‘महाराष्ट्र जन सुरक्षा क़ानून’ – “जन सुरक्षा” के नाम पर जनता के दमन की तैयारी!
(यह मराठी ‘कामगार बिगुल’ में प्रकाशित सम्पादकीय लेख है, जो महाराष्ट्र में हाल में पेश ‘महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा अधिनियम’ के फ़ासीवादी चरित्र को बेपर्द करता है। देश के कुछ अन्य राज्यों की सरकारें भी इसी तरह के काले क़ानून बनाने की फ़िराक़ में हैं इसलिए इसके ख़तरों को समझना बहुत ज़रूरी है। – सम्पादक)
(अनुवाद – अविनाश)
महाराष्ट्र में भाजपा-एनसीपी-शिवसेना (शिन्दे) की महायुति सरकार ने जुलाई में और फिर 18 दिसम्बर 2024 को विधानसभा में ‘महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2024’ विधेयक पेश किया। अब सरकार इस विधेयक को पारित करने की ओर बढ़ गयी है। जिसके तहत विधान सभा और विधान परिषद से पारित कर दिया गया है। अब दोनों सदनों में विधेयक पारित होने के साथ, महाराष्ट्र छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के बाद जन सुरक्षा क़ानून लागू करने वाला पाँचवाँ राज्य बन जाएगा, हालाँकि यह क़ानून कई मायनों मे अलग भी है। वैसे तो देश के स्वतन्त्र होने के बाद से ही अंग्रेजों के दमनकारी क़ानूनों को सुव्यवस्थित करके अपनाने को लेकर टाडा, पोटा, यूएपीए, मकोका, एनएसए जैसे अनेक क़ानून पारित करके सभी सरकारों ने जनमत को कुचलने के लिए पाशविक अधिकार मौजूद हैं। ऐसे में महाराष्ट्र में आने वाला यह क़ानून उसी परम्परा को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन जनता के अधिकारों के लिए सरकार के ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ को बर्बर तरीके से दबाने का अधिकार अभूतपूर्व तरीके से सरकार को देता है। देश में जो थोड़े ही सही, लोकतान्त्रिक-नागरिक अधिकार हर व्यक्ति को मिले हैं, यह उन पर भी सीधा हमला करता है। ऐसे में जनता की आवाज़ को दबाने वाले इस जन विरोधी क़ानून का मज़दूर वर्ग को तीव्र विरोध करना चाहिए।
सबसे पहले तो “शहरी नक्सलवाद” को रोकने का उद्देश्य बताने वाले इस क़ानून को समझने की कोशिश करते हैं। इस क़ानून के तहत “शहरी नक्सलवाद” की कोई स्पष्ट परिभाषा दी ही नहीं गयी है। वैसे इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि “शहरी नक्सलवाद” संघ-भाजपा द्वारा गढ़ी गई एक राजनीतिक अवधारणा है, जिसका उद्देश्य विरोधियों को “बदनाम” करना, उनके ख़िलाफ़ प्रचार चलाना, उनके न्यायसंगत, जनपक्षधर, क़ानूनी कार्यों को सन्देह के घेरे में लाकर जनता के एक वर्ग में उनके प्रति सन्देह पैदा करना है। अब तक के इतिहास को ही देखें तो झुग्गीवासियों के आन्दोलन, दलित अत्याचार विरोधी आन्दोलन, संघ-भाजपा की गुण्डागर्दी के ख़िलाफ़ आन्दोलन, छात्र-युवाओं के संघर्षशील आन्दोलन, पर्यावरण के मुद्दे पर या विनाशकारी परियोजनाओं के विरोध में या बड़े पूँजीपतियों के हितों के ख़िलाफ़ जारी आन्दोलनों को शहरी नक्सलवाद या इसी तरह की शब्दावली गढ़ कर बदनाम किया जाता रहा है। लेकिन अब इस शब्द का बहुत ही आम इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके तहत पूँजीपति वर्ग का ही समर्थन करने वाली कांग्रेस (मोदी ने 6 अक्टूबर 2024 को मुंबई में कहा कि कांग्रेस अब शहरी नक्सलियों द्वारा चलाई जा रही है), आम आदमी पार्टी (अमित शाह ने मई 2024 में गुजरात में आप पार्टी को शहरी नक्सली पार्टी कहा था), सीपीएम (सीपीएम की किसान सभा द्वारा मार्च 2018 में निकाले गए ‘लॉन्ग मार्च’ जैसे धनिक किसानों के मोर्चे को भाजपा की नेता पूनम महाजन ने शहरी नक्सलियों का मोर्चा कहा था) जैसे दलों के आन्दोलनों, नीतियों, घोषणाओं को भी इस शब्द के तहत लाया जाने लगा है।
