मज़दूर की ज़िन्दगी इतनी सस्ती क्यों?
एक मज़दूर, गुड़गांव
आजकल अख़बारों में आये दिन किसी न किसी शहर के कारख़ाने में आग लगने, बिल्डिंग गिरने या विस्फोट होने से मज़दूरों की मौत की ख़बरें आती रहती हैं। कहीं 10-12, तो कहीं दर्जनों मज़दूर मारे जाते हैं, तो कहीं मरने वालों की असली संख्या का पता ही नहीं चल पाता।
आज ऐसी ही एक घटना की ख़बर देखकर मुझे याद आया जब मैं काम करने दिल्ली आया था।
मैं मानेसर में एक गारमेंट फ़ैक्टरी में पीस रेट पर सिलाई का काम करता था। वैसे तो गुड़गाँव और उसके आसपास गारमेंट के सैकड़ों कारखाने हैं, जिनमें लाखों मज़दूर काम करते हैं।
मेरी फ़ैक्टरी में वाशिंग डिपार्टमेंट में काम करने वाले एक मज़दूर की मौत हो गयी जो कि बिहार का रहने वाला था।
काम की परिस्थितियाँ ही उस जगह की कुछ ऐसी हैं कि वहाँ काम करने वाला हर मज़दूर तिल-तिल कर मौत के मुँह में जा रहा था। चार मंज़िला इमारत थी जिसमें करीब 800 तक मज़दूर काम करते थे।
सबसे नीचे बेसमेंट में धुलाई डिपार्ट है जिसमें केमिकल व भाप की वजह से हर वक्त एक अजीब सी गन्ध आती रहती है। मैं तो एक बार सेकेण्ड फ्लोर से बेसमेंट गया तो पाँच मिनट में मेरी साँस फूलने लगी। और मैं जल्दी से बाहर को भागा।
उस मज़दूर की मौत का कारण भी यही घुटन भरी परिस्थितियाँ थी। बस उसकी मौत फैक्टरी में न होकर उसके कमरे पर हुई। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में साफ़ आया कि फेफड़ों में सूजन व गर्दा की वजह से वह मरा।
उसकी मौत की ख़बर उसके घरवालों को दी गयी और उसके घर वाले दौड़े-दौड़े बिहार से गुड़गाँव आये। उसकी माँ ने मौत के मुआवजे़ के लिए बहुत दौड़ लगायी मगर कम्पनी मैनजमेंट को ज़रा भी तरस नहीं आया। उसकी माँ ने कम्पनी मैनेजेण्ट से अपील की और पुलिस से गुहार लगायी। कम्पनी में पुलिस आयी भी मगर कोई कुछ भी नहीं बोला और कोई सुराग भी हाथ नहीं लगा। क्योंकि उसकी मौत के अगले दिन ही उसकी हाज़िरी रजिस्टर से सात दिन की उपस्थिति ग़ायब कर दी गयी।
और बहुत ही सख़्ती के साथ मैनेजर ने अपने आफ़िस में लाइन मास्टरों, सुपरवाइज़रों, ठेकेदारों से लेकर सिक्योरिटी अफसरों तक को यह हिदायत दे दी कि अगर उसकी मौत के बारे में किसी ने उसके पक्ष में एक बात भी कही तो उसके लिए इस कम्पनी से बुरा कोई नहीं होगा। और इस तरह ऊपर से लेकर नीचे एक-एक हेल्पर व सभी कर्मचारियों तक मैनेजर की यह चेतावनी पहुँच गयी। और पूरी कम्पनी से कोई कुछ नहीं बोला।
उसकी माँ सात दिन तक गेट के बाहर आती रही, लगातार रोती रही। मगर हम मज़दूरों में कोई यूनियन न होने की वजह से हम सब मजबूर थे। और आज मैं भी यह सोच रहा हूँ कि मेरे साथ भी अगर कोई हादसा होगा तो मेरे घरवालों के साथ भी यही हाल होगा।
अगर हम एकजुट नहीं होंगे और एक-दूसरे के साथ खड़े नहीं होंगे, इसी तरह कायरों की तरह जीते रहेंगे – केवल महीने भर के वेतन के लिए अपनी ज़िन्दगी दाँव पर लगाते रहेंगे तो हमारी ज़िन्दगी ऐसे ही सस्ती बनी रहेगी।
मुझे सीतापुर जाने वाली ट्रेन में कुछ नौजवान मज़दूर बिगुल अख़बार बेचते हुए मिले थे। उनकी बाते सुनकर मुझे हैरानी हुई और ख़ुशी भी हुई कि आज के दौर में भी इतने साहस के साथ लोग आवाज़ उटा रहे हैं। मुझे यह अख़बार बहुत अच्छा लगा। देश में इतने मीडिया और अख़ाबर हैं लेकिन मज़दूरों और ग़रीबों की बात कोई नहीं करता है। जात-धर्म के नाम पर लड़ाने की राजनीति की कलई भी आपने अच्छी तरह खोली है। मैं इस अख़बार को आगे भी मँगाकर अपने गाँव में पढ़वाऊँगा।
मोहम्मद ज़हूर, लखीमपुर
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2026













