महान साहित्यकार बेर्टोल्ट ब्रेष्ट के स्मृति दिवस (14 अगस्त) के मौक़े पर उनकी कविता – लुटेरा और उसका नौकर

दो लुटेरे लूटमार कर रहे थे हेस सूबे में
तोड़ डाली कितने ही
किसानों की गर्दनें,
एक था चिमिरखी
किसी भूखे भेड़िये जैसा
दूजा था थुलथुल
किसी अघाये पोप के जैसा
मगर क्योंकर था उनकी
बनक में इतना अन्तर?
क्योंकि एक मालिक था,
दूसरा था नौकर।
दूध की मलाई सब
मालिक सरपोट जाता
नौकर के हिस्से में महज सपरेटा आता।
लुटेरे जब किसानों की चपेट में आये
और एक रस्सी से गए दोनों लटकाये
एक झूलता हुआ किसी
सुखट्टे भूखे भेड़िये सा
और दूजा थुलथुल किसी
खाये पीये पोप जैसा
खड़े थे वहाँ कई, आड़े तिरछे, किसान
था लेकिन सभी का
उन्हीं लुटेरों पर ध्यान।
देखा कि सच ही लुटेरों जैसा चेहरा था उस थुलथुल का
मगर उस सुखट्टे ने
क्यों साथ दिया उसका?

Poem : The Robber and His Servant

Bertolt Brecht

Two robbers were plundering the province of Hesse,
Many a peasant’s neck they broke.
One was as thin as a hungry wolf,
And the other as fat as the pope.

But what made their bodies so different?
Because they were servant and master.

The master swigged the cream off the milk,
The servant got his milk already sour.

So then the peasants caught the robbers,
And when they hung by one rope,
One hung there as thin as a hungry wolf,
And one as fat as the pope.

The peasants stood there crossing themselves,
And staring at the two.
They saw that the fat man was a robber,
But why was the thin man one too?

 

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