कारख़ाना मालिकों की मुनाफ़े की हवस ने किया एक और शिकार
राजविन्दर
लुधियाना के रंगाई कारख़ानों में कभी बॉयलर फटने, कभी मशीन की खराबी से मज़दूरों की जान जाने का सिलसिला रुक ही नहीं रहा है। मालिकों के लालच और लापरवाही का शिकार होने वाले मज़दूरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 14 अगस्त को श्रीगणेश डाईंग में मशीन फटने से नीलू नाम का एक और मज़दूर मुनाफ़े की हवस का शिकार हो गया।
श्रीगणेश डाईंग फ़ैक्ट्री लुधियाना शहर से सटे भामिया गाँव में स्थित है। यहाँ 100 से अधिक मज़दूर काम करते हैं। काम ठेके पर होता है। किसी भी तरह का कोई श्रम क़ानून लागू करना कारख़ाना मालिक आपनी तोहीन समझते हैं। यहाँ तक कि मज़दूर का नाम तक हाजिरी रजिस्टर पर दर्ज नहीं होता। कोई भी विवाद होने पर मज़दूर अपने को फ़ैक्ट्री का मज़दूर साबित नहीं कर पाता। मालिक सारा काम ठेके पर देकर अपना पल्ला झाड़ चुका है। मालिक, मज़दूर की सुरक्षा की जिम्मेदारी ठेकेदार और खुद मज़दूर पर डाल चुका है। यानी नीलू की मौत मुनाफ़े की हवस की वजह से हुई, जिसके चलते इंसान की ज़िन्दगी से ज़्यादा मुनाफ़े को महत्व दिया जाता है।
नीलू बिहार के गया जिले का रहने वाला था। इस कारख़ाने में पिछले लगभग 8-9 महीने से काम कर रहा था। रंगाई की जिस मशीन को नीलू चला रहा था उस मशीन को चलाने के लिए कुशल मज़दूर की जरूरत रहती है। लेकिन कुशल मज़दूर अधिक वेतन की माँग करते हैं। वे 12 घण्टे 4,000 रुपये पर खटने को तैयार नहीं होते। मालिक ने अपना पैसा बचाने के लिए नीलू को रखा था। मशीन में भाप के अधिक दबाव से मशीन फट गयी और गर्म पानी और कपड़ा नीलू के ऊपर आ गिरा। 99 प्रतिशत जले हुए नीलू को एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ लगभग एक दिन रहने के बाद उसकी मौत हो गयी। तीसरे दिन परिजनों के आने के बाद नीलू का अन्तिम संस्कार हुआ। मालिक ने 85,000 रु. और अंतिम संस्कार का खर्चा देकर नीलू की जान लेने के अपने गुनाह से निजात पा ली। इस घटना के बारे में किसी टेलीविजन या अखबार में नहीं आया। खबर को इस तरह दबा दिया गया कि कारख़ाने के आसपास रहने वाले लोगों तक को इस घटना की जानकारी ही नहीं मिली।
नीलू के साथ रहने वाला एक आदमी कह रहा था “मालिक तो बहुत अच्छा है। उसने बिना माँगे ही इतना दे दिया। नुक्सान तो मालिक का भी हुआ है। नीलू की किस्मत में यही लिखा हुआ था। कोई क्या कर सकता था।” उसके इन शब्दों से कुछ और मज़दूर भी सहमत थे। लेकिन एक बात सोचने लायक है कि मालिक भी उसी फ़ैक्ट्री में आता-जाता है जहाँ मज़दूर काम करता है। फिर हर रोज होने वाले हादसों में हमेशा मज़दूर ही क्यों मरता है। कोई मालिक क्यों नहीं मरता? अगर ऊपर से लिखे होने की बात है तो मालिक की मौत क्यों कारख़ाने में होने वाले किसी हादसे के दौरान क्यों नहीं लिखी होती? असल में ऊपर से कुछ नहीं लिखा होता। जो मशीन पर काम करता है दुर्घटना उसी के साथ होती है। मालिकों के लिए तो मज़दूर एक मशीन का पुर्जा है, न कि इन्सान! पुर्जा बिगड़ने के बाद नया लगा दिया जाता है। नीलू की जगह भी और कोई नया पुर्जा ले लेगा। मालिकों की फ़ैक्ट्री का बीमा रहता है। उसकी तो नई मशीन लग जायेगी। इसलिए उसका कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन नीलू के माँ-बाप के लिए नीलू लौट कर नहीं आएगा! किसी इन्सान की क़ीमत कभी नहीं लगाई जा सकती। भविष्य में उस इन्सान को पता नहीं कितने काम करने थे जो उसके परिवार और समाज के लिए ज़रूरी होते।
यह मसला एक नीलू की मौत का नहीं है। मसला है मालिकों द्वारा श्रम क़ानूनों और सुरक्षा मानदण्डों की धज्जियाँ उड़ाने का। मालिकों और श्रम विभाग के अधिकारियों के नापाक गठबन्धन के कारण मज़दूर आज पिस रहे हैं। लेकिन यह सोचना होगा कि कब तक मज़दूर नीलू की तरह मालिकों के मुनाफ़े की हवस की भेंट चढ़ते रहेंगे, कब तक अपनी हडि्डयाँ उनके महलों में ईंटों की जगह चिनते रहेंगे, कब तक खुद के घर के दिये बुझाकर उनके महलों को रोशन करते रहेंगे?
बिगुल, सितम्बर 2009













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