पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी द्वारा एसआईआर और जनगणना को जोड़े जाने का फ़ासीवादी बयान और उसके निहितार्थ
शिशिर
सरकारें जब जनता को रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा-रोज़गार-चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं करा पातीं, तो वे जनता को कभी जाति, तो कभी धर्म जैसी चीज़ों का नाम लेकर बाँटने पर आमादा हो जाती हैं। फ़ासीवादी दलों का तो पूरा अस्तित्व ही इसी प्रकार्य पर टिका हुआ होता है। हमारे देश में भाजपा ऐसा ही दल है। साल 2014 से ही केन्द्र और कई राज्यों में अपनी सरकारों के ज़रिये फ़ासीवादी भाजपा ने अपनी इसी विभाजनकारी राजनीति को लगातार आगे बढ़ाया है। अब पश्चिम बंगाल में सत्तासीन होने के बाद भाजपा इसी राजनीति को अमली जामा पहनाते हुए बंगाल को फ़ासीवाद की नयी प्रयोगशाला बनाने में जुट गयी है।
अभी हाल ही में जनगणना-2027 की शुरुआत करते हुए पश्चिम बंगाल के भाजपाई मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने बयान दिया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान “अधिनिर्णयन में जिन 27 लाख लोगों के नाम काटे गये थे, उनमें से सिर्फ़ 7 लाख लोगों ने पुनर्विचार के लिए आवेदन किया है। यह देखना बाक़ी है कि मतदाता के दर्जे के लिए दावा नहीं करने वाले लोग अब नागरिकता के लिए दावा करेंगे या नहीं।” सुवेन्दु अधिकारी ने यह भी कहा, “इस राज्य में या देश में अवैध घुसपैठिये नहीं रहेंगे।” और साथ ही, नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) का हवाला देते हुए अधिकारी ने कहा, “31 दिसम्बर, 2014 तक इस देश में आने वाले किसी भी शरणार्थी के ख़िलाफ़ कोई भी मामला नहीं दर्ज किया जा सकता।” मतलब यह कि जनगणना, एसआईआर और नागरिकता के सवाल को बेहद सोचे-समझे तरीक़े से जोड़ने का मंसूबा मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी द्वारा ज़ाहिर किया जा रहा है।
अव्वलन तो भारतीय क़ानूनों के मुताबिक ही जनगणना के दौरान किसी की नागरिकता तय नहीं की जा सकती। मगर सुवेन्दु अधिकारी का उपरोक्त बयान दिखलाता है कि भाजपा अब जनगणना का इस्तेमाल नागरिकता तय करने के लिए भी करने के बारे में सोच रही है। भाजपा पहले ही एसआईआर के ज़रिये चोर दरवाज़े से एनआरसी लागू करके क़ानूनों को धता बताते हुए लोगों के हक़ उनसे छीन रही है और बंगाल में एसआईआर में जिन लोगों का नाम कटा है, उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पाने से वंचित कर रही है। हर कोई जानता है कि “अवैध घुसपैठिया” के नाम पर भाजपाई आम जनता की निगाह में अल्पसंख्यक मुसलमानों को जनता के लिए अवांछित, उनके दुश्मन के तौर पर पेश करते हैं और नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 के तहत इसी साम्प्रदायिक प्रचार को क़ानूनी अमली जामा पहनाते हुए वे ख़ुद को “हिन्दू-समर्थक” दिखाने की कोशिश करते रहे हैं। ज़रूरी है कि हम इस बात की भी पड़ताल करें कि वाकई में भाजपा कितनी “हिन्दू-समर्थक” है और क्या वाकई में बांग्लादेश से कई चरणों में और ख़ास तौर पर बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भारत आये सभी शरणार्थियों को नागरिकता संशोधन क़ानून के तहत भारत की नागरिकता मिल रही है।
नागरिकता संशोधन क़ानून का घोषित उद्देश्य है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होने की वजह से भारत आने वाले वहाँ के हिन्दू, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध, और ईसाई अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को भारतीय नागरिकता देना, बशर्ते वे 31 दिसम्बर, 2024 (हाल ही में कट-ऑफ़ वर्ष को 2014 से बढ़ाकर 2024 किया गया) तक यहाँ आ चुके हों और यहाँ पर वे कम से कम कुल पाँच साल के लिए रह चुके हों और इन पाँच सालों के अलावा नागरिकता आवेदन के ठीक पहले तक लगातार एक साल के लिए भारत में रह चुके हों। पूछा जा सकता है कि पाकिस्तान में अहमदिया पन्थ से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों के लिए यह सुविधा