मारुति और बेलसोनिका के मज़दूरों के मामलों में गुड़गाँव श्रम न्यायालय ने सुनाये मज़दूर विरोधी फ़ैसले!

शाम मूर्ति

हाल ही में हरयाणा के श्रम विभाग ने आटोमोबाइल उद्योग की दो कम्पनियों से जुड़े मामलों में मज़दूर-विरोधी फ़ैसले सुनाये। दोनों मामलों में मज़दूरों द्वारा दायर अपील को एक तरफ़ा तरीके से ख़ारिज कर दिया गया। पहला फ़ैसला 2012 के मारुति आन्दोलन के दौरान बर्ख़ास्त एक मज़दूर के मामले में दिया गया। दूसरा फ़ैसला बेलसोनिका यूनियन के पंजीकरण को बहाल करने के लिए की गयी अपील के मामले में दिया गया।

मारुति का मामला

1 दिसम्बर (2025) को गुड़गाँव लेबर कोर्ट द्वारा अपना मज़दूर-विरोधी चरित्र खुलकर उजागर किया गया। 2012 के मारुति आन्दोलन के दौरान बर्ख़ास्त एक मज़दूर (रामनिवास) के मामले में लेबर कोर्ट द्वारा बेहद नंगे और बेशर्म तरीके से मारुति प्रबन्धन का पक्ष लिया गया।

औद्योगिक ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट ने मज़दूर की बहाली की अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट नें मज़दूर के ख़िलाफ़ 28 बिन्दुओं में अपना फ़ैसल सुनाया। बिन्दु नम्बर 27 में कोर्ट ने कहा कि “आज की गलाकाटू प्रतियोगिता वाली ट्रम्पियन दुनिया में राष्ट्र निर्माण हर भारतीय का पवित्र फ़र्ज़ है। इतिहास बताता है कि सिर्फ़ वही अर्थव्यवस्थाएँ आगे बढ़ पायी हैं, जहाँ मज़दूरों को सख़्त अनुशासन में रखा जाता है। अगर भारत को आज की अग्रिम अर्थव्यवस्थाओं से मुक़ाबला करना है, तो अपने वर्कफ़ोर्स को सख़्त अनुशासन में रखना होगा। न्याय विभाग से यह न्यूनतम अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वह ग़लत काम करने वाले मज़दूरों के प्रति सहानुभूति और हमदर्दी की अक्सर दोहरायी जाने वाली दुहाइयों के आगे झुके नहीं और कल्याणकारी क़ानूनों की आड़ में और अधिक अनुशासनहीनता को न पैदा होने दे। अतः मज़दूर को नौकरी से निकालना ग़लत या ग़ैर-क़ानूनी नहीं कहा जा सकता, तथा मामले का फ़ैसला मज़दूर के ख़िलाफ़ सुनाया जाता है।”

उपरोक्त उद्धरण से ही कोर्ट की मंशा स्पष्ट है। कोर्ट के फ़ैसले में, औद्योगिक ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट ने मज़दूर रामनिवास की बहाली की अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्रबन्धन द्वारा उन्हें सेवा से बर्ख़ास्त करना ग़लत या अवैध नहीं था। दरअसल इस फ़ैसले में कोर्ट ने अपना पूँजीपरस्त रवैया बिना लागलपेट के साफ कर दिया है। पूँजीपतियों के मुनाफ़े की हवस को “राष्ट्र हित” क़रार दिया गया है जिसके लिए मज़दूरों को अपना पेट काटकर भी उनकी तिजोरियाँ भरनी होंगी। हड़ताल या आन्दोलन करके “राष्ट्र द्रोही” जैसा बर्ताव नहीं करना होगा! यह फ़ैसला प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त का भी मखौल उड़ाता है। ग़ौरतलब बात यह है कि उक्त मज़दूर का 2012 की एफ़आईआर में नाम दर्ज नहीं था, न उसके ख़िलाफ़ कोई गवाही थी। बिना आन्तरिक जाँच के उसे बर्ख़ास्त करने के फ़ैसले को कोर्ट द्वारा सही ठहराया गया है।  काम पर वापस लिये जाने या मुआवज़ा दिये जाने की तो बात ही दूर है!

