहराता गया है जिसकी वजह से राजनीतिक संकट समय के साथ तीखा होता गया है।
ईरान में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप
बेशक ईरान में जारी उथल-पुथल की जड़ में वहाँ के समाज का आन्तरिक संकट ही है। परन्तु इस संकट के गहराने में और उसका फ़ायदा उठाकर वहाँ अराजकता फैलाने में साम्राज्यवादी ताक़तों की भूमिका को कतई नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता। ग़ौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी राष्ट्रपति के अपने पहले कार्यकाल में ही अमेरिका और ईरान के बीच 2015 में हुए नाभिकीय समझौते को निरस्त कर दिया था और ईरान के ऊपर पाबन्दियाँ थोप दी थीं। उसके बाद यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों ने भी ईरान पर प्रतिबन्ध लगा दिये थे। चूँकि ईरान की अर्थव्यवस्था का आधार स्तम्भ तेल व गैस का निर्यात है इसलिए अमेरिका व यूरोपीय देशों द्वारा थोपे गये प्रतिबन्धों की वजह से वहाँ की अर्थव्यवस्था में पहले से जारी संकट और गहराता गया है। पिछले साल इज़रायल और ईरान के बीच 12 दिनों तक चली जंग और फिर ईरान पर अमेरिकी हमले की वजह से वहाँ राजधानी तेहरान सहित कई शहरों में बुनियादी ढाँचा और तमाम इमारतें ध्वस्त हो गयीं जिसकी वजह से आर्थिक संकट और तीखा हो गया। उसके पहले पश्चिमी एशिया में ईरान के सहयोगियों की हार या उनके कमज़ोर होने की वजह से रणनीतिक दृष्टि से भी ईरान कमज़ोर हुआ है। सीरिया में बशर अल असद की सत्ता के पतन और लेबनॉन में हिज़बुल्लाह के कमज़ोर होने की वजह से पश्चिमी एशिया में ईरान के वर्चस्व में कमी आयी है। हालाँकि ईरान की निकटता रूस व चीन की साम्राज्यवादी धुरी से है और ये दोनों साम्राज्यवादी देश उसे हथियारों, सैन्य उपकरणों और सैटेलाइट तस्वीरों के ज़़रिये मदद करते हैं, हालाँकि इसकी सम्भावना फिलहाल कम है कि वे खुलकर ईरान के पक्ष में युद्ध में उतरेंगे।
इस साल की शुरुआत में जब ईरान की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ने लगा तो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के इस राजनीतिक-आर्थिक संकट में अपने साम्राज्यवादी हितों को पूरा करने का मौक़ा देखा। ट्रम्प ने प्रदर्शनकारियों को उकसाते हुए कहा कि वे प्रदर्शन जारी रखें और अमेरिका उनकी मदद मे आएगा। जैसाकि हमने ऊपर उल्लेख किया था इज़रायली खुफ़िया एजेंसी मोस्साद ने ईरान में जारी प्रदर्शनों में घुसपैठ करके उसे हिंसक रूप देने में अहम भूमिका निभायी ताकि ईरानी राज्यसत्ता को इन प्रदर्शनों का बर्बर दमन करने के लिए उकसाया जाये और इस प्रक्रिया में जानमाल के नुक़सान से पूरे ईरान में अराजकता का माहौल क़ायम हो जाये और ख़ामेइनी की हुकूमत का तख़्तापलट किया जा सके। ग़ौरतलब है कि पश्चिमी मीडिया में साम्राज्यवाद-परस्त ईरान के पूर्व शाह के बेटे रज़ा पहलवी को ईरान के अगले शासक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और उसके समर्थन में लहर चलायी जा रही है। हालाँकि फ़िलहाल अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने मंसूबे में कामयाब होते नज़र नहीं आ रहे हैं। वास्तव में अमेरिकी व इज़रायली हस्तक्षेपों से ख़ामेनेई की सत्ता को जनान्दोलनों को बर्बरता से कुचलने का बहाना दे दिया