दरअसल ‘नक्सलवाद’ शब्द के साथ सत्ता विरोधी सशस्त्र विद्रोह की अवधारणा जुड़ी हुई थी। सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में भी अवैध कार्यों की परिभाषा में हिंसा का उल्लेख किया जाता रहा है। सबसे पहले तो मूल रूप से भारत जैसे देश के शहरी इलाकों में, जहाँ अत्यन्त घनी आबादी का स्थान है, यहाँ पर कोई सशस्त्र संघर्ष खड़ा हो और सरकार को उसकी ख़बर भी न लगे, यह बेहद हास्यास्पद है। लेकिन अगर क़ानून में सशस्त्र संघर्ष की परिभाषा ही नहीं दी गयी है, तो सरकार विरोधी कोई भी आवाज़ ‘शहरी नक्सलवाद’ बतलायी जा सकती है और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, लोकतान्त्रिक-नागरिक स्वतन्त्रता की मूलभूत संरचना ही नष्ट हो जाती है। ‘शहरी नक्सलवाद’ की क़ानूनी परिभाषा बनाना भाजपा-संघ परिवार को निश्चित ही तौर पर एक ऐसी स्थिति में लेकर जाता है, जहाँ अंग्रेजों के पैर चाटने वाली भाजपा-संघ परिवार छोड़कर शायद कोई भी ग़ैर-शहरी-नक्सली नहीं बचेगा।
“व्यक्ति और संगठनों के विशिष्ट अवैध कार्यों को अधिक प्रभावी ढंग से रोकने के लिए…” विधेयक के शीर्षक में कहा गया है। लेकिन “संगठन” शब्द का अर्थ बताते हुए कहा गया है कि “व्यक्तियों का कोई भी समूह, निकाय, या गुट, चाहे वह किसी विशेष नाम से जाना जाता हो या नहीं, और चाहे वह किसी संबंधित क़ानून के तहत पंजीकृत हो या नहीं और किसी लिखित संविधान द्वारा उसका नियमन किया जाता हो या नहीं।” संक्षेप में, इस परिभाषा के अनुसार किसी भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह को यह क़ानून अवैध घोषित कर सकता है, चाहे वह कोई क्रान्तिकारी छात्र-युवा संगठन हो, मज़दूर यूनियन हो, जनसंगठन हो, कार्यकर्ताओं का समूह हो, कोई राजनीतिक पार्टी हो, या फिर खेल या मनोरंजन का क्लब या वरिष्ठ नागरिकों का मण्डल ही क्यों न हो। लोकतान्त्रिक तरीके से अपने संगठन का संविधान बनाकर काम चला रहा हो, तब भी सरकार उस संगठन को अवैध घोषित कर सकती है। इतना ही नहीं, सरकार अस्तित्व में नहीं होने वाले संगठन को भी नाम देकर आरोप लगा सकती है!
“अवैध कार्य” की परिभाषा करते हुए अन्य कई प्रावधानों के साथ ऐसे कार्य जो (1) सरकारी कर्मचारियों के काम में हस्तक्षेप करते हैं, या हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखते हैं (धारा 2-च-तीन) (2) रेल, सड़क, हवाई या जलमार्ग से होने वाले यातायात में बाधा डालने वाले (धारा 2-च-पाँच) (3) क़ानून या क़ानून द्वारा स्थापित संस्थाओं की अवहेलना को प्रोत्साहित करने या उपदेश देने वाले (धारा 2-च-छह) (4) अवैध कार्यों के लिए धन या सामान जुटाने वाले (2-च-सात), (5) सार्वजनिक शान्ति, व्यवस्था को खतरा या संकट पैदा करने वाले (2-च-एक) या व्यवस्था में हस्तक्षेप करने या करने की प्रवृत्ति रखने वाले (2-च-दो) जैसे प्रावधान भी शामिल हैं। अब किस कार्य से शान्ति भंग हो सकती है, यह कौन तय करेगा? सरकार ही न!