मारुति आन्दोलन की शुरुआत कब और कैसी हुई थी?

मारुति आन्दोलन की शुरुआत 2011 से सभी के लिए उचित मज़दूरी, बेहतर कार्य परिस्थितियाँ, ठेका मज़दूरों के स्थायीकरण और यूनियन के अधिकार आदि माँगों से हुई थी। इस प्रक्रिया में मज़दूर यूनियन बनाने में भी क़ामयाब हुए। लेकिन जैसे ही स्थायी मज़दूरों ने कम्पनी में सभी ठेका मज़दूरों के स्थायीकरण की माँग को आगे बढ़ाया, प्रबन्धन ने यूनियन तोड़ने और पदाधिकारियों समेत मज़दूरों को तंग करना शुरू कर दिया था।

इसका बड़ा मौक़ा प्रबन्धन को 2012 में मज़दूरों और कम्पनी के भाड़े के गुण्डों में टकराव के वक़्त मिला गया था। कम्पनी में आग लगने की घटना में मैनेजर की मौत का दोष मज़दूरों पर मढ़कर मज़दूरों को एकतरफा अपराधी घोषित कर दिया गया था। मीडिया से लेकर सरकार तक किसी ने सच जानने की कोशिश नहीं की। इस घटना का फ़ायदा उठाकर प्रबन्धन ने नयी यूनियन की मान्यता रद्द करने की कोशिश भी की। ग़ौरतलब है कि कम्पनी प्रबन्धन ने इस घटना की सीसीटीवी फुटेज आजतक न्यायालय के समक्ष पेश नहीं की है! वहीं सरकार द्वारा गठित एसआईटी (स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम) ने मज़दूरों को निर्दोष करार दिया था।

18 जुलाई 2012 को प्रबन्धन अधिकारी की मौत के बाद यूनियन को ख़त्म करने के लिए मैनेजमेंट द्वारा षड्यन्त्रकारी तरीके से 546 स्थायी व 1800 ठेका मज़दूरों को निकाल दिया था और 148 मज़दूरों को जेल भिजवा दिया गया था। इस दौरान 2 मज़दूरों की मौत भी हो गयी थी। फिर सबूतों के अभाव में 5 साल जेल में बिताने के बाद 117 मज़दूरों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया था। लेकिन यूनियन के 12 पदाधिकारियों और एक मज़दूर जिया लाल समेत 13 मज़दूरों को उम्रकैद की सज़ा सुनायी गयी। फिर 10 साल जेल में बिताने के बाद ज़मानत हासिल हुई। इसके बावजूद आज भी मीडिया हर जगह 18 जुलाई की वारदात के लिए मज़दूरों को दोषी और कम्पनी को ‘बेचारा’ दिखाने की कोशिश करता है। हालाँकि कम्पनी का सीओ इसे ख़ुद ही ‘क्लास वॉर’ (वर्ग युद्ध) बता रहा था! दरअसल मारुति का पूरा मामला ही पूँजीवादी न्याय व्यवस्था की पोलपट्टी खोल देने वाला प्रातिनिधिक मामला है। यह न्याय व्यवस्था नहीं बल्कि मज़दूरों-मेहनतकशों के लिए बेहद अन्यायपूर्ण व्यवस्था है जो पूँजीपति वर्ग के लूट और शोषण के अधिकार को ही न्याय और इंसाफ़ का पर्याय बन देती है।

ऐसा ही एक और फ़ैसला बीते 3 दिसम्बर को गुड़गाँव श्रम न्यायलय (हरियाणा) द्वारा सुनाया गया। कोर्ट ने बेलसोनिका यूनियन की पुन: मान्यता प्राप्त करने हेतु डाली गयी अपील को ख़ारिज कर दिया और बेशर्मी से अपने फ़ैसले को वाजिब ठहराया।

