देश के छात्रों-युवाओं ने किया “महामानव” की महाछवि को चकनाचूर!
भारत
“हमारी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते।” रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के इस बयान को देश के छात्रों-नौजवानों ने ग़लत साबित कर दिया। 12 वर्षों में पहली बार जनदवाब के कारण मोदी सरकार के किसी मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया है। हालाँकि धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा एक प्रतीकात्मक जीत ही है क्योंकि जो नया शिक्षा मंत्री अब गद्दी पर विराजमान है वह भी एक भयंकर नफरती फ़ासिस्ट ही है। लेकिन फिर भी छात्रों-युवाओं के आन्दोलन ने धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर तो किया ही, पर साथ ही पिछले 12 वर्षों में अरबों रुपये ख़र्च करके निर्माण की गयी नरेन्द्र मोदी की “महामानव” की छवि को पूरी तरह धवस्त भी कर दिया है। आन्दोलन में छात्र प्रधान से अधिक प्रधानमंत्री से जवाबदेही की माँग कर रहे थे। इसके बाद से ही सोशल मिडिया पर हर जगह मोदी के ‘मीम’ वायरल हो रहे हैं। नौबत यह आ गयी कि जेन-ज़ी से जुड़ने के लिए मोदीजी को रीलें बनानी पड़ी, पर उसका भी सोशल मीडिया पर खूब मज़ाक बनाया जा रहा है। अब तो हालात ये हो गये हैं कि तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा आईटी सेल मोदी की छवि को धवस्त होने से नहीं बचा पा रहा है। यही कारण है कि भाजपा ने हालिया दिनों में आनन-फ़ानन में अपनी पूरी सोशल मीडिया टीम ही बदल डाली!
कैसे गढ़ी गयी नरेन्द्र मोदी की “महामानव” छवि?
पिछले 12 वर्षों से नरेन्द्र मोदी की “महामानव” छवि गढ़ने के लिए अरबों-खरबों रुपये ख़र्च किये गये। प्रधानमंत्री का अलग-अलग तरीक़ों से प्रभा मण्डल गढ़ने का काम किया गया ताकि यह दिखाया जा सके कि वह पुरुष नहीं बल्कि “महापुरुष” हैं, “इन्सान के रूप में ईश्वर हैं” जो देश को एक नये कालखण्ड में प्रवेश कराने के लिए आये हैं, इत्यादि!! भाजपा के विधायकों-सांसदों द्वारा लगातार मोदी को भगवान के अवतार के रूप में पेश किया जाता रहा है। 22 जनवरी, 2024 के राम मन्दिर उद्घाटन प्रचार के लिए देशभर में मोदी को इस तौर पर प्रचारित किया गया कि वह “बालक राम” को मन्दिर में लाने वाले अवतार हैं! इस अवतार रूप को स्थापित करने का काम मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही शुरू कर दिया गया था। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी के एक प्रस्ताव में कहा गया था कि भगवान शिव की तरह, मोदी सभी विपक्षी हमलों को सहन करते हुए भारत और दुनिया के सर्वोच्च और सबसे लोकप्रिय नेता बन गये हैं! भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाघ ने कहा कि हमारे पीएम विष्णु के 11वें अवतार हैं और संस्कृत श्लोक ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ उद्धृत करते हुए बताया कि जब भी धर्म का पतन होता है, भगवान दुनिया को बचाने के लिए एक अवतार के रूप में प्रकट होते हैं और आज मोदी जी के अवतार रूप में वह हमारे सामने हैं! शिवराज सिंह चौहान के कथन के अनुसार पीएम मोदी में “भगवान के अंश” हैं और वह “अलौकिक” हैं!
