उत्तर प्रदेश की भयाक्रान्त फ़ासीवादी योगी सरकार ने मई दिवस पर आतंक का माहौल बनाने के लिए नोएडा में लगायी धारा 163 की पाबन्दियाँ

विशाल

ज़रा सोचिये! कोई सरकार मज़दूरों को मई दिवस मनाने से कैसे रोक सकती है? वह भी खुलेआम! योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में बाक़ायदा ऐलान किया कि मई दिवस पर मज़दूरों को कहीं एकत्र नहीं होने दिया जायेगा, इसके लिए पूरे गौतमबुद्ध नगर ज़िला में धारा 163 लगा दी गयी, जो पहले धारा 144 के नाम से जानी जाती थी। इसके तहत कहीं भी 5 से ज्यादा लोगों का एकत्र होना ग़ैर-क़ानूनी माना जाता है। यानी, मज़दूर मई दिवस के अपने अन्तरराष्ट्रीय त्योहार को न मना सकें, इसका पूरा इन्तज़ाम योगी सरकार ने किया। इस पर न तो देश की किसी अन्य पूँजीवादी पार्टी ने कुछ कहा, न किसी न्यायालय ने इस बात का संज्ञान लिया और न ही केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने इसका कोई प्रभावी विरोध किया। देखा जाय तो ऐसे प्रतिबन्ध की क्या संवैधानिकता है? क्या मज़दूरों को मई दिवस मनाने का अधिकार नहीं है? क्या इसमें कुछ भी ग़ैर-क़ानूनी है? वैसे तो भीख-समान वेतन बढ़ोत्तरी कर योगी सरकार यह दावा कर रही थी कि अब समस्त मज़दूर उसके साथ हैं! तो फिर उसे मई दिवस पर मज़दूरों से इतना डर क्यों था?

मई दिवस 1886 में शिकागो में आठ घण्टे के कार्यदिवस के लिए किये गये आन्दोलन और उसके शहीदों को याद करने के लिए पूरी दुनिया में मज़दूरों और मेहनतकशों द्वारा मनाया जाता है। कई देशों में यह छुट्टी का दिन होता है। आज जब भारत और दुनिया के अन्य कई देशों में विशेष तौर पर अनौपचारिक व असंगठित मज़दूरों से आठ घण्टे के कार्यदिवस का अधिकार प्रभावत: छीन लिया गया है, जब महँगाई दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ोत्तरी कर रही है जबकि मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी घटती जा रही है, जब ओवरटाइम करना वास्तव में मज़दूर के लिए स्वेच्छा का मसला नहीं रह गया है बल्कि मजबूरी बन गया है, तब विशेष तौर पर मई दिवस की विरासत और स्मृति को धूल और राख की चादर के नीचे दबा देना शासक वर्गों के लिए ज़रूरी हो गया है। आज जब मज़दूर वर्षों पीठ झुकाकर चुप्पी के साथ गुलामी करने के बाद अपना धैर्य खो रहा है और अपनी जायज़ क़ानूनी माँगों के लिए देश भर में जगह-जगह