हमें एक दिनी हड़तालों की रस्म से आगे बढ़ना होगा
एकदिनी हड़ताल करने वाली इन केंद्रीय ट्रेड यूनियनों से पूछा जाना चाहिए कि जब इनकी आका पार्टियां संसद-विधानसभा में मज़दूर-विरोधी क़ानून पारित करती हैं, तो उस समय ये चुप्पी मारकर क्यों बैठी रहती हैं? सीपीआई और सीपीएम जब सत्ता में रहती हैं तो खुद ही मज़दूरों के विरूद्ध नीतियां बनाती हैं, तो फिर इनसे जुडी ट्रेड यूनियनें मज़दूरों के हकों के लिए कैसे लड़ सकती हैं?























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