बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं के साथ हिंसा का मुद्दा उछालकर देश में साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने और बंगाल चुनाव में ध्रुवीकरण की कोशिश में लगी भाजपा-संघ की दंगाई फ़ौज
योगेश मीणा
पिछले डेढ़ सालों में और विशेषकर क़रीब 2 महीनों से बांग्लादेश में अल्पसंख्यक-विरोधी घटनाएँ तेज़ी से सामने आ रही हैं। दीपू चन्द्र दास नामक बांग्लादेशी मज़दूर की 18 दिसम्बर को धार्मिक बेअदबी का आरोप लगा कर मारे जाने व बेरहमी से ज़िन्दा जला दिये जाने से लेकर हिन्दू परिवारों के घर जलाये जाने तक की ख़बरें लगातार सामने आ रही हैं। जहाँ एक ओर बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपन्थी ताक़तें बांग्लादेशी जनाक्रोश को ग़लत दिशा में मोड़ने के लिए हिन्दू बांग्लादेशियों समेत अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बना रही हैं, वहीं दूसरी ओर इस पूरे मुद्दे पर घड़ियाली आँसू बहा रही भाजपा-संघ भारत में अपने नापाक़ इरादों को साधने में लगी है। भाजपा-संघ इस पूरे घटनाक्रम का इस्तेमाल अपनी साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति के प्रचार के लिए कर रही है, जिसके फ़ौरी निशाने पर बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 है। बांग्लादेश में हो रहे अल्पसंख्यक-विरोधी हमलों को बहाना बना कर भाजपा-संघ भारत में साम्प्रदायिक माहौल बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि देश स्तर पर इनकी दाल गलती नहीं दिख रही है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे को भाजपा-संघ के साम्प्रदायिक भोपू ज़ोरों से उठा रहे हैं। बांग्लादेश के घटनाक्रम को पश्चिम बंगाल चुनावों में केन्द्रीय मुद्दा बनाने की कोशिशों में भाजपा-संघ, गोदी मीडिया दौड़ धूप करने में लगे हैं।
ग़ौरतलब है कि जुलाई 2024 से बांग्लादेश की राजनीति उथल-पुथल के दौर से गुज़र रही है। जुलाई 2024 में बेरोज़गारी, महॅंगाई व बुनियादी सुविधाओं तक के अभाव के कारण सालों से दबा बांग्लादेश की जनता का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा था। इसका फौरी ‘ट्रिगर’ भले ही बांग्लादेश राष्ट्र मुक्ति युद्ध में शामिल सैनानियों के परिवारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सरकारी नौकरियों व संस्थानों में प्राथमिकता देती हुई राज्य नीति बनी, लेकिन इसकी जड़ में था, पूँजीवाद से तबाह-बर्बाद होती आम जनता का गुस्सा; विशेषकर बेरोज़गारी की मार झेलती बांग्लादेश की छात्र-नौजवान आबादी का। छात्रों-नौजवानों की अगुवाई में बांग्लादेशी जनता ने सड़कों का रूख़ इख़्तियार किया। बांग्लादेश में सत्तारूढ़ आवामी लीग ने पूरी ताक़त से इस जनउभार के दमन का प्रयास किया था। लेकिन जब शेख़ हसीना की तानाशाहाना सरकार द्वारा जनआक्रोश को कुचलने के सारे हथकण्डों को नाकामयाबी ही हाथ लगी तो प्रधानमन्त्री शेख़ हसीना तक को बांग्लादेश छोड़ भागना पड़ा। लेकिन देश स्तर पर किसी क्रान्तिकारी विकल्प के अभाव के चलते मुस्लिम कट्टरपन्थी, बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (BNP) समेत तमाम प्रतिक्रियावादी ताक़तें बांग्लादेशी आन्दोलन में अपनी जड़े मजबूत करने में कुछ सफ़ल होती लग रही हैं, जिसके चलते आन्दोलन के जुझारू चरित्र होने, यहाँ तक की कई बार जनवादी अधिकारों के मुद्दों को उठाने के बावजूद भी बांग्लादेशी जनउभार कोई क्रान्तिकारी रूख़ नहीं इख़्तियार कर सका है। ऐसे समय में मज़दूर वर्गीय क्रान्तिकारी पार्टी का मक़सद होता है नौजवानों व व्यापक मेहनतकश जनता को बेरोज़गारी, महॅंगाई, समेत उनकी समस्याओं पर एकजुट करते हुए अवाम के असली शत्रु – पूँजीवाद व