चमोली सुरंग हादसा: मुनाफ़े की अँधी हवस ले रही मज़दूरों की जान!
बिगुल संवाददाता
बीते 13 अगस्त को उत्तराखण्ड के चमोली में निर्माणाधीन सुरंग में हुए हादसे के दौरान मज़दूरों की मौत काम के दौरान मज़दूरों-मेहनतकशों के साथ होने वाले भयंकर हादसों की लम्बी फेहरिस्त में महज़ एक नये आँकड़े के तौर पर अंकित होकर रह गयी है। सरकारी विभागों के लिए यह मौतें बस आँकड़े हैं, इससे ज़्यादा कुछ नहीं! यह हादसा तब हुआ जब चमोली ज़िले में टिहरी हाइड्रो डेवलपमेण्ट कॉरपोरेशन (टीएचडीसी) की विष्णुगाड–पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना की निर्माणाधीन टनल में अचानक मलबे और पानी का सैलाब आ गया, जिसमें 26 मज़दूर सुरंग में फँस गये। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक मिली जानकारी के अनुसार अब तक 23 मज़दूरों को बाहर निकाला जा चुका है। इस घटना में 9 मज़दूरों की मौत हो गयी है, 14 घायल हैं और 3 मज़दूर अभी भी अन्दर फँसे हुए हैं। टीएचडीसी की इस टनल में यह कोई पहला हादसा नहीं हुआ है। इससे पहले भी इस टनल में कई हादसे हो चुके हैं। 30 दिसम्बर 2025 की रात परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग के भीतर दो लोको ट्रेनों की टक्कर हुई थी। उस समय क़रीब 109 मज़दूर सुरंग के भीतर मौजूद थे। इस हादसे में लगभग 88 लोग घायल हुए थे। 2025 में ही इस परियोजना के हेलंग डैम साइट पर भूस्खलन की घटना हुई थी, जिसमें कम से कम 8 मज़दूर घायल हुए थे। कई बार हो चुके हादसे दर्शाते हैं कि इस पूरी परियोजना में लम्बे समय से मज़दूर बिना पर्याप्त सुरक्षा इन्तज़ाम के काम कर रहे थे। ज़्यादातर मज़दूर ठेके पर काम कर रहे थे, जिनका कम्पनी के पास कोई रिकॉर्ड नहीं था।
जिस सुरंग में यह हादसा हुआ, उसके पीछे उत्तराखण्ड के सबसे बड़े निर्माणाधीन जल विद्युत प्रोजेक्टों में शामिल विष्णुगाड़-पीपलकोटी हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट यानी VPHEP है। यह अलकनन्दा नदी पर बनने वाली 4×111 मेगावाट यानी कुल 444 मेगावाट क्षमता की ‘रन-ऑफ़-द-रिवर’ परियोजना है। इसका उद्देश्य अलकनन्दा नदी के बहाव और ऊँचाई के अन्तर का इस्तेमाल करते हुए बिजली पैदा करना है। इस परियोजना में 65 मीटर ऊँचा कंक्रीट डाइवर्जन डैम, क़रीब 13.4 किलोमीटर लम्बी हेड रेस टनल और क़रीब 3.04 किलोमीटर लम्बी टेल रेस टनल समेत कई बड़ी भूमिगत संरचनाएँ बनायी जा रही हैं। बिजली घर भी भूमिगत बनाया जा रहा है, यानी यह परियोजना बाहर से देखने पर जितनी बड़ी दिखायी देती है, उससे कहीं ज़्यादा बड़ा निर्माण कार्य पहाड़ के अन्दर चल रहा है।
उत्तराखण्ड भाजपा सरकार व प्रशासन द्वारा चमोली सुरंग हादसे को आकस्मिक प्राकृतिक घटना सिद्ध करने के तमाम प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन अगर इसकी पड़ताल की जाये तो जल्द ही यह समझ आ जायेगा कि यह कोई आकस्मिक प्राकृतिक हादसा नहीं बल्कि एक मुनाफ़ा-केन्द्रित व्यवस्था द्वारा अंजाम दिया गया आपराधिक कृत्य है जिसमें कुदरत और मेहनत दोनों की खुलेआम लूट होती है और जिसका ख़ामियाज़ा मज़दूरों और