बेलसोनिका का मामला

हरियाणा मानेसर (गुड़गाँव) में स्थित बेलसोनिका ऑटो कम्पोनेंट्स बनाने वाली एक कम्पनी है जो मारुति सुज़ुकी के लिए कम्पोनेंट्स बनाती है। इसमें स्थायी मजदूरों की यूनियन ने 14 अगस्त 2021 को एक ठेका मज़दूर को यूनियन सदस्यता दी थी। इसके बाद से बेलसोनिका प्रबन्धन और श्रम विभाग के रजिस्ट्रार ने मिलकर यूनियन पर दबाव डालना और यूनियन पदाधिकारियों का उत्पीड़न करना शुरू कर दिया था। अन्ततः सितम्बर 2023 में यूनियन का पंजीकरण रद्द कर दिया गया था। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर अपील के ज़रिये बेलसोनिका मज़दूर यूनियन ने अपनी क़ानूनी लड़ाई जारी रखी जिसका फ़ैसला 3 दिसम्बर 2025 को सुनाया गया। वैसे तो स्थायी मज़दूरों की किसी यूनियन द्वारा ठेका मज़दूरों को सदस्यता देने का मामला कम ही देखने को मिलता है और इन लिहाज से बेसोनिका यूनियन का यह कदम सराहनीय है।

कोर्ट ने भी खुलकर कम्पनी प्रबन्धन के पक्ष में फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि “सहायक श्रम आयुक्त के कोर्ट ने ठीक ही कहा है कि ठेकेदार के कर्मचारी प्रिन्सिपल एम्प्लॉयर के कर्मचारी नहीं बन जाते, क्योंकि दोनों की नियुक्ति अथॉरिटी अलग हैं, इसलिए उनके हित भी अलग-अलग और असमरूप हैं, अतः वह एक ही संयुक्त ट्रेड यूनियन नहीं बना सकते। ठेकेदार और मैनेजमेंट अलग-अलग संस्थान हैं। अतः यूनियन पंजीकरण रद्द करने के, ऑर्डर में दख़ल देने का कोई आधार नहीं बनता और इसलिए अपील ख़ारिज की जाती है।…”

ट्रेड यूनियन एक्ट (1926) में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो स्थायी और अस्थायी/ठेका मज़दूरों को एक ही प्रतिष्ठान में एक ही यूनियन में होने से रोकता हो। साथ ही संविधान में अनुच्छेद 19 (जो कि यूनियन बनाने की स्वतंत्रता देता है) और टी.यू.ए (1926) के सेक्शन 4 के सब-सेक्शन (1) और सेक्शन 6 (ई) और 22 के प्रावधान भी इसकी मनाही नहीं करते हैं। मुख्यत: सेक्शन 4 (1) के अनुसार केवल वे ही कामगार यूनियन के पंजीकरण और सदस्यता के लिए आवेदन दे सकते हैं और सदस्य हो सकते हैं जो कामगार उसी संस्थान या इण्डस्ट्री से जुड़े हुए हैं। यानी यह कानून हर मज़दूर को यूनियन बनाने के अधिकार की इज़ाज़त देता है। दोनों जगह कहीं भी स्थायी और ठेका मज़दूर में कोई भेद का ज़िक्र नहीं है।

दूसरा, प्रबन्धन जिन मज़दूरों को ठेका मज़दूर कहता है वे वास्तव में ठेका मज़दूर है ही नहीं। वे नियमित प्रकृति का और तक़नीकी काम करते हैं यानी अधिकांश मज़दूर तो मशीन चलाने वाले आपरेटर हैं और वह कम्पनी प्रबन्धन की देखरेख में ही काम करते हैं। आमतौर पर उनकी भर्ती प्रक्रिया को भी प्रबन्धन द्वारा इन्टरव्यू लेकर पूरा किया जाता है। उल्टा बेलसोनिका कम्पनी प्रबन्धन परिसर में ठेका प्रथा उन्मूलन और विनियमन एक्ट (1970) का उल्लंघन खुलेआम कर रहा था। इस कानून के प्रावधान के तहत 240 दिन बाद स्थायी प्रकृति पर कार्यरत कामगार, स्थायी कामगार के तौर पर हक़ हासिल कर लेता है।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि तीन साल के बाद किसी भी किस्म के अस्थायी काम को नियमित किया जाना चाहिए। सच तो यह है कि इसी श्रम विभाग की नाक के नीचे कम्पनियों कारख़ानों व वर्कशॉपों में मज़दूरों के अधिकारों का सालों से हनन कर रही हैं। यही कम्पनियाँ ‘स्थायी काम के लिए स्थायी रोज़गार’ और ‘समान काम के समान वेतन’ के अधिकार की धज्जियाँ उड़ाती रहीं हैं और श्रम विभाग गांधारी की तरह आँखों पर पट्टी बांधे यह सब होने देता है।

