कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हॉस्टल मेस कर्मचारियों का संघर्ष ज़िन्दाबाद!
लेबर कोर्ट के फै़सले के बाद भी स्थायी कर्मचारी होने की माँग को लेकर आन्दोलन जारी
बिगुल संवादाता
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हॉस्टल मेस कर्मचारी विगत 26 दिनों से अपनी माँगों को लेकर प्रदर्शनरत हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में हॉस्टल में काम कर रहे इन करमचारियों को विश्वविद्यालय प्रशासन अपना कर्मचारी मानने तक से इनकार करता रहा है। मात्र 5000 की तनख़्वाह पाने वाले ये कर्मचारी हर साल अपनी माँगों को लेकर आवाज़ उठाते रहे हैं, और हर साल प्रशासन उन्हें यही हवाला देता रहा है कि वे विश्वविद्यालय के कर्मचारी हैं ही नहीं, उन्हें लेबर कोर्ट जाना चाहिए। कर्मचारियों की रजिस्टर्ड यूनियन, होटल मेस कर्मचारी यूनियन ने केस डाला भी और लेबर कोर्ट से बीते 31 मार्च को उनके हक़ में फै़सला भी आ गया । जिस फै़सले में उन्हें विश्वविद्यालय के कर्मचारी मानने, न्यूनतम वेतन लागू करने व पक्के किये जाने की बात थी। मगर विश्वविद्यालय प्रशासन ने फै़सले को मानने से साफ़ इनकार कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि उनके पास कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं है, वहीं दूसरी तरफ़ विश्वविद्यालय में हो रहे ‘रत्नावली’ में बहाने के लिए काफ़ी पैसे हैं।
पिछले दिनों विश्वविद्यालय में मौजूद तमाम छात्र संगठनों ने भी छात्र-मज़दूर एकता के नारे को बुलन्द करते हुए कर्मचारियों के हक़ में कुलपति को ज्ञापन सौंपा, जिस पर कुलपति ने उन्हें राजनीति से दूर रहने की नसीहतें दे डालीं! हॉस्टल मेस में काम करने वाले लगभग 300 लोग अपने परिवारों के साथ हॉस्टल से बाहर अपने एक कमरों के क्वाटर यानी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। जब उनका बिजली का बिल ही 1000-500 रुपये के क़रीब आता है, तब ऐसे में 5000 रुपये में घर चलाना कितना मुश्किल होगा, यह साफ़ ज़ाहिर है। प्रशासन ने अपने हाथ सीधे इस मामले से खींच लिए हैं। कुलपति के कान पर प्रदर्शनों का कोई असर नज़र नहीं आ रहा। सबसे हास्यास्पद बात तो यह है कि कुलपति के अनुसार ये विश्वविद्यालय के नहीं बल्कि हॉस्टल में रहने वाले ‘बच्चों’ के नौकर हैं। कर्मचारी रोज़ अपनी बैठक करते हैं, और उसके बाद विश्वविद्यालय में रैली निकालकर अपनी आवाज़ बुलन्द करते हैं। पर आज 26 दिनों में भी प्रशासन की तरफ़ से किसी ने उनकी सुध तक नहीं ली है। वहीं एक कर्मचारी का कहना है कि प्रशासन उनसे खिलवाड़ कर रही है। जिस दिन उन्होंने डीसी, कुरुक्षेत्र को ज्ञापन सौंपने की योजना बनायी थी, उस दिन प्रशासन ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि वो उनकी समस्या का हल निकालेंगे। पर अब वे कोई भी समझौता करने से साफ़ इंकार कर चुके हैं। अब तक तो कर्मचारियों ने काम बन्द कर हड़ताल शुरू नहीं की है, पर यदि प्रशासन का यही रवैया रहा तो अपने आन्दोलन को और तेज़ करने से वे भी पीछे नहीं हटेंगे। और इतना ही नहीं, वे विश्वविद्यालय में पढ़ रहे छात्रों से भी अपील करेंगे कि इस संघर्ष में वो उनका साथ दें। इस बार तो लेबर कोर्ट का फै़सला भी उनके हक़ में है। ऐसे में देखना यह है कि कुलपति की तानाशाही कब तक चलेगी!
मज़दूर बिगुल,अक्टूबर-दिसम्बर 2017














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