आम जनता को कभी भी भुगतना पड़ जाता है। सवाल तो उठता है कि पिछले हादसों से सबक लेते हुए कम्पनी व सरकार द्वारा मज़दूरों के लिए सुरक्षा के इन्तज़ाम क्यों नहीं किये गये? एस्केप टनल (निकासी सुरंग) क्यों नहीं बनायी गयी? इससे पहले उत्तरकाशी के सिलक्यारा टनल में इस तरह का हादसा हुआ था। वहाँ भी टनल के मुहाने पर भूस्खलन हो गया था, जिसके कारण 41 मज़दूर अन्दर ही फँस गये थे, जिन्हें 17 दिनों के लम्बे रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद सुरक्षित निकाला गया था।
केदारनाथ आपदा, रैणी आपदा, तपोवन-विष्णुगाड आपदा, जोशीमठ भू-धँसाव, सिलक्यारा और अब चमोली टनल हादसा! ये हादसे और आपदाएँ आज हिमालय की नियति बनते जा रहे हैं। मुनाफ़े की अन्धी हवस में जिन परियोजनाओं को लागू किया जा रहा है उससे होने वाले नुक़सान को केवल हिमालय ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत को भुगतना पड़ सकता है। हिमालय में बड़े-बड़े बाँधों से लेकर चार धाम परियोजना, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, पंचेश्वर बाँध परियोजना आदि ने पूरे हिमालय को तबाह करके रख दिया है। इसके परिणाम भी लगातार देखने को मिल रहे हैं।
पिछले कुछ सालों से पूरे हिमालय क्षेत्र में अतिवृष्टि, बादल फटना, भू-स्खलन, भू-धँसाव की घटनाएँ बहुत ज़्यादा बढ़ गयी हैं। इससे बड़े पैमाने पर लोगों की जान तो गयी ही है बल्कि स्थानीय आबादी और भी कठिन परिस्थितियों में जीने को मजबूर हुई है। पीने के पानी और सिंचाई के प्राकृतिक जलस्रोत लगातार सूखते जा रहे हैं। प्राकृतिक आपदाएँ लोग पर कहर बनकर टूट रही हैं! इसके बावजूद ये परियोजनाएँ बदस्तूर बढ़ती जा रही हैं। बड़ी-बड़ी ठेका कम्पनियों को फ़ायदा पहुँचाने और अमीरों की विलासिता और मुनाफे की अन्धी हवस में जिस प्रकार पूरे हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह किया जा रहा है, आने वाले वक़्त में इसका ख़ामियाज़ा पूरे उत्तर भारत को भुगतना पड़ सकता है। हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी बड़ी परियोजना के ख़तरे को लेकर भूवैज्ञानिक और पर्यावरणविद् लगातार चेतावनी देते रहे हैं। लेकिन पूँजीवादी मुनाफ़ाख़ोरों के लिए पर्यावरणीय तबाही या मानव जीवन की कोई क़ीमत नहीं होती। उन्हें अपने मुनाफ़े, विलासिता और अय्याशियों के लिए नये-नये टापुओं व द्वीपों की ज़रूरत है, जो आजकल हिमालय भी बना हुआ है! इन ‘विकास’ परियोजनाओं के ज़रिये अमीरज़ादों का हिमालय के दुर्गम इलाकों में पहुँचना, वहाँ पिकनिक स्पॉट बनाना, वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर क़ब्ज़ा जमाना और उन्हें लूटना ज़्यादा ही सरल और सुगम हो जायेगा! लिहाज़ा हर प्रकार के झूठफ़रेब, तीन-तिकड़म या पर्यावरणीय क़ानूनों को बदलकर या उन्हें ताक पर रखकर इन परियोजनाओं को लागू करना है! विडम्बना यह है कि इस ‘विकास’ की क़ीमत व्यापक मेहनतकश आबादी अपनी जान देकर ही चुकाती है!
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026














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