Category Archives: क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षण माला

क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षण माला-4 : सामाजिक अधिशेष के उत्पादन की शुरुआत और सामाजिक श्रम-विभाजन तथा वर्गों का उद्भव

पूँजीवादी समाज में पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े के स्रोत और मज़दूर वर्ग के शोषण को समझने के लिए हमें कुछ अन्य बातों को समझना होगा, मसलन, सामाजिक अधिशेष, सामाजिक श्रम विभाजन और वर्गों का उद्भव। इन बातों को समझने के साथ हमारे लिए मज़दूर वर्ग के शोषण और पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े के स्रोत को समझना आसान हो जायेगा। इसलिए हम इन मूलभूत अवधारणाओं से शरुआत करेंगे।
आदिम काल में जब मनुष्य क़बीलों में रहता था, तो उसकी उत्पादक शक्तियों के विकास का स्तर बेहद निम्न था।

क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षण माला-3 : कुछ बुनियादी अवधारणाएँ जिन्हें समझना ज़रूरी है – 2

पिछली बार हमने कुछ बेहद बुनियादी अवधारणाओं को समझने के साथ शुरुआत की थी, मसलन, उत्पादक शक्तियाँ, उत्पादन सम्बन्ध, मूलाधार या आर्थिक आधार, अधिरचना, इत्यादि। साथ ही, हमने यह भी समझा था कि आर्थिक आधार में निहित बुनियादी अन्तरविरोध क्या है, अधिरचना में निहित बुनियादी अन्तरविरोध क्या है और साथ ही आर्थिक आधार और अधिरचना के बीच का अन्तरविरोध किस प्रकार समूचे मानव समाज की गति को व्याख्यायित करता है।

क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षण माला-2 : कुछ बुनियादी बातें जिन्हें समझना ज़रूरी है – 1

किसी भी समाज की बुनियाद में मनुष्य के जीवन का भौतिक उत्पादन और पुनरुत्पादन होता है। यदि मनुष्य जीवित होगा तो ही वह राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, कला, साहित्य, संस्कृति, वैज्ञानिक प्रयोग, खेल-कूद और मनोरंजन जैसी गतिविधियों में संलग्न हो सकता है। मनुष्य अपने जीवन के भौतिक उत्पादन और पुनरुत्पादन के प्रकृति के साथ एक निश्चित सम्बन्ध बनाता है और उसका रूपान्तरण कर उसके संसाधनों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ढालता है। इस गतिविधि को ही हम उत्पादन कहते हैं। मनुष्य के भौतिक जीवन के पुनरुत्पादन के लिए उपयोगी वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन करने के लिए मनुष्य प्रकृति को रूपान्तरित करता है। यह मनुष्य का उत्पादन के लिए, यानी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप, प्रकृति के रूपान्तरण का संघर्ष है।

क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षण माला-1 : मज़दूरी के बारे में

मज़दूर अपने कार्यदिवस के एक हिस्से में अपनी श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए काम करता है जिसे हम आवश्यक श्रमकाल कहते हैं, जबकि दूसरे हिस्से में वह पूँजीपति के लिए बेशी मूल्य का उत्पादन करता है, जिसे हम अतिरिक्त श्रमकाल कहते हैं। आवश्यक श्रमकाल के दौरान काम करने की एवज़ में मज़दूर को मज़दूरी मिलती है जबकि अतिरिक्त श्रमकाल में काम की एवज़ में उसे कुछ नहीं मिलता और उसका बेशी उत्पाद पूँजीपति द्वारा हड़प लिया जाता है जो कि बिकने पर बेशी मूल्य का रूप ग्रहण कर लेता है और पूँजीपति के मुनाफ़े का स्रोत होता है। यह है पूँजीपति के मुनाफ़े के स्रोत का घृणित क्षुद्र रहस्य। पूँजीवादी व्यवस्था में मज़दूरी ‘एक दिन में दिये गये श्रम की कीमत’ का रूप लेती है और पूँजीवादी शोषण की छिपाती है क्योंकि आवश्यक और अतिरिक्त श्रमकाल समय और जगह में अलग-अलग नहीं हो रहे होते हैं, बल्कि वे एक ही एक कार्यदिवस का निरन्तरतापूर्ण अंग होते हैं। इसलिए ऐसा दिखता है कि मज़दूर को ‘एक दिन की मेहनत की कीमत’ अदा की गयी है। पूँजीवादी व्यवस्था में मज़दूरी का यह स्वरूप मज़दूर के शोषण को छिपाता है और पूँजीवादी शोषण पर पर्दा डालता है। असल में, मज़दूर अपनी श्रमशक्ति बेचता है और बदले में आवश्यक श्रमकाल में अपनी श्रमशक्ति के बराबर मूल्य का भी उत्पादन करता है और अतिरिक्त श्रमकाल में पूँजीपति के लिए बेशी मूल्य का भी उत्पादन करता है, जो कि पूँजीपति के मुनाफ़े का स्रोत होता है।