मोदी जी ईश्वरीय अवतार साबित हो ही चुके हैं तो उनके पूजन के लिए मन्दिरों का निर्माण भी भक्तों ने देशभर में शुरू कर दिया है! उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी में एक मन्दिर है, जहाँ कथित तौर पर शिव के साथ नरेन्द्र मोदी की पूजा की जाती है। एक भाजपा नेता ने पुणे में एक मोदी मन्दिर बनवाया और उसके साथ मोदी को समर्पित एक कविता को भी प्रदर्शित किया। कथित तौर पर उत्तर प्रदेश के मेरठ में भी पाँच एकड़ ज़मीन पर 10 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 100 फुट की मोदी मूर्ति वाला एक मन्दिर बनाया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी ने जिस स्कूल में अपनी प्रारम्भिक पढ़ाई की है उसे एक पवित्र ‘प्रेरणा स्थल’ बनाया गया है, जहाँ छात्रों को विभिन्न राज्यों से अध्ययन दौरों पर लाया जा रहा है। मोदी कॉलेज और मोदी प्रदर्शनियों के ज़रिये उसकी “महानता” को स्थापित करने के काम में पैसे पानी की तरह बहाये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री के रेडियो शो मन की बात के 100वें एपिसोड को हर स्कूल, कॉलेज, सरकारी से लेकर प्राइवेट दफ़्तरों में सुनने को बाध्यकारी बनाया गया और न सुनने वालों पर जुर्माना लगाया गया। जन औषधि दुकानों से लेकर राशन की दुकानों पर स्कूल-कॉलेजों में भी मोदी को एक ब्रैण्ड, एक ‘कल्ट फ़िगर’ के रूप में लोगों के दिमाग में बिठाया जा रहा है। एक ऐसा चरित्र जो लोगों के सवालों, उनकी आलोचनाओं से परे हो। इसका ही नतीजा है कि आज मोदी का विरोध करने वाले लोगों को देश का विरोध करने वालों में गिना जा रहा है और उनपर देश-विरोधी होने का मुक़दमा दर्ज किया जा रहा है। मोदी का कल्ट निर्माण हिटलर सरीखा ही निर्मित किया गया है और दोनों की भावभंगिमा नाटकीयता से परिपूर्ण है।
क्यों फ़ासीवादियों के लिए ज़रूरी है “महामानव” छवि का निर्माण
दरअसल फ़ासीवादी विचारधारा, जो कि एक विशिष्ट प्रकार की प्रतिक्रियावादी विचारधारा है, के लिए फ़ासीवादी नेता की छवि-निर्माण करना उसकी कार्य प्रणाली का अभिन्न अंग है। फ़ासीवादी प्रचार इसके बग़ैर मुकम्मल तौर पर काम नहीं कर सकता है। यही कारण है कि फ़ासीवादी विचारधारा सबसे पहले एक नकली या काल्पनिक शत्रु खड़ा करने का काम करती है, यह काल्पनिक शत्रु आम तौर पर, विचारणीय आकार की कोई भी अल्पसंख्यक आबादी (नस्ली, धार्मिक, नृजातीय (ethnic) या किसी अन्य अस्मिता पर आधारित) हो सकती है जिसे बेहद बढ़ा-चढ़ाकर ख़तरे के रूप में पेश किया जाता है, फिर इसी नक़ली दुश्मन को बेरोज़गारी, महँगाई व भ्रष्टाचार से लेकर सामाजिक व आर्थिक असुरक्षा तक, पूँजीवाद के पापों के लिए दोषी ठहराने का काम किया जाता है, इस नक़ली दुश्मन की छवि को गढ़ने के लिए, इस विशिष्ट अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में सभी पूर्वाग्रहों और मिथकों का आवाहन किया जाता है, उन्हें व्यवस्थित किया जाता है, उनका बार-बार प्रचार कर उन्हें सामान्य बोध में बदल दिया जाता है और फिर उन्हें सुनियोजित तरीक़े से फ़ासीवादी शक्तियों