वीबी-ग्रामजी: रोज़गार की गारण्टी या ग्रामीण मज़दूरों के अधिकारों में कटौती : जुलाई में मनरेगा के मुक़ाबले रोज़गार में क़रीब 50 प्रतिशत की गिरावट

क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन, हरियणा

देश के करोड़ों ग्रामीण मज़दूरों के लिए मोदी सरकार की नयी ग्रामीण रोज़गार योजना ‘विकसित भारत–गारण्टी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी वीबी–ग्रामजी (VB-G RAM G) के बड़े-बड़े दावों की हवा पहले ही महीने में निकलती नज़र आ रही है। ज्ञात हो कि एनडीए सरकार ने 1 जुलाई 2026 से दो दशक पुराने मनरेगा की जगह यह नयी योजना लागू की है। हालाँकि इसके पहले ही महीने के आँकड़े बता रहे हैं कि ग्रामीण मज़दूरों को रोज़गार देने के मामले में यह योजना कितनी कमज़ोर साबित हो रही है।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में वीबी-ग्रामजी के तहत केवल 7.67 करोड़ व्यक्ति–दिवस रोज़गार पैदा हुआ, जबकि जुलाई 2025 में मनरेगा के तहत 15.33 करोड़ व्यक्ति–दिवस रोज़गार मिला था। व्यक्ति-दिवस का मतलब है—एक व्यक्ति को एक दिन का मिला रोज़गार। यानी एक साल में रोज़गार में क़रीब 50 प्रतिशत की भारी गिरावट आयी है। सरकार भले ही नयी योजना को ‘गारण्टी’ और ‘विकास’ के नाम से प्रचारित करे, लेकिन ज़मीन पर सवाल यह है कि जब रोज़गार ही घट रहा है तो यह कैसी रोज़गार गारण्टी है?

वहीं सरकार की दलील है कि मॉनसून और खेती के सीज़न की वजह से रोज़गार में यह कमी आयी है। हम जानते हैं कि ग्रामीण भारत में खेती के काम की उपलब्धता मौसम पर निर्भर रहती है। इस साल भी कई इलाक़ों में बारिश की स्थिति असामान्य रही है। ऐसे समय में मनरेगा ग्रामीण मज़दूरों के लिए खेती के बाहर, सीमित अर्थों में ही सही, रोज़गार और आय का एक महत्वपूर्ण सहारा था।

रोज़गार के दिनों में इतनी बड़ी गिरावट का सीधा मतलब है कि लाखों परिवारों के सामने बेरोज़गारी और आय के संकट का खतरा बढ़ेगा। वहीं, पिछले वर्ष जुलाई में रोज़गार पाने वाले मज़दूरों की संख्या लगभग दोगुनी थी। इसलिए सरकार का यह तर्क वास्तव में वीबी-ग्रामजी की असफलता को छिपाने की नाकाम कोशिश है।

असल में, देशभर की कई मनरेगा मज़दूर यूनियनों ने पहले ही वीबी-ग्रामजी के मज़दूर-विरोधी चरित्र को लेकर अपना विरोध दर्ज करवाया था। दिसम्बर 2025 से ही मनरेगा यूनियनों के संयुक्त मोर्चे ने लिखित रूप में नये क़ानून के मज़दूर-विरोधी प्रावधानों को उजागर किया था।

हरियाणा में मज़दूरों को नहीं मिल रहा काम

हरियाणा के कलायत में मनरेगा मज़दूरों ने बताया कि पिछले एक महीने से मज़दूर बेरोज़गार बैठे हैं। सरकार टीवी चैनलों पर 125 दिनों के रोज़गार का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन मज़दूरों को पूरे साल 125 दिन तो क्या, 25 दिन काम मिलना भी मुश्किल लग रहा है! इसी तरह कैथल के फरल गाँव में योजना के तहत मज़दूरों ने तालाब की सफ़ाई का काम किया जिसकी दिहाड़ी मात्र 200 रुपये आयी, जबकि हरियाणा में वर्तमान समय में न्यूनतम मज़दूरी 409 रुपये है। फरल गाँव के मज़दूरों ने बताया कि मनरेगा के तहत नहरों, ड्रेनों और तालाबों की सफ़ाई, स्कूलों, खेल के मैदानों और श्मशान भूमि का रखरखाव जैसे अधिकांश कच्चे कार्य या तो बन्द कर दिये गये हैं या उन्हें बेहद सीमित कर दिया गया है। इसका नतीजा यह है कि मनरेगा में रोज़गार लगभग समाप्त हो चुका है।