देश में मूल रूप से आन्दोलन करने के लिए भी अनुमति लेनी पड़ती है, इससे ही पता चलता है कि लोकतान्त्रिक अधिकार कितने सीमित हैं! महाराष्ट्र में तो पहले से ही आन्दोलनों को औपचारिक अनुमति न देना और आयोजकों को नोटिस देना, अब आम बात हो चुकी है। इसी के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है, जमावबन्दी की व्यवस्था। असल में जमावबन्दी तभी लागू हो सकती है जब क़ानून-व्यवस्था बिगड़ी हुई हो, और उसका लागू होना सरकार की विफलता ही माना जाना चाहिए। लेकिन यह सर्वविदित है कि चार से अधिक लोगों के एकत्र होने को अवैध ठहराने वाली जमावबन्दी, राज्य में लगातार लागू रहती है, और उसका उद्देश्य सिर्फ जनता के आन्दोलनों को अनुमति देने से इनकार करने का मौका सरकार और पुलिस को देना ही होता है। ऐसे में अब “बिना अनुमति” वाले किसी भी (यानी संघ-भाजपा को छोड़कर, लगभग सभी) आन्दोलन को इस क़ानून के तहत अत्यन्त कठोर सज़ा देने का अधिकार सरकार को मिल जाता है।
इसका मतलब यह है कि अब तक होते आए रास्ता रोको आन्दोलन, किसी सरकारी कार्यालय पर धरना देना, पुलिस द्वारा ‘अनुमति’ न देने पर शान्तिपूर्ण आन्दोलन करना, जेल भरो आन्दोलन करना, बस-रेल आदि में किसी मुद्दे पर प्रचार करना, यह तो छोड़िए, पुलिस या सरकार के ख़िलाफ़ नारे लगाना, कोई भाषण, सभा, शान्तिपूर्वक किया गया हो या कोई भी आन्दोलन, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, महँगाई, धर्मवाद के ख़िलाफ़ या पानी का मुद्दा, पर्यावरण, ग़रीब किसानों के मुद्दे, इन सभी पर उठी कोई भी आवाज़, इनके ख़िलाफ़ निकाला गया कोई पर्चा, ऑनलाइन सन्देश, लिखा गया लेख, यहाँ तक कि आप जो यह लेख पढ़ रहे हैं, जनआन्दोलन को दिया गया समर्थन जैसे असंख्य कार्य या सरकार की नज़र में ऐसा कुछ करने की आपकी ‘प्रवृत्ति’ होना, ऐसे सभी कार्य अब साधारण अपराध नहीं रह गए हैं, बल्कि सीधे सबसे गम्भीर अपराध बन गए हैं। संक्षेप में, सरकार की मर्जी के ख़िलाफ़ किसी भी व्यक्ति का सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने की ‘प्रवृत्ति’ होना, बस अब यह महसूस होने पर ही उक्त व्यक्ति अपराधी ठहराया जा सकता है। इसके लिए अब सरकार को सिर्फ “लगना” काफी होगा!