द्वारा एक हथियार में तब्दील किया जाता है। इसके अगले क़दम के तौर पर फ़ासीवादी विचारधारा इस नकली दुश्मन के विरुद्ध एक उतने ही और शुद्ध रूप से विचारधारात्मक समुदाय का निर्माण उसके द्वन्द्वात्मक अन्य के रूप में करती है जिसकी इकाई नस्ल, धर्म, नृजातीयता, क्षेत्रीय अस्मिता, आदि कुछ भी हो सकती है। इस शुद्ध रूप से विचारधारात्मक समुदाय के सदस्यों की परिभाषा का आधार यह नहीं है कि वे क्या हैं, बल्कि यह है कि वे क्या नहीं हैं। यह शुद्ध रूप से विचारधारात्मक समुदाय किसी भी अस्मिता की इकाई पर आधारित हो सकता है और इसे ही ‘राष्ट्र’ घोषित कर दिया जाता है और राष्ट्र के इसी अवैज्ञानिक और अनैतिहासिक फ़ासीवादी विचार के आधार पर अन्धराष्ट्रवाद की लहर को खड़ा किया जाता है। ज़ाहिर है, फ़ासीवादियों के इस ‘राष्ट्र’ का राष्ट्र की ऐतिहासिक श्रेणी से कोई लेना-देना नहीं है। इसी प्रक्रिया के अगले क़दम के तौर पर फ़ासीवादी विचारधारा फ़ासीवादी नेता/नेतृत्व को इस शुद्ध रूप से विचारधारात्मक समुदाय यानी कि इस ‘राष्ट्र’ के अकेले प्रवक्ता के रूप में स्थापित करती है। इस शुद्ध रूप से विचारधारात्मक समुदाय के लिए फ़्यूहरर की छवि का निर्माण एक अकेले नेता, अकेले प्रवक्ता और ‘हृदय सम्राट’ के रूप में किया जाता है। इसके बाद शत्रु की छवि को तेज़ी से विस्तारित किया जाता है और उसमें ‘अकेले प्रवक्ता’ और ‘अकेले नेता’ के विरुद्ध खड़े हर प्रकार के राजनीतिक विरोध को समेट लिया जाता है। इस प्रकार, कोई भी जो फ़्यूहरर का विरोध करता है या उसकी व उसके संगठन की आलोचना करता है, वह स्वत: ही राष्ट्र का दुश्मन बन जाता है, राष्ट्र-विरोधी, देश-विरोधी, और एक ग़द्दार बन जाता है। मिसाल के लिए, हिटलर की मुख़ालफ़त करने वाला कोई व्यक्ति फ़ौरन जर्मन-विरोधी, यहूदी षड्यन्त्रकारी, ग़ैर-आर्य, आदि घोषित कर दिया गया था। इसी प्रकार, हमारे देश में, आज, मोदी और शाह या आर.एस.एस. की मुख़ालफ़त करने वाले किसी भी व्यक्ति को स्वत: हिन्दू-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी, ग़द्दार क़रार दिया जाता है। इस प्रकार, कम्युनिस्ट, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, नागरिक व जनवादी अधिकार कार्यकर्ता, गम्भीर व सच्चे पत्रकार, जनपक्षधर वकील, शिक्षा व रोज़गार के अधिकार के लिए लड़ने वाले छात्र व युवा, सभी के सभी स्वत: ही राष्ट्र-विरोधी, हिन्दू-विरोधी और ग़द्दार बन जाते हैं। इस प्रकार, फ़ासीवादी विचारधारा द्वारा बेहद तेज़ी से शत्रु की छवि को हर प्रकार के राजनीतिक विरोध को अपने अन्दर समेट लेने के लिए विस्तारित कर दिया जाता है।
कुल मिलाकर कहें तो फ़ासीवादी प्रचार का सार झूठ है इसलिए ही इसे भव्यता और एक किस्म का सामूहिक सम्मोहन या यूँ कहे कि इन्द्रजाल रचने की ज़रूरत होती है। नाज़ी जर्मनी में हिटलर के प्रचार को रेडियो के माध्यम से, उसके भाषण को जगह-जगह भोंपू लगाकर प्रचारित किया जाता था। उसकी रैलियाँ भव्य होती थी और भाषण भी विशालकाय मंच के ज़रिये ही दिये जाते थे। फिल्मों के ज़रिये भी नाज़ियों ने हिटलर की “महानता” को स्थापित करने का काम किया। राजनीति के सौन्दर्यीकरण का इस्तेमाल फ़ासिस्ट ताक़तें पहले भी करती रहीं हैं और आज भी हमारे देश की फ़ासीवादी हुकूमत इसका ही इस्तेमाल कर मिथकों को सच और सामान्य बोध के तौर पर जनमानस में स्थापित कर रही है।
