15 मार्च। हरियाणा के पानीपत स्थित इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) की रिफाइनरी में 23 फ़रवरी से विस्तार और निर्माण कार्यों में लगे ठेका श्रमिकों ने शांतिपूर्ण तरीके से काम बंद कर हड़ताल शुरू की थी। मज़दूर अमानवीय कामकाजी परिस्थितियों, शोषण, कम वेतन और श्रम कानूनों के उल्लंघन के खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे थे। लेकिन 28 फ़रवरी तक आते-आते मज़दूरों की अपनी कोई यूनियन न होने के कारण यह संघर्ष कमजोर पड़ने लगा और प्रशासन, पुलिस तथा ठेकेदारों के दबाव में हड़ताल समाप्त करनी पड़ी।
हड़ताल के दौरान हुए समझौते में IOCL और श्रम विभाग ने कुछ माँगों—जैसे काम के घंटे, ओवरटाइम का भुगतान, साप्ताहिक छुट्टी, कैंटीन, परिवहन और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं—को लिखित रूप में लागू करने का आश्वासन दिया था। साथ ही वेतन बढ़ोतरी की माँग पर 1 अप्रैल तक निर्णय लेने के लिए समय लिया गया था। लेकिन लगभग 20 दिन बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ है। इस महीने केवल वेतन समय पर दिया गया, जबकि बाकी माँगें अब तक लागू नहीं की गई हैं। आज भी मज़दूरों से सिंगल रेट पर 12 घंटे काम कराया जा रहा है और साप्ताहिक छुट्टी के नाम पर केवल दो इतवार ही मिलते हैं। कैंटीन और शौचालय जैसी सुविधाओं का भी कोई अता-पता नहीं है।
इस प्रकार साफ़ है कि IOCL और श्रम विभाग ने मज़दूरों से किया गया वादा पूरा नहीं किया। हड़ताल के दौरान हरियाणा सरकार और प्रशासन ने मज़दूरों के हितों की रक्षा के बड़े-बड़े दावे किए थे, लेकिन व्यवहार में IOCL और ठेकेदारों ने दिखा दिया कि ऐसे लिखित समझौते अक्सर सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित रह जाते हैं। इस धोखाधड़ी को लेकर मज़दूरों के बीच गहरा रोष है। फिलहाल मज़दूर 1 अप्रैल तक वेतन बढ़ोतरी के वादे के पूरा होने का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर यह वादा भी झूठा साबित होता है, तो मज़दूरों को अपने जायज़ हक़ के लिए फिर से संघर्ष का रास्ता अपनाना पड़ेगा।
मज़दूरों पर गैस की किल्लत और महंगाई की मार!
इसी बीच मज़दूर इलाकों में गैस की किल्लत और महँगाई ने भी मज़दूरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आज बिगुल मज़दूर दस्ता ने पानीपत रिफाइनरी क्षेत्र की मज़दूर बस्तियों में सम्पर्क अभियान के दौरान पाया कि पूरे देश की तरह यहाँ के मज़दूर भी गैस की किल्लत और बढ़ती महँगाई से त्रस्त हैं। मज़दूर साथियों ने बताया कि जो गैस पहले लगभग 100 रुपये प्रति लीटर मिलती थी, वह अब 300 रुपये तक पहुँच गई है। इस कारण आज कई मज़दूर लॉज और बस्तियों में चूल्हे पर खाना बनाने के लिए लकड़ियाँ ढोते दिखाई दिये।
वहीं दूसरी ओर मज़दूर बस्ियों में सब्ज़ियों से लेकर अन्य खाने-पीने की चीज़ों और रोज़मर्रा के सामानों की कीमतें भी तेज़ी से बढ़ रही हैं। इलाके के ढाबों पर जो खाने की थाली पहले 60 रुपये में मिलती थी, वह अब 100–120 रुपये तक पहुँच गई है। वैसे तो देश के अधिकांश मज़दूर इलाकों में यही स्थिति है, लेकिन जहाँ प्रवासी मज़दूरों की संख्या अधिक है वहाँ हालात और भी खराब हैं। सरकार ने घरेलू एलपीजी की कीमतों में लगभग 60 रुपये की बढ़ोतरी की है, लेकिन यह बढ़ोतरी तब मायने रखती है जब मज़दूरों के पास गैस कनेक्शन हो। वास्तविकता यह है कि निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले अधिकांश प्रवासी मज़दूरों के पास गैस कनेक्शन नहीं है और उन्हें छोटे सिलेण्डरों में दुगने-तिगुने दाम देकर गैस भरवानी पड़ती है।
स्पष्ट है कि पहले से ही शोषण और अन्याय की मार झेल रहे रिफाइनरी मज़दूर अब बढ़ती महँगाई से भी बुरी तरह परेशान हैं। ऐसी स्थिति में मज़दूर बस्तियों और रिफाइनरी क्षेत्रों में सस्ती दरों पर कैंटीन और सामूहिक रसोई की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि दिन-रात मेहनत करने वाले मज़दूरों को राहत मिल सके।
आज के समय में मज़दूरों को वेतन और भत्तों की माँग के साथ-साथ कुछ और जरूरी माँगें भी उठानी चाहिए। जैसे—एलपीजी सिलेंडरों की कालाबाज़ारी और पेट्रोल-डीज़ल की जमाखोरी पर तत्काल रोक लगाई जाए। हर परिवार को सस्ती दरों पर सिलेण्डर उपलब्ध कराया जाए। पेट्रोल और डीज़ल पर लगाए गए टैक्स कम किए जाएँ तथा खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण किया जाए। साथ ही रिफाइनरी और मज़दूर कॉलोनियों में सस्ती दरों की कैंटीन की व्यवस्था तुरन्त शुरू की जाए।