वैसे तो कायदे से होना यह चाहिए था कि श्रम विभाग द्वारा कम्पनी प्रबन्धन को स्थायी काम पर ठेका प्रथा लागू करने के लिए कटघरे में खड़ा करके सख्त कार्यवाही करनी चाहिए थी, लेकिन श्रम विभाग उल्टा पंजीकृत यूनियन को ही दोषी बता कर उसकी यूनियन मान्यता रद्द कर देता है! इससे साफ़ हो जाता है कि श्रम विभाग मालिकों के इशारों पर कैसे नाचता है। असल में इन मज़दूर-विरोधी फ़ैसले के ज़रिये कम्पनी प्रबन्धन, श्रम विभाग व सरकार का नापाक गठजोड़ मज़दूरों के सारे अधिकार छीनने पर आमादा है। ऐसे में अब इसे श्रम विभाग की जगह “पूँजी-विभाग” कह दिया जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा, जो कारख़ाना मालिकों के मुनाफ़े में आने वाली हर अड़चन को दरकिनार करने के लिए प्रतिबद्ध है। वैसे भी नये लेबर कोड की चौथी संहिता यानी ‘औद्योगिक सम्बन्ध संहिता’ के तहत लेबर कोर्ट की समाप्ति और उसकी जगह पर औद्योगिक ट्राइब्यूनल लाने की घोषणा की जा चुकी है। अब तो श्रम विभाग व न्यायालय और खुलकर कम्पनियों व पूँजीपतियों के पक्ष में काम कर सकेंगे। “न्याय” और “अन्याय” का फ़ैसला भी इस पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपतियों और उनके हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

आज ऑटोमोबाइल सेक्टर में क़रीब 9 लाख मज़दूर अस्थायी तौर पर काम कर रहे हैं, जिनके लिए वास्तविक तौर पर श्रम क़ानून पहले ही पूरी तरह से लागू नहीं होते थे। लेकिन अब चार नये लेबर कोड आने के बाद तो यह स्थिति और भयावह हो जायेगी। अब ठेका प्रथा उन्मूलन और विनियमन एक्ट (1970) को नये लेबर कोड- औद्यौगिक सम्बन्ध संहिता, 2000 के जरिये समाहित कर लिया गया है और ठेका प्रथा को क़ानूनी रूप दे दिया गया है। अब नये लेबर कोड में फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट (निर्धारित अवधि रोज़गार) के तहत ठेका मज़दूरी को क़ानूनी मान्यता दे दी है। यानी इसे कम्पनियों को क़ानूनी तौर पर मज़दूरों को लूटने-खसूटने का लाइसेंस कहना ग़लत नहीं होगा।

इसलिए हमें यह बात अच्छे से समझ लेनी होगी कि सरकार से लेकर न्याय व्यवस्था तक पूँजीपतियों और उनके मुनाफ़े की सेवा में लगी हुई हैं। कोर्ट के इन उपरोक्त फ़ैसलों द्वारा तमाम मज़दूरों के सामने यह मिसाल पेश की जा रही है कि जो भी पूँजीवादी मुनाफ़े के तन्त्र को नुक़सान पहुँचाने का जुर्म करेगा उसे बख़्शा नहीं जायेगा। ऐसे में आज के दौर में मज़दूरों के पास संगठित होकर अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए सड़क पर उतरकर लड़ने का ही रास्ता बचता है। यह मुनाफ़ाखोर व्यवस्था मज़दूरों का चाहे कितना भी दमन कर ले, पर मज़दूरों के प्रतिरोध करने की ऐतिहासिक ज़रूरत और ज़िद को नहीं तोड़ पायेगी।

 

मज़दूर बिगुल, दि‍सम्बर 2025

 

 

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