पूँजीपति वर्ग – के ख़िलाफ़ गोलबन्द-संगठित करना होता है। वहीं दूसरी तरफ़ अगल-अलग गुटों को जोड़कर – जिसके साम्प्रदायिक गुट भी शामिल है – जुलाई प्रदर्शनों के दौरान बनी राष्ट्रीय नागरिक पार्टी (NCP) से ये उम्मीद नहीं की जा सकती। साथ ही धार्मिक कट्टरपन्थी समेत अन्य प्रतिक्रियावादी दल आन्दोलन को ग़लत दिशा में मोड़ कर लोगों के गुस्से को ठण्डा करने के प्रयासों में लगे हैं। मौजूदा घटनाक्रम इसी की ओर इशारा कर रहे हैं। बांग्लादेश में जनउभार के बाद से ही जमात-ए-इस्लामी समेत तमाम मुस्लिम कट्टरपन्थी संगठन व अन्य प्रतिक्रियावादी ताक़तें जनता के गुस्से को ग़लत दिशा में मोड़ने के काम को खुले तौर पर कर रहे हैं। इसी के लिए बांग्लादेश के हिन्दू समेत अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना भी बनाया जा रहा है। जहाँ कोई तुच्छ व्यक्तिगत टकराहट भी दो सम्प्रदाय के लोगों में हो तो उसे भी धार्मिक रंग पहना के अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने में कमी नहीं छोड़ी जा रही है। इसी की बलि मज़दूर दीपू चन्द्र दास को चढ़ाया गया था।
ऐसी घटनाओं में विशेषकर मुहम्मद युनुस की अन्तरिम सरकार के दौरान बढ़ोत्तरी हुई है। राजनीति में करियर बनाने की अपनी इच्छा को युनुस 2007 में ही ज़ाहिर कर चुके थे। हालाँकि अपेक्षित जनसमर्थन न मिलने के चलते वे जल्दी ही इससे पीछे हटने लगे थे। लेकिन जुलाई 2024 के प्रदर्शनों में उन्होंने फिर राजनीति में करियर बनाने के सपनों को ताज़ा कर दिया। सरकार का नेतृत्व करने का मौका मिलते ही मुहम्मद युनुस ने तुरन्त अपने ऊपर लगे श्रम अधिकारों के हनन, काला धन, कर चोरी, भ्रष्टाचार समेत अन्य केस हटवा लिये। बांग्लादेशी आन्दोलन को कमज़ोर करने के लिए भी युनुस ने मुस्लिम कट्टरपन्थी संगठनों पर से क़ानूनी पाबन्दियाँ तक हटा दी है; बांग्लादेश राष्ट्र मुक्ति संघर्ष में पाकिस्तानी फौज़ के साथ बांग्लादेशियों के नरसंहार में सहायक रही जमात-ए-इस्लामी पर से भी क़ानूनी पाबन्दी हटा दी गयी है। ये बात दीगर है कि आवामी लीग व बांग्लादेशी राष्ट्रवादी पार्टी (बांग्लादेशी की 2 मुख्य पार्टियाँ) ने समय-समय पर जमात के साथ साझा चुनावी मोर्चा बनाया है। ख़ैर, इससे यह बात भी सिद्ध होती है कि कैसे राष्ट्र मुक्ति युद्ध के दौरान इन संघर्षों के विरोधी व हाशिए पर पड़े संगठन (जैसे भारत में आरएसएस) पूँजीवादी आर्थिक संकट के गहराने व राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने से समाज में पकड़ मजबूत करने लगते हैं। इसी का ही नतीजा है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बना कर बांग्लादेशी जन उभार को ग़लत दिशा में ले जाने की कोशिशें की जा रही है।
लेकिन बांग्लादेश में हो रही निर्मम हत्याओं का इस्तेमाल भारत में संघ-भाजपा-गोदी मीडिया द्वारा भी अपने फ़ासीवादी मंसूबे साधने के लिए किया जा रहा है; आख़िर लोगों की चिताओ पर राजनीतिक रोटियाँ सेकने की इनसे बड़ी काबिलियत किसके ही पास होगी! बांग्लादेश में निशाना बनायी जा रही अल्पसंख्यक आबादी की “आपदा में फ़ायदा” ढूँढ़ते हुए भाजपा-आरएसएस व विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल समेत इनके अनेकों बगलबच्चा संगठनों ने पूरे देश में साम्प्रदायिक माहौल बनाने में कमी नहीं छोड़ी है। मीडिया-सोशल मीडिया के ज़रिये व सड़कों पर घूमते संघ के गुण्डे “बांग्लादेशी” के नाम पर देश की मुस्लिम आबादी को निशाना बना रहे हैं। जो काम बांग्लादेश में बिखरे ढंग से किया जा रहा है उसे सुनियोजित, संगठित व योजनाबद्ध तरीके से फ़ासीवादी भाजपा-संघ भारत में कर रहा है। यानी कि मुनाफ़े पर टिकी व्यवस्था में बर्बाद होती मेहनतकश जनता के असली