मोदी के कल्ट निर्माण के ज़रिये तथा अन्य प्रचार के ज़रिये (चाहे वो मीडिया का हो, फिल्मों के माध्यम से हो, भाषणों व अन्य सांस्कृतिक माध्यमों के इस्तेमाल से हो) फ़ासीवादी ताक़तें अपने राजनीतिक विरोध को लोगों के बीच अकल्पनीय और अविश्वसनीय बनाती हैं और अपने अस्तित्व को प्रश्नेतर बनाती हैं।
भाजपा-आरएसएस द्वारा अतीत के गौरव से लेकर “हिन्दू राष्ट्र” की महानता का मायाजाल गढ़ने का काम इसीलिए ही किया जाता है ताकि खुद को उस “प्राचीन भारतीय गौरवशाली अतीत” और “हिन्दू राष्ट्र” का इकलौता वाहक और एकमात्र प्रतिनिधि घोषित कर सके और जो कोई भी इन धर्मध्वजाधारियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाये उन्हें इस “हिन्दू राष्ट्र” का दुश्मन बताया जा सके। पिछले बारह सालों में हमें ऐसे प्रचार के कई नमूने मिल जायेंगे जो यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं। फ़ासीवादी उभार टुटपुँजिया वर्ग और मज़दूर वर्ग के एक हिस्से (सफ़ेद कॉलर मज़दूरों का एक हिस्सा और लम्पट सर्वहारा का एक हिस्सा) का महज़ ब्रेन वॉश करके नहीं होता बल्कि इस आबादी के बीच असुरक्षा व अनिश्चितता के कारण पैदा होने वाली प्रतिक्रिया की सम्भावना को वास्तविकता में तब्दील करके होता है। पूँजीवादी व्यवस्था जनित सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा और इसके अलावा पूँजीवादी-पितृसत्तात्मक मूल्य-मान्यताएँ इसका सन्दर्भ होती हैं। ठीक इसी वजह से इस आबादी के एक हिस्से के बीच साम्प्रदायिकता और राष्ट्रवाद की रहस्यवादी अपीलें अपनी जड़ें जमाने में कामयाब होती हैं और ये फ़ासीवादियों द्वारा तैयार भीड़ की अगली कतार में होते हैं।
विरोधियों की आवाज़ को दबाने के लिए कसा जा रहा है सोशल मीडिया पर शिकंजा
जन्तर-मन्तर के आन्दोलन के बाद अपनी गिरती साख बचाने के लिए संघ-भाजपा जी-जान से लगी हुई है। एक तरफ़ मोहन भागवत जेन-ज़ी से संवाद कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ़ संघ परिवार ने 15-16-17 साल के नवयुवाओं को डराने, धमकाने, गैंगरेप, मर्डर की धमकी देने के लिए अपने ऑनलाइन गुण्डों की सेना लगा ही दी है। नतीजतन, एक 15 साल की लड़की को इतना डराया गया कि उसे ऑनलाइन आकर माफ़ी माँगनी पड़ी! संघ परिवार की ऑफ़िशियल सेना के अलावा उसकी अनॉफ़िशियल सेना, यानी दिल्ली व अन्य राज्यों की पुलिस, तो पहले से ही एफ़आईआर वापस लेने और सभी गिरफ़्तार छात्रों को छोड़ने के वायदे का भर्ता बना ही रही है। इसके साथ ही सोशल मिडिया से मोदी के ख़िलाफ़ की गयी पोस्टों को धड़ल्ले से हटाया जा रहा है। मेटा द्वारा पत्रकारों, राजनेताओं, मीडिया संगठनों और राजनीतिक टिप्पणीकारों की मोदी-विरोधी साम्रगी को बिना किसी स्पष्टीकरण के हटाया जा रहा है और उनकी प्रोफाइलों को