क़ानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं, यह तय करना अब तक न्यायालयों का काम था। सरकार आरोप लगा सकती थी, लेकिन न्यायालयों द्वारा फैसला आने तक अपराध सिद्ध नहीं माना जाता था। लेकिन इस क़ानून ने किसी संगठन को अवैध है या नहीं, यह तय करने का प्रभावी अधिकार सरकार को ही दे दिया है। धारा-3 के अनुसार सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर किसी भी संगठन को अवैध घोषित कर सकती है, और धारा-3(2) के अनुसार उसके कारण बताना भी सरकार के लिए अनिवार्य नहीं है। दिखावे के लिए एक सलाहकार (!) मण्डल सरकार बनाएगी (धारा-6), जिसके पास अवैध घोषित संगठन अपील कर सकता है। लेकिन किसी भी घोषणा को इस मण्डल के पास कम से कम 6 सप्ताह में भेजना सरकार पर अनिवार्य नहीं है (धारा-6(1)), सलाहकार मण्डल को तीन महीने में सुनवाई और फैसला करना होगा, यानी कम से कम 4 से 5 महीने तक कोई संगठन निश्चित रूप से अवैध घोषित किया जाएगा। इससे आगे बढ़कर, चूँकि यह सलाहकार मण्डल पूरी तरह सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा, इसलिए उसका क्या फैसला आएगा, यह कोई भी समझ सकता है। ऐसा संगठन अगर अपने सदस्यों द्वारा भंग कर दिया जाता है (धारा-16), तब भी सरकार को उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का अधिकार देता है।
विधेयक में प्रस्तावित सज़ा के प्रावधान निश्चित रूप से दिखाते हैं कि इस क़ानून के पीछे सरकार का उद्देश्य लोकतान्त्रिक अधिकारों का कैसे गला घोंटना है। धारा-8 के अनुसार, (1) ऐसे संगठन की बैठकों या गतिविधियों में भाग लेने पर तीन साल की जेल और तीन लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। (2) संगठन को ग़ैर-सदस्यों द्वारा सहायता दिए जाने पर दो साल की सज़ा और दो लाख रुपये जुर्माना हो सकता है। (3) अवैध संगठन के लिए अवैध कार्य करने पर सात साल तक की जेल और पाँच लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है। धारा 9, 10, 11 में दिए गए अत्यन्त विस्तृत प्रावधानों के अनुसार तो संगठन के काम के लिए इस्तेमाल की गई जगह, फण्ड, निवेश सरकार ज़ब्त कर सकती है। यानी, ऐसे संगठन या व्यक्तियों से थोड़ा भी सम्बन्ध होने पर सम्पर्क में या सहायता करने वाले लोगों को भी सीधे जेल में डालने का अधिकार भी इस सरकार ने खुद ले लिया है। इसका सीधा मतलब है कि आरोपी व्यक्ति के पूरे परिवार को ही नहीं, बल्कि दोस्तों, परिचितों को भी मुज़रिम बनाने की इजाज़त सरकार के पास होगा। ‘अपराध’ शब्द की परिभाषा ही ऐसी की गई है, जिससे सरकार के लिए असुविधाजनक व्यक्तियों का अस्तित्व ही अपराध है।
इसके विरोध में अगर कोई व्यक्ति या संगठन न्यायालय जाने की कोशिश करे तो इस विधेयक की धारा-14 के अनुसार सभी निचली अदालतों को हस्तक्षेप करने से मना किया गया है। उच्च या सर्वोच्च न्यायालय तक तो देश के मज़दूर -मेहनतकशों की पहुँच कभी थी ही नहीं, निचली अदालतों तक पहुँचना और उसका खर्च उठाना भी बहुसंख्यकों के लिए एक अत्यन्त कठिन काम था। अब तो यह क़ानून अदालतों तक की मज़दूर -मेहनतकशों की थोड़ी बहुत पहुँच को भी खत्म करने का काम कर रहा है। आगे बढ़कर धारा-15 के अनुसार सभी अपराध ग़ैर-जमानती और गिरफ्तारी योग्य होने के कारण पुलिस अधिकारी किसी को भी बिना वारण्ट गिरफ्तार कर सकते हैं। लेकिन धारा-17 “गलत” कार्रवाई करने वाले किसी भी सरकारी अधिकारी के ख़िलाफ़ अपील करने का अधिकार भी छीन लेती है और मन्त्रियों, पुलिस, अधिकारियों को उनकी कार्रवाइयों के लिए पूर्ण संरक्षण देती है। संक्षेप में सरकार के विरोध में खड़े व्यक्ति या संगठन के नागरिक अस्तित्व को खत्म करने का अधिकार, यह क़ानून सरकार को दे रहा है।