है। ईरान की हुकूमत ने समूचे विद्रोह को ही अमेरिका व इज़रायल द्वारा प्रायोजित बताकर भीषण क़त्लेआम को अंजाम दिया और राष्ट्रवाद की लहर चलाकर अपने समर्थन में रैलियाँ निकलवाईं। ईरान में अमेरिकी साम्राज्यवाद के हस्तक्षेपों का लम्बा इतिहास होने की वजह से वहाँ अमेरिका-विरोधी भावनाएँ बहुत प्रबल हैं जिसका लाभ ईरान की बर्बर सत्ता अपने वजूद को बचाने के लिए उठाती आयी है। आज भी जहाँ एक ओर आर्थिक संकट व सामाजिक पाबन्दियों की वजह से ईरान के लोगों में ख़ामेइनी की हुकूमत के ख़िलाफ़ आक्रोश बढ़ा है; वहीं दूसरी ओर अमेरिका और इज़रायल द्वारा युद्ध की तैयारियाँ और धमकी देने से ईरान के आम लोगों में साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रवादी भावनाएँ भी तेज़ी से बढ़ रही हैं जिसकी वजह से ख़ामेइनी के ख़िलाफ़ विद्रोह एक सीमा से आगे नहीं जा पा रहा है और नतीजतन ख़ामेइनी की हुकूमत का आधार अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हो पाया है।
मज़दूर वर्ग का नज़रिया
मज़दूर वर्ग के नज़रिये से देखें तो ईरान में ख़ामेनेई की निरंकुश सत्ता और अमेरिकी साम्राज्यवाद व उसके द्वारा पाला-पोसा जा रहा रज़ा पहलवी, दोनों ही वहाँ के अवाम के दुश्मन हैं। मज़दूर वर्ग इन दोनों में से किसी एक को चुनने के लिए बाध्य नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ख़ामेनई की सत्ता एक पूँजीवादी सत्ता है जो ईरान के मज़दूरों और मेहनतकशों के शोषण पर टिकी हुई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ईरानी अवाम इस बर्बर सत्ता को उखाड़ फेंकने में अमेरिकी साम्राज्यवाद या ज़ायनवादी इज़रायल के साथ किसी भी क़िस्म का सम्बन्ध बनाकर रज़ा पहलवी की ताज़पोशी की प्रक्रिया में किसी भी रूप से शामिल हो। ईरान में मौजूदा शिया कट्टरपन्थी हुकूमत से पहले रज़ा पहलवी के पिता मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के नेतृत्व में राजशाही थी जिसके तख़्त और ताज को ईरान की जनता ने ही उखाड़ फेंका था। ऐसे में वहाँ फिर से राजतन्त्र की स्थापना का कोई तुक नहीं बनता। ईरान के आन्तरिक संकट के समाधान की ज़िम्मेदारी वहाँ की अवाम की है। इस प्रक्रिया में अगर अमेरिका किसी भी क़िस्म की फ़ौजी साम्राज्यवादी दख़ल करेगा तो ईरान की अवाम फौरी तौर पर अपने आन्तरिक मतभेद किनारे रखकर विदेशी हमले के ख़िलाफ़ एकजुट हो जायेगी और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ अन्तरविरोध प्रधान अन्तरविरोध बन जायेगा।
ख़ामेनेई की धार्मिक कट्टरपन्थी पूँजीवादी हुकूमत का वास्तविक विकल्प अमेरिकी साम्राज्यवाद की सरपरस्ती में राजशाही की वापसी नहीं बल्कि मज़दूर इंक़लाब और समाजवाद ही हो सकता है। यह सच है कि फ़िलहाल ईरान में ऐसी कोई क्रान्तिकारी ताक़त नहीं दिख रही है जो वहाँ के राजनीतिक संकट को क्रान्तिकारी संकट में तब्दील करके ख़ामेनेई की हुकूमत चकनाचूर करके राज्यसत्ता पर क़ब्ज़ा कर सके। परन्तु ईरान में जारी उथल-पुथल निश्चित ही वहाँ क्रान्तिकारी ताक़तों के फलने-फूलने की ज़मीन पैदा करेगी। समाजवाद की स्थापना के रूप में एक क्रान्तिकारी समाधान ही ईरान में जारी गतिरोध को ख़त्म कर सकता है।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026