दुश्मन इस पूँजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए जनता के सामने एक नक़ली शत्रु को पेश किया जा रहा है। इसके लिए अगर घड़ियाली आँसू बहा कर किसी की बर्बर हत्या का इस्तेमाल अपनी दंगाई राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है, तो उसमें भी भाजपा-संघ को परहेज़ नहीं; आख़िर रोज़ देश में खुलेआम क़त्लेआम तक करने वाली भाजपा-संघ-बजरंग दल को कैसा ही परहेज़ होगा! इसलिए ही पिछले साल दिसम्बर के अन्त में दिल्ली स्थित बांग्लादेश दूतावास के बाहर विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल ने हंगामा मचाया था। लेकिन देश स्तर पर भाजपा-संघ इस मुद्दे पर साम्प्रदायिक फसल काटने में बहुत सफ़ल नहीं हो पा रही है; आख़िर एक ही घिसे-पिटे मुद्दे पर कब तक लोगों को बहलायेंगे! खैर, लेकिन अभी निशाने पर पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव है।
पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव 2026 के मद्देनज़र भाजपा-संघ इस मुद्दे को पश्चिम बंगाल में ‘प्रासंगिक’ बनाने की पूरी कोशिशों में लगी है, इसलिए ही इस मुद्दे पर रैलियाँ-सभाएँ अभी से ही बंगाल में की जा रही है; जबकि दिल्ली स्थिति बांग्लादेशी दूतावास के सामने बजरंग दल की भीड़ कब की शान्त बैठ चुकी है! वजह ये भी है कि बंगाल की क्षेत्रीय राजनीति में “बाहरी” का पहलू काफ़ी प्रभावी है। तृणमूल कांग्रेस की एक हद तक ज़मीनी पकड़ होने (जिसके लिए माकपा जैसे संशोधनवादियों के कुकर्म भी ज़िम्मेदार हैं) के अतिरिक्त भाजपा के ख़िलाफ़ ममता बनर्जी का एक अहम मुद्दा “बंगाली-बाहरी” का रहा है। इसलिए भी भाजपा “बांग्लादेश के मुद्दे” को इतने ज़ोरो से पश्चिम बंगाल में उठा भी रही है। ग़ौरतलब है कि हर क़िस्म के प्रतिक्रियावाद को समाहित कर लेने में फ़ासीवादी माहिर होते है। ख़ैर, “बांग्लादेश” को मुद्दा बना कर भी भाजपा-संघ का मूल मक़सद मेहनतकश जनता का असल मुद्दों से ध्यान हटाना ही है। बेरोज़गारी, महॅंगाई जैसी देशव्यापी समस्याओं से पश्चिम बंगाल अछूता नहीं है; और इन्हीं असल समस्याओं के लिए जनता असल शत्रु – पूँजीवाद व पूँजीपति वर्ग – को न पहचाना जा सके इसलिए ही उसके सामने नक़ली शत्रु (मुसलमान) व नक़ली समस्याएँ पेश की जा रही हैं। अब पश्चिम बंगाल चुनावों में इसे अंजाम देने के लिए भाजपा-संघ ने “बांग्लादेश” के मुद्दे को चुना है। इसके साथ ही देश स्तर पर भाजपा-संघ द्वारा की जा रही वोट चोरी के मामले को भी “बांग्लादेशी” मुद्दे का इस्तेमाल कर शुरू से ही दरकिनार किये जाने की भी कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही भाजपा अपने चुनावों में धाँधली व एसआईआर के ज़रिये जनता के स्वतन्त्र मत के अधिकारों को छीनने में भी कमी नहीं छोड़ रही है; जैसा अभी हाल में जयपुर, राजस्थान के एक बीएलओ ऑफ़िसर के बयान से भी समझा जा सकता है।
इसके साथ हमें ये बात भी समझनी चाहिए कि भले ही मोदी सरकार ने बांग्लादेश के हो रही अल्पसंख्यक विरोधी घटनाओं पर सामूहिक सहानुभूति ज़ाहिर की हो, लेकिन न भाजपा-संघ भारत की मेहनतकश अवाम की हितैषी है और न ही इसे बांग्लादेशी हिन्दुओं से कोई लगाव है। इनका मूल मक़सद है पूँजीपति वर्ग के हितों को सुरक्षित रखना। इसलिए ही जहाँ एक ओर भाजपा-संघ व इनके अनेकों बगलबच्चा संगठन “बांग्लादेशी” कह कर देश के मुसलमानों को निशाना बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर फ़ासीवादी मोदी सरकार शेख़ हसीना जैसे घोर जन-विरोधी ‘बांग्लादेशी’ नेता को शरण दे रही है। फ़ासीवादी मोदी सरकार के नेतृत्व में भारतीय पूँजीपति वर्ग भी बांग्लादेश में अपने निवेशों और मुनाफ़े के आयामों के लिए चिन्तित है, जिसके लिए वो