इस तरह का क़ानून छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में पहले ही पारित हो चुका है। छत्तीसगढ़ के क़ानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। यहाँ भी इस क़ानून का इस्तेमाल कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा की जा रही लूट का विरोध करने वालों, पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों पर आवाज़ उठाने वालों, लोकतान्त्रिक तरीके से काम करने वाले संगठनों पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के उदाहरण देखने को मिलते हैं। आज सरकार विरोधी मामलों में न्यायालयों की स्थिति देखते हुए, ऐसे क़ानूनों को चुनौती देने पर अदालतों द्वारा तुरन्त सुनवाई कर फ़ैसला देने की उम्मीद मुश्किल ही दिखती है।
देश में पहले से ही यू.ए.पी.ए. (1967, बाद में 2019), राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एन.एस.ए.) जैसे क़ानून तो हैं ही, पुराने क़ानूनों को नए आवरण में पेश करके बनाई गई भारतीय न्याय संहिता (बी.एन.एस.), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बी.एन.एस.एस.) में भी जनता के आन्दोलनों को दबाने के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं। महाराष्ट्र में मकोका (1999) क़ानून भी लागू है। यू.ए.पी.ए. क़ानून का उद्देश्य भी नक्सली गतिविधियों को रोकना ही बताया जाता है। इस क़ानून का इस्तेमाल कर सन्देह के आधार पर गिरफ्तारी, बिना मुकदमे के जेल में रखना, कई साल तक ज़मानत न देना, संगठन पर प्रतिबन्ध लगाना जैसी सभी कार्रवाइयाँ करने का अधिकार सरकार के पास है। इस क़ानून का इस्तेमाल करते हुए अब तक कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, मज़दूर कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, नागरिक-लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं, छात्रों, युवाओं, पत्रकारों, वकीलों, शिक्षकों को जेल में डालने का, सालों तक उन्हें बिना ज़मानत, कई बार तो बिना मुकदमे के जेल में ही रखने का काम कई सरकारों ने किया है। असंख्य अध्ययन हैं जो दिखाते हैं कि ऐसे सभी क़ानूनों का इस्तेमाल झूठे आरोप लगाकर जनता के आन्दोलनों, जनपक्षधर कार्यकर्ताओं का दमन करने के लिए ही किया गया है। दमन करने के लिए ये क़ानून भी “अपर्याप्त” लगने लगे हैं, इसलिए अब देश के कई राज्यों में ‘जन सुरक्षा’ जैसे क़ानून बनाने का काम भाजपा सरकार कर रही हैं।
मुख्यमन्त्री फडणवीस के मुताबिक माओवादियों के ‘शहरी अड्डों’ और ‘सुरक्षित ठिकानों’ को ध्वस्त करना जरूरी है, और यह कहते हुए वे ‘माओवादियों’ के सशस्त्र संघर्ष और सरकार को उखाड़ फेंकने जैसे उद्देश्यों का जिक्र करते हैं, लेकिन क़ानून में अवैध घोषित करने के लिए इन प्रावधानों का उल्लेख ही नहीं है! संक्षेप में ‘माओवाद’ बहाना है, और जनता ही असली निशाना है। एक ओर भाजपा सरकारें और खुद गृहमन्त्री अमित शाह दावा करते हैं कि “नक्सलवाद” का खतरा अब खत्म हो रहा है, और 2026 तक इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। अगर ऐसा है तो इस नए क़ानून की जरूरत कहाँ से पैदा हुई? वास्तव में, गलत सैद्धान्तिक समझ और कार्यदिशा के कारण सीपीआई(माओवादी) जैसे संगठन खुद संकटग्रस्त हो गए हैं, लेकिन सरकार का उद्देश्य सरकार विरोधी सशस्त्र गतिविधियों को रोकना नहीं, बल्कि पूँजीपतियों के हितों का नंगे तरीके से बचाव करना है, और जनता के लोकतान्त्रिक अधिकारों का दमन करना है।
