दोहे

अब्दुल बिस्मिल्लाह

हाट लगा है धर्म का भक्त जनन को छूट।
जान माल सब है यहाँ लूट सकै तो लूट॥
राजा पण्डित मौलवी सब मिलि कीन्हीं घात।
जीभ निकाले आ रही महाकाल की रात॥
जूठी हड्डी फेंककर औ’ कुत्तों को टेर।
अपने-अपने महल में सोये पड़े कुबेर॥
घर-आँगन मातम मचे धरती पड़े दरार।
ना चहिए ऐसे हमें कलश और मीनार॥