क्यों नहीं, जबकि उन्हें पाकिस्तान में उत्पीड़न झेलना पड़ा है? क्योंकि वे मुसलमान हैं! और यह सुविधा सिर्फ़ धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए ही क्यों और भाषाई या राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों के लिए क्यों नहीं? आख़िर, श्रीलंका में तमिलों को लम्बे समय तक राजकीय दमन झेलना पड़ा है और उन तमिलों में बड़ी तादाद हिन्दुओं की ही है। इन सवालों का जवाब यह है कि संघ परिवार और भाजपा को वाकई में किसी के धार्मिक उत्पीड़न की वजह से उनके साथ कोई हमदर्दी नहीं है। फ़ासीवादी संघ परिवार और भाजपा तो स्वयं भारत में मुसलमानों के धार्मिक उत्पीड़न के लिए ज़िम्मेदार हैं! असल में, इस क़ानून के दायरे से मुसलमानों को बाहर रखना देश में साम्प्रदायिकता बढ़ाने की क़वायद मात्र है। पहले वे मुसलमानों को बतौर दुश्मन पेश करते हैं, फिर उन “दुश्मनों” को “सबक” सिखाने के लिए ऐसे क़ानून बनाते हैं। पर आइये हम देखें कि इस क़ानून के लक्षित लाभार्थी असल में कितने लाभान्वित हो रहे हैं।
ध्यान दें कि 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान उपजे हालात की वजह से नामशूद्र नामक दलित समुदाय के लोग अच्छी-ख़ासी तादाद में पश्चिम बंगाल में आये थे। (चुनावी गणित के हिसाब से नागरिकता का वादा करके भाजपा उन्हें रिझाने की कोशिश करती रही है। इस लेख में हम इसी समुदाय को केन्द्र में रखकर बात करेंगे।) उस समय की सरकारों ने उनमें से कई को बंगाल से बाहर अन्य राज्यों में जाकर बसने के लिए भी मजबूर किया था। आगे चलकर, इन शरणार्थियों को राशन कार्ड जैसे कुछ दस्तावेज़ मिले, लेकिन भारत की नागरिकता मिलने के द्वार उनके लिए 1985 में बन्द कर दिये गये जब तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार ने नागरिकता क़ानून में संशोधन करते हुए तय किया कि 25 मार्च, 1971 को या उसके बाद बांग्लादेश से भारत आने वाले शरणार्थियों को नागरिकता नहीं दी जायेगी। पर क्या आप जानते हैं कि पहली बार इन शरणार्थियों को क़ानून बनाकर ग़ैर-क़ानूनी आप्रवासी की संज्ञा किस सरकार ने और कब दी? 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने! इस तरह पहले से ही बुरे हालात में जी रहे नामशूद्र समुदाय के लोगों से शरणार्थी का दर्ज़ा छीन उन्हें ग़ैर–क़ानूनी आप्रवासी का दर्जा देकर उनके मानवाधिकारों के हनन का क़ानूनी मार्ग फ़ासीवादी भाजपा के द्वारा ही प्रशस्त किया गया था!
नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 के तहत नागरिकता के आवेदन के लिए आवेदकों को दो सबूत पेश करने होंगे: 1) एक ऐसा दस्तावेज़ जो साबित करता हो कि उनकी मौजूदा नागरिकता पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़गानिस्तान की है, 2) एक ऐसा दस्तावेज़ जो साबित करता हो कि वे कट-ऑफ़ तारीख़ या उससे पहले भारत में आ चुके थे। सवाल उठता है कि धार्मिक उत्पीड़न की स्थिति में भागकर भारत आने वाले लोगों के पास क्या ऐसे दस्तावेज़ होंगे? बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान नामशूद्र दलित समुदाय के जो लोग लाखों की तादाद में भारत आये थे, उनमें से कितने लोग होंगे जो ऐसा कोई दस्तावेज़ अपने साथ लेकर आ पाये होंगे? इसके अलावा आवेदकों को घोषित करना होगा कि वे आवेदन के वक़्त पाकिस्तानी, बांग्लादेशी या अफ़गानिस्तानी राष्ट्रीयता रखते हैं और उक्त धर्मों में से किसी एक से आते हैं। यानी, धार्मिक उत्पीड़न की वजह से भारत आयी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा तो आवेदन भी नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसके पास ऐसे दस्तावेज़ ही नहीं होंगे और होंगे भी तो यह शंका बनी रहेगी कि कहीं धार्मिक उत्पीड़न साबित न होने की सूरत में उनका आवेदन अस्वीकृत होता है, तो उन्हें डिटेण्शन कैम्प में भेजे जाने जैसी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि उन्होंने तो आवेदन करते वक़्त ख़ुद से घोषित करके सरकार को बताया हुआ है कि वे पाकिस्तानी, बंग्लादेशी या अफ़गानिस्तानी हैं!