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और उनके साथियों ने मिलकर ब्रिटिश संसद में बम फेंका था। अंग्रेजों द्वारा लाए गए ‘जन सुरक्षा’ (पब्लिक सेफ्टी) विधेयक के विरोध में, बहरी सरकार के कानों तक आवाज़ पहुँचाने के लिए यह बम फेंका गया था। इस विधेयक के प्रावधान भी ब्रिटिश सरकार को किसी भी व्यक्ति को सन्देह के आधार पर गिरफ्तार करने, और बिना मुकदमे के जेल में रखने का अधिकार देता था। देश में स्वतन्त्रता आन्दोलन का दमन करना ही इस क़ानून का उद्देश्य था। जनता के विद्रोह से डरी ब्रिटिश सत्ता ने अपने दमनकारी, शोषणकारी शासन की रक्षा के लिए यह क़ानून बनाया था। आज देश स्वतन्त्र होने के बाद, लोगों द्वारा चुनी गई सरकार को सत्ता में लाने के बावजूद, सरकारों को अंग्रेजों द्वारा लाए गए ऐसे ही दमनकारी क़ानून लाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इसका जवाब बहुत आसान है।
77 साल के स्वतन्त्रता के बाद पूँजीपति वर्ग के हित में देश चलाने वाली कांग्रेस से लेकर भाजपा तक सभी सरकारों ने देश के बहुसंख्यक मज़दूर -किसान वर्ग का शोषण करके जो दयनीय स्थिति बनाई है, वह इस सत्ताधारी वर्ग को लगातार डराती रहती है। एक ओर मज़दूर वर्ग की श्रम शक्ति की लूट के दम पर पूँजीपति वर्ग भारी मुनाफ़ा कमा रहा है, दूसरी ओर असंख्य तरीकों से बड़े उद्योगों को करमाफी, कर्जमाफी, सरकारी सहायता और अनुदान, जनता की सम्पत्ति को सस्ते दामों पर बेचना जैसे उपायों से मुनाफ़े की दर के गिरते स्तर को थामने के लिए पूँजीपति वर्ग की प्रबन्धन समिति पूँजीवादी राज्यसत्ता लगातार काम कर रही है। इसीलिए इन्हें डर सताता है कि ग़रीबी, महँगाई, बेरोज़गारी, गंदगी, भूख, अपमान, भेदभाव, जातिवाद, धर्मवाद के दबाव में पिसी इस जनता को अगर अपनी समस्याओं की सही समझ हो गई तो क्या होगा? आज जिस अभूतपूर्व स्तर पर निजीकरण, बाजारीकरण के जरिए अल्पसंख्यक मालिक वर्ग की तिजोरियाँ भरी जा रही हैं, मज़दूर क़ानूनों को खत्म किया जा रहा है, बेरोज़गारी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं, और ठेका प्रथा, अस्थायीकरण के जरिए वास्तविक मजदूरी रसातल में पहुँच गई है, जनता का बड़े पैमाने पर विस्थापन करने वाले, अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले तथाकथित “विकास” प्रोजेक्ट कई जगह सरकारों द्वारा थोपे जा रहे हैं। हाल ही में बांग्लादेश, श्रीलंका और इससे पहले ट्यूनीशिया, मिस्र जैसे देशों में क्रान्तिकारी विकल्प न होने के बावजूद सरकारों के ख़िलाफ़ हुए जनविद्रोह दुनिया भर की सरकारों के लिए खतरे की घण्टी हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी देशव्यापी या व्यापक क्रान्तिकारी आन्दोलन की अनुपस्थिति में भी पूँजीपति वर्ग को डर सताता रहता है। कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो की शुरुआत में ही मार्क्स-एंगेल्स ने कहा था, “कम्युनिज्म के “भूत” ने यूरोप को हिलाकर रख दिया है”। दुनिया में मज़दूर वर्ग की क्रान्तियों का युग शुरू होने से लेकर, आज मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के नीचे आने के दौर में भी, उसके उभार का डर पूँजीपति वर्ग को सताता ही रहता है। फ़ासीवादी राज्य तो डर पर ही आधारित होता है, इसलिए वह और भी ज्यादा भयभीत रहता है। इसीलिए बड़े पूँजीपति वर्ग के विश्वसनीय कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी के हाथ में ‘लाल’ रंग की पूँजीवादी लोकतन्त्र के संविधान की किताब भी फ़ासीवादी भाजपा को एक ‘अर्बन नक्सल’ दस्तावेज लगती है। ‘लाल’ रंग यानी मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध का डर ही उन्हें लगातार सताता रहता है।
