(बिगुल के जनवरी-फरवरी 2010 अंक में प्रकाशित लेख। अंक की पीडीएफ फाइल डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें और अलग-अलग लेखों-खबरों आदि को यूनिकोड फाॅर्मेट में पढ़ने के लिए उनके शीर्षक पर क्लिक करें)

 

सम्पादकीय

मनमोहन का बेशर्म झूठः ”आर्थिक सुधारों से ग़रीबी घटी है! – प्रधानमन्त्री महोदय! आँकड़ों की बाज़ीगरी से ग़रीबी नहीं घटती!

श्रम कानून

बादल सरकार का महज़ एक नया ड्रामा ‘पंजाब प्रवासी कल्याण बोर्ड’ / लखविन्दर

साम्‍प्रदायिकता

पंजाब की फिज़ा में ज़हर घोल रही हैं साम्प्रदायिक शक्तियाँ / सुखदेव

विशेष लेख / रिपोर्ट

सूचना अधिकार क़ानून बना सरकार के गले की फाँस / अजयपाल, लुधियाना

संघर्षरत जनता

लुधियाना के मेहनतकशों के एकजुट संघर्ष की बड़ी जीत – ढंडारी काण्ड : 42 निर्दोष मज़दूरों को बिना शर्त रिहा करवाया / लखविन्‍दर

दिल्ली के असंगठित मजदूरों का अभूतपूर्व संघर्ष – बादाम मजदूर यूनियन के नेतृत्व में दिल्ली के बादाम मजदूरों की 16 दिन लम्बी हड़ताल – वैश्विक बाजार में बादाम आपूर्ति लड़खड़ाई, मजदूरों की आंशिक विजय / अभिनव

आन्दोलन : समीक्षा-समाहार

एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) के संशोधनवादी विपथगमन के ख़तरे और नेपाली क्रान्ति का भविष्य : संकटों-समस्याओं-चुनौतियों के बारे में कुछ जरूरी बातें / आलोक रंजन

मज़दूर आंदोलन की समस्याएं

ज्योति बसु और संसदीय वामपन्थी राजनीति की आधी सदी / दीपायन बोस

महान शिक्षकों की कलम से

कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र से एक अंश

विकल्‍प का खाका

इक्कीसवीं शताब्दी की पहली दशाब्दी के समापन के अवसर पर

बुर्जुआ जनवाद – दमन तंत्र, पुलिस, न्यायपालिका

सिख दंगों के दोषियों को सज़ा नहीं दिला सकेगी कोई भी सरकार – जाँच के ढोंग पर ढोंग होते रहेंगे / नीरज

लेखमाला

कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (पहली किस्त) – औपनिवेशिक भारत में संविधान-निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसकी निर्माण-प्रक्रिया, इसके चरित्र और भारतीय बुर्जुआ जनवादी गणराज्य की वर्ग-अन्तर्वस्तु, इसके अति सीमित बुर्जुआ जनवाद और निरंकुश तानाशाही के ख़तरों के बारे में / आलोक रंजन

कला-साहित्य

गीत – समर तो शेष है / शशि प्रकाश