भी पूरी कोशिश कर रहा है। लेकिन जहाँ एक ओर मोदी सरकार शासक वर्ग के हितों में वो बांग्लादेश से सम्बन्ध सामान्य करने में लगी है – जैसा तालिबान के साथ किया – वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश में हुई घटनाओं को आधार बना कर भारत में अपनी फ़ासीवादी राजनीति का प्रचार कर रही है। ये विडम्बना नहीं बल्कि सच्चाई है। इसके साथ ही, हाल के समय में भारत-बांग्लादेश के राजकीय सम्बन्धों में अभूतपूर्व तनाव की स्थिति बनी हुई है। भारतीय पूँजीपति वर्ग का समर्थन-प्राप्त शेख़ हसीना के निर्वासन के बाद से ही फ़ासीवादी मोदी सरकार की “तेजस्वी” विदेश नीति का भी “तेज़” बांग्लादेश में कम होता लग रहा है। मुहम्मद युनुस के नेतृत्व में अन्तरिम सरकार व तमाम कट्टरपन्थी संगठन बांग्लादेश में भारत-विरोधी नीतियों के लिए आधार तैयार कर रहे हैं। लेकिन ये अनायास में उभरती राजनीतिक दिशा नहीं बल्कि बांग्लादेशी पूँजीपति वर्ग द्वारा वैश्विक पूँजीवादी प्रतिस्पर्धा में अपना हित साधने का ज़रिया है; जिसमें चीनी साम्राज्यवाद लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। इसीलिए ही तो बांग्लादेशी जनता का मुक्ति युद्ध के दौरान बर्बर क़त्लेआम करने वाली पाकिस्तान सरकार – चीनी साम्राज्यवाद का प्रभाव क्षेत्र – के साथ बांग्लादेशी सरकार की नज़दीकी बढ़ा रही है, और इसलिए ही पाकिस्तान में सत्तारूढ़ मुस्लिम लीग (नवाज़) के नेताओं का बांग्लादेश के प्रति ‘संवेदना’ उमड़ रही है। बांग्लादेश में जन आक्रोश का सड़कों पर फूटना कोई क्रान्तिकारी रूख़ न इख़्तियार कर सके, इसको लेकर शुरू से ही न केवल बांग्लादेशी पूँजीपति वर्ग बल्कि मोदी सरकार व सभी साम्राज्यवादी धड़े घबराये हुए हैं, विशेषकर ऐसी स्थिति में जब श्रीलंका, फिलीपींस, म्यानमार, नेपाल समेत पूरे दक्षिण एशिया में उथल-पुथल हो रही है। हालाँकि बांग्लादेशी शासक वर्ग भी राजनीतिक अस्थिरता के कारण चीनी साम्राज्यवाद को कई रियायतें मुहैय्या करवाने को मजबूर है, लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था बचाने के लिए धार्मिक कट्टरपन्थ का उभार साम्राज्यवादी ताक़तों की साँठगाँठ में बांग्लादेशी पूँजीपति वर्ग की ही नीति है (भले ही ये उसकी पसन्दीदा नीति न हो), आम मेहनतकश जनता की नहीं। इसके लिए ही जमात-ए-इस्लामी जैसे प्रतिबन्धित कट्टरपन्थी संगठनों को भी खुली झूठ दी गयी है। इस कट्टरपन्थ का फ़ायदा बांग्लादेशी पूँजीपति को ही होगा, जिसके लिए पूँजीवादी व्यवस्था को जनता के आक्रोश के निशाने से बाहर कर दिया जायेगा।
ख़ैर, भारत व बांग्लादेशी की मेहनतकश जनता को देश के शासक वर्गों की समस्या को सुलझाने के लिए परेशान नहीं होना चाहिए। उम्मीद है कि बांग्लादेश में क्रान्तिकारी तत्व स्वयं को संगठित कर व्यापक मेहनतक जनता को क्रान्तिकारी दिशा में एकजुट करने का काम करेंगें। इसके साथ ही हम भारत की मेहनतकश जनता की व्यापक वर्गीय एकजुटता स्थापित करने का आह्वान करते हैं। आज ज़रूरी है कि हम अपने असल मुद्दों – शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, आदि – पर संगठित हो, और भाजपा की दंगाई राजनीति का भण्डाफोड़ व विरोध करें। इसके लिए हमें शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के उस शिक्षा को भी लोगों में प्रचारित करने की ज़रूरत है, ख़ासकर आज जब भाजपा-संघ का साम्प्रदायिक फ़ासीवाद लोगों को साम्प्रदायिकता पर बाँटने व किसी राष्ट्र के ख़िलाफ़ नफ़रत भरने में लगा है – “संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुक़सान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।”
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026













