संशोधनवादियों के संसदीय जड़वामनवाद (यानी संसदीय मार्ग से लोक जनवाद या समाजवाद लाने की सोच) के विरुद्ध लेनिन की कुछ उक्तियाँ
“बर्नस्टीनवादियों ने मार्क्सवाद को उसके प्रत्यक्ष क्रान्तिकारी पहलू को छोड़कर स्वीकार किया है और कर रहे हैं। वे संसदीय मार्ग को निश्चित ऐतिहासिक कालों के लिए ख़ास तौर पर अनुकूल हथियार नहीं समझते, बल्कि संघर्ष का मुख्य और लगभग एकमात्र रूप समझते हैं, जो “बल प्रयोग करने”, “सत्ता हथियाने” और “अधिनायकत्व” को अनावश्यक समझता है।”
(‘कैडटों की विजय और श्रमिक पार्टी के कार्य’, ग्रंथावली, अंग्रेज़ी संस्करण, मास्को, 1962, ग्रंथ-10, पृ. 249)
“सिर्फ़ शोहदे और बेवकूफ़ लोग ही यह सोच सकते हैं कि सर्वहारा वर्ग को पूँजीपति वर्ग के जुवे के नीचे, उजरती गुलामी के जुवे के नीचे, कराये गये चुनावों में बहुमत प्राप्त करना चाहिए, तथा सत्ता बाद में प्राप्त करनी चाहिए। यह बेवकूफी या पाखण्ड की इन्तहा है, यह वर्ग संघर्ष और क्रान्ति की जगह पुरानी व्यवस्था और पुरानी सत्ता के अधीन चुनाव को अपनाना है।”
(‘इतालवी, जर्मन और फ्रांसीसी कम्युनिस्टों का अभिनन्दन’, ग्रंथावली, चौथा रूसी संस्करण, ग्रंथ-30, पृ.40)
“यह दलील देना कि मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में इंग्लैण्ड और अमेरिका में समाजवाद में शान्तिपूर्ण संक्रमण की सम्भावना को मान लिया था, एक कुतर्कवादी दलील है, या साफ-साफ कहा जाये तो एक दग़ाबाज़ की दलील है, जो उद्धरणों और सन्दर्भों के साथ खिलवाड़ करता है। पहली बात तो यह कि मार्क्स ने उस समय भी इस सम्भावना को एक अपवाद माना था। दूसरे, उन दिनों इजारेदार पूँजीवाद, यानी साम्राज्यवाद अस्तित्व में नहीं आया था। तीसरे, इग्लैण्ड और अमेरिका में उस समय ऐसी कोई फौज नहीं थी – जैसी कि आज है – जो पूँजीवादी राज्य मशीनरी के मुख्य साधन की भूमिका अदा करती हो।”
(‘सर्वहारा क्रान्ति और ग़द्दार काउत्स्की’, संकलित रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, इण्टरनेशनल पब्लिशर्स, न्यूयार्क, 1945, ग्रंथ-23, पृ. 233-234)
“क्रान्तिकारी सर्वहारा पार्टी को पूँजीवादी संसद-व्यवस्था में इसलिए हिस्सा लेना चाहिए, ताकि जनता को जगाया जा सके, और यह काम चुनाव के दौरान तथा संसद में अलग-अलग पार्टियों के बीच के संघर्ष के दौरान किया जा सकता है। लेकिन वर्ग संघर्ष को केवल संसदीय संघर्ष तक ही सीमित रखने, अथवा संसदीय संघर्ष को इतना ऊँचा और निर्णायक रूप देने कि संघर्ष के बाकी सब रूप उसके अधीन हो जायें, का मतलब वास्तव में पूँजीपति वर्ग के पक्ष में चले जाना और सर्वहारा वर्ग के ख़िलाफ़ हो जाना है।”
(‘संविधान सभा के चुनाव और सर्वहारा अधिानायकत्व’, अंग्रेज़ी संस्करण, मास्को, 1954, पृ.36)
मज़दूर बिगुल, मई 2015














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