क्रान्तिकारी मज़दूर शिक्षणमाला – 21 : पूँजीवादी संचय का आम नियम
मार्क्स बताते हैं कि यह पूँजीवादी संचय का आम नियम है कि समाज में एक छोर पर समृद्धि इकट्ठा होती जाती है और दूसरी ओर ग़रीबी, अभाव और दुख इकट्ठा होता जाता है। पूँजी संचय जितना तेज़ी से आगे बढ़ता है, सम्पदा का पूँजीवादी सृजन जितने बड़े पैमाने पर होता है, सर्वहारा वर्ग की संख्या भी उतनी ज़्यादा बढ़ती है और साथ ही श्रम की उत्पादकता भी उसी अनुपात में छलाँगें मारते हुए बढ़ती है; नतीजतन, बेरोज़गारों की विशाल सेना का निर्माण भी उसी त्वरित गति से होता रहता है। जो कारक पूँजीवादी समृद्धि को द्रुत गति से विकसित करते हैं, ठीक वही कारक पूँजी की सेवा में श्रमशक्ति के विशाल रिज़र्व भण्डार को भी विकसित करते हैं। जिस गति से धनी वर्गों के हाथों धन-सम्पदा का विकास होता है, उसी ऊर्जा से औद्योगिक रिज़र्व सेना भी बढ़ती जाती है।






