अकारण नहीं था कि जब 2025 के आख़िरी दो महीनों के दौरान भाजपा ने पश्चिम बंगाल के बांग्लादेश से सटे ज़िलों में 700 सीएए शिविर चलाये, तो करोड़ों लोगों में से उन्हें महज़ 60,000 आवेदक ही मिले। भाजपा के द्वारा लगातार नामशूद्र समुदाय के लोगों को आश्वासन दिया जा रहा है कि अगर वे सीएए के तहत आवेदन करते हैं, तो उन्हें नागरिकता मिल जायेगी। लेकिन, ख़ुद सुवेन्दु अधिकारी के द्वारा 1 अगस्त को दिये गये बयान के मुताबिक, पूरे बंगाल राज्य से नागरिकता के लिए कुल 2,30,605 आवेदन ही मिले हैं और तब तक सिर्फ़ 23,956 लोगों, यानी क़रीब 10 प्रतिशत आवेदकों को ही नागरिकता दी गयी थी। भाजपा सरकार लगातार इन आवेदनों से जुड़े आधिकारिक आँकड़े देने से कतराती रही है, यानी कितने आवेदन हुए, कितने स्वीकृत हुए, कितने अस्वीकृत हुए, अस्वीकृत होने वाले आवेदकों के साथ क्या हुआ, इत्यादि। और असल में, राज्यविहीन होने की मार नामशूद्र समुदाय के लोग बंगाल में पहले से ही झेल रहे हैं। उन्हें लगातार बंगाल में राज करने वाली कांग्रेस, माकपा और तृणमूल सरकारों के रहमोकरम पर, उन पार्टियों के चुनावी गणित के हिसाब से जीना पड़ा है। फिर बंगाल के 2026 के विधानसभा चुनावों के पहले सम्पन्न किये गये एसआईआर में जिन 91 लाख लोगों के नाम काटे गये थे, उनमें नामशूद्र समुदाय के लोग भी बड़ी तादाद में थे। एसआईआर की बेहद अन्यायपूर्ण प्रक्रिया में ऐसा होना ही था! और अब बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद भी उन्हें भाजपा के रहमोकरम पर जीना पड़ रहा है!
स्पष्ट है कि मेहनतकश वर्गों से आने वाले लोगों के उत्थान में भाजपा की कोई दिलचस्पी नहीं है। फ़ासीवादी भाजपा का काम है मुसलमानों को जनता के सामने उनके दुश्मन के तौर पर गढ़ते हुए, असल दुश्मन, यानी पूँजीपति वर्ग की हिफ़ाज़त करना। ऐसा करते हुए वे मुसलमानों को ख़ास तौर पर निशाना बनाते हैं और उसकी आड़ में समूची मेहनतकश जनता को आम तौर पर दमित-उत्पीड़ित करते हैं और उनके अधिकारों पर डाका डालते हैं। भाजपा ने पहले एसआईआर के नाम पर चोर दरवाज़े से एनआरसी किया। और अब वह एसआईआर में मतदाता सूची से पूर्णतः अन्यायपूर्ण ढंग से बाहर किये गये लोगों के अधिकार छीन रही है। मिसाल के तौर पर, बंगाल में इस साल 14 मई को पिछड़ा वर्ग कल्याणकारी विभाग ने 2011 से जारी किये गये जाति प्रमाणपत्रों के पुनर्सत्यापन का आदेश देते हुए एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाये गये लोगों को निशाना बनाया। इसी तरह लक्ष्मी भण्डार योजना से भी एसआईआर सम्बन्धी नाम काटे गये और भोजन एवं आपूर्ति विभाग ने भी इसी आधार पर राशन कार्डों के पुनर्सत्यापन के आदेश दिये हैं। याद रखें कि एसआईआर के बाद बंगाल में जिन 27 लाख लोगों का नाम न्यायिक निर्णयन के बाद हटाया गया है, उनमें मुसलमान ज़्यादा हो सकते हैं, लेकिन हिंदुओं की तादाद भी अच्छी-ख़ासी है! असल में न तो हिंदुओं के दुश्मन मुसलमान हैं, न ही मुसलमानों के दुश्मन हिन्दू हैं! बल्कि इन दोनों ही धर्मों से आने वाली मेहनतकश आवाम के आज सबसे बड़े दुश्मन संघ परिवार और भाजपा के दंगाई और फ़सादी हैं। इसलिए आज जब जनगणना और एसआईआर के बारे में सुवेन्दु अधिकारी ऐसी बातें बोल रहे हैं, तो उसे हमें हल्के में नहीं लेते हुए उसकी पुरज़ोर मुख़ालिफ़त करनी चाहिए। दूसरे, हम मेहनतकश लोगों को आपस में न बँटते हुए नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 और एसआईआर जैसी फ़ासीवादी कवायदों को फ़ौरन रद्द किये जाने की माँग ज़ोर-शोर से उठानी चाहिए।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026














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