जनता में बढ़ते असन्तोष की पूँजीपति वर्ग को अच्छे से जानकारी है और यह भी अहसास है कि सिर्फ धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसे हथियारों से मेहनतकश जनता को लगातार उलझाकर और भ्रमित करके रखना अपर्याप्त रणनीति है; और इसीलिए ज़रूरत पड़ने पर दमनकारी कार्रवाई के लिए ऐसे क़ानूनों की आवश्यकता पड़ती रहती है। जनता का आन्दोलन ही आज एक निष्क्रिय अवस्था में चला गया है, दक्षिणपन्थी प्रतिक्रियावादी ताकतें ही सड़कों पर उतरकर आतंकवादी हिंसक कार्रवाइयाँ कर रही हैं, और इसलिए वास्तव में इस क़ानून को लागू करते समय असंख्य लोकतान्त्रिक, नागरिक, छात्र, युवा, मज़दूर, महिला, राजनीतिक पार्टियों जैसे संगठनों पर एक साथ प्रतिबन्ध लगाने की सम्भावना तुरन्त नहीं दिखती; लेकिन एक साथ दमन नहीं, बल्कि चुनिंदा, लक्षित दमन और उसके जरिए दूसरों में डर, सजगता पैदा करना, उन्हें काबू में लाना और भविष्य में ज़रूरत पड़ने पर बेलगाम इस्तेमाल के लिए इस क़ानून का हथियार हाथ में रखना ही सरकार का उद्देश्य है।
पूँजीवादी राज्यसत्ता का काम होता है कि पूँजीपति वर्ग के विभिन्न समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा का प्रबन्धन करे, पूँजीपति वर्ग के समग्र हित और बाज़ार व्यवस्था के निरन्तर संचालन और विस्तार को सुनिश्चित करे। और इसके लिए मुनाफ़े की दर का औसतन बनाए रखना इसका आर्थिक तरीका होता है। लेकिन समग्र अर्थव्यवस्था में ही मुनाफ़े की दर के गिरते स्तर का संकट गहरा होने के बाद राज्यसत्ता के भीतर भी संकट खड़ा हो जाता है। फ़ासीवाद ऐसे ही संकट की एक प्रतिक्रिया के रूप में सत्ता में आता है। इसी वजह से मोदी-शाह जोड़ी के तानाशाही शासन के समर्थन में देश में पूँजीपति वर्ग के सभी प्रमुख हिस्से खड़े हैं। पूँजीपति वर्ग के आन्तरिक राजनीतिक संकट का ही नतीजा है कि अब कांग्रेस जैसे पूँजीपति वर्ग के विश्वसनीय दल पर भी पूँजीवादी ढाँचे के भीतर ही कल्याणकारी योजनाएँ पेश करने और अडानी-अंबानी जैसे समूहों की आलोचना करने के बाद, “शहरी नक्सलवाद” के आरोप लग रहे हैं।
20वीं सदी में आए आर्थिक संकट के परिणामस्वरूप पैदा हुए राजनीतिक संकट ने हिटलर, मुसोलिनी के फ़ासीवाद को जन्म दिया था, लेकिन 21वीं सदी का फ़ासीवाद लोकतान्त्रिक संस्थाओं को ध्वस्त करके और सीधे तानाशाही थोपकर काम नहीं करता। मुनाफ़े की दर के गिरते स्तर के दीर्घकालिक आर्थिक संकट की स्थिति में पैदा हुए, राजनीतिक संकट की अभिव्यक्ति वाले, आर्थिक संकट में मुनाफ़े की दर को बनाए रखने के लिए, नवउदारवादी दौर में, पूँजी को जो ‘खुला मैदान’, निवेश की स्वतन्त्रता, बाजारों पर नियन्त्रण, संसाधनों पर नियन्त्रण, मज़दूर वर्ग पर नियन्त्रण चाहिए और उसके लिए पूँजीवादी लोकतन्त्र की संरचना में अब न्यायपालिका-विधायिका-कार्यपालिका जैसे अधिकारों का अलगाव और निर्णय प्रक्रिया में देरी ज्यादा बाधा बनती है। कार्यपालिका का बढ़ता वर्चस्व फ़ासीवादी ही नहीं, बल्कि सभी नवउदारवादी राज्यसत्ताओं की एक खासियत है। इसीलिए एक ओर न्यायालयों से लेकर चुनाव आयोग तक सभी लोकतान्त्रिक संस्थाओं को अन्दर से खोखला करते हुए, उनमें फ़ासीवादी विचारधारा का प्रभुत्व स्थापित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका और विधायिका के अधिकारों पर बढ़ते अतिक्रमण के साथ कार्यपालिका की बढ़ती भूमिका और वर्चस्व स्थापित किया जा रहा है। ‘जन सुरक्षा’ जैसे क़ानून सरकार, मन्त्रियों, पुलिस, अधिकारियों के हाथ में दमनकारी अधिकार देकर इसी प्रक्रिया का सिर्फ़ अगला कदम हैं।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2025