प्रतिबन्धित किया जा रहा है। आईटी नियम, 2026 के संशोधनों के तहत, प्लेटफार्मों को सामग्री हटाने के सरकारी आदेशों का पालन करने के लिए बहुत कम समय दिया गया है। साथ ही, मेटा कम्पनी के नेतृत्व और केन्द्र सरकार के बीच हुई बैठकों के बाद सरकार-विरोधी सामग्री इंस्टाग्राम से तेज़ गति से हटायी जा रही हैं। कई रपटें बताती हैं कि मेटा ने 2026 में भारत में क़रीब 28,000 से अधिक पोस्टों को प्रतिबन्धित कर दिया है। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण निम्न हैं:
नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान ग़ैर-क़ानूनी तरीके से गिरफ़्तार किये गये मज़दूर कार्यकर्ताओं, कलाकारों, पत्रकारों और मज़दूरों की रिहाई से जुड़े अभियान के फ़ेसबुक पेज ‘कारवां’ को अप्रैल माह में हटा दिया गया।
जुलाई में, मेटा ने बिना किसी पूर्व सूचना के फेसबुक और इंस्टाग्राम से ‘द वायर’ की दो रिपोर्टें हटा दीं।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सदस्यों और अन्य प्रदर्शनकारियों की पोस्ट को भी हटाया गया।
‘आल्ट न्यूज़’ के मोहम्मद ज़ुबैर और सृष्टि खन्ना सहित कई पत्रकारों ने भी आरोप लगाया है कि उनकी पोस्टें हटा दी गयीं और प्रोफ़ाइल को निलम्बित कर दिया गया।
भारतीय युवा कांग्रेस, सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास, समाचार पोर्टल ‘स्क्रॉल’, ‘द हिन्दू’ सहित अन्य लोगों के कईं पोस्ट ब्लॉक कर दिये गये हैं।
यह सब क्या दिखलाता है? यही कि भारत के फ़ासीवादी हुक्मरान बुरी तरह से घबराये हुए हैं। मोदीजी की “महामानव” छवि को जेन-ज़ी आन्दोलन द्वारा चकनाचूर और ध्वस्त कर दिया गया है। यही वजह है कि भाजपा इस वक़्त पूरी तरह बौखलायी हुई है। इसलिए ही तो मोदी सरकार व अन्य राज्य भाजपा सरकारों की पुलिस देश के 15 से 25 साल के नौजवानों के पीछे पड़ी है कि उसने ‘फ्यूहरर’ का अपमान कैसे कर दिया? उनकी असंसदीय भाषा को बड़ा मसला बनाया जा रहा है। सारा मामला ही भाषाई शुचिता पर स्थानान्तरित करके भाजपा सरकार और संघ परिवार आन्दोलनरत युवाओं को ही दोषी ठहराने में लग गये हैं, उन्हें मर्डर और रेप तक की ऑनलाइन धमकियाँ दिलवायी जा रही हैं, उन्हें आतंकित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन हमारे देश के प्राचीन ग्रन्थों में ही एक उक्ति है : विनाश काले, विपरीत बुद्धि। जितना अधिक मौजूदा फ़ासीवादी सरकार इन चालबाज़ियों और साज़िशों को अंजाम दे रही है, उतना ही इस पीढ़ी के युवाओं का गुस्सा और मोहभंग बढ़ रहा है, उतना ही वह समझती जा रही है कि मौजूदा मोदी सरकार किस क़दर जनविरोधी, छात्र-विरोधी और युवा-विरोधी है, उतना ही उसके अन्दर परिवर्तन की भावना विकसित होती जा रही है और उतना ही उसके अन्दर का डर भी ख़त्म होता जा रहा है। जिस सीमा रेखा पर जनता का डर ख़त्म होता है, वहीं से आततायी सरकारों और हुक्मरानों का डर शुरू होता है। अब वह मंज़िल आ चुकी है।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026














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