भ्रष्टाचार के नाम पर मनरेगा के तहत मिलने वाले रोज़गार के सीमित अधिकार तक को ख़त्म करने का खेल

क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन, हरियणा के अजय ने बताया कि भाजपा और गोदी मीडिया लगातार यह प्रचार कर रहे हैं कि मनरेगा को खत्म करना ज़रूरी है क्योंकि यह भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी है। इन अडाणी-अम्बानी के सेवकों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि पिछले 11 वर्षों से मनरेगा किसके शासनकाल में लागू रही है? पूरे 11 साल मनरेगा मोदी सरकार के कार्यकाल में चली है। अगर भ्रष्टाचार हुआ है तो क्या वह मोदी सरकार और भाजपा राज्य सरकारों की नाक के नीचे नहीं हुआ? क्या यह मान लिया जाये कि पिछले 11 वर्षों से मोदी सरकार खुद मनरेगा में भ्रष्टाचार कर अपनी व अपने पूँजीपति मित्रों की जेबें भरती रही?

यह सच है की मनरेगा कोई आदर्श क़ानून नहीं है। यह क़ानून 100 दिनों के रोज़गार के सीमित और अपर्याप्त अधिकार की ही बात करता है, और वह भी केवल ग्रामीण मज़दूरों के लिए। लेकिन जहाँ ज़रूरत इस बात की थी कि ग्रामीण व शहरी दोनों मज़दूरों के लिए 365 दिनों के रोज़गार की वास्तविक गारण्टी सरकार को करनी चाहिए थी और रोज़गार के अधिकार को मूलभूत अधिकार के तौर पर मानना चाहिए था, वहाँ मनरेगा को ख़त्म करके सरकार रोज़गार के अधिकार को सुनिश्चित करने में राज्य की भूमिका को ही ख़त्म कर देने पर आमादा है। वीबी-ग्रामजी मोदी सरकार की इसी मंशा को दर्शाने वाली योजना है।

दूसरी बात, पिछले पाँच-सात वर्षों से हरियाणा में भवन निर्माण मज़दूरों के पंजीकरण की पूरी ज़िम्मेदारी भाजपा सरकार और प्रशासन के पास थी। खुद श्रम मंत्री अनिल विज यह स्वीकार कर चुके हैं कि इसमें लगभग 1,500 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। इससे साफ़ है कि आज केन्द्र से लेकर राज्य तक विभिन्न विभागों में भ्रष्टाचार व्याप्त है। अगर भाजपा नेताओं और मंत्रियों की आय की ईमानदारी से जाँच हो जाये, तो शायद देश का अबतक का सबसे बड़ा घोटाला उजागर हो सकता है। वैसे भी जिस भाजपा से जुड़े लोगों ने राम मन्दिर तक के चन्दे में घोटाला करने का मौक़ा नहीं छोड़ा, वह कितनी बड़ी सदाचारी और संस्कारी पार्टी है इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है!

मज़दूरों को नाम और नारे नहीं, रोज़गार की वास्तविक गारण्टी चाहिए। यानी कि पूरे साल काम, समय पर मज़दूरी और रोज़गार की वास्तविक कानूनी गारण्टी सरकार का दायित्व होना चाहिए। इसलिए वीबी-ग्रामजी के नाम पर रोज़गार के अधिकार को कमज़ोर करने और ग्रामीण मज़दूरों को बेरोज़गारी की ओर धकेलने का विरोध ज़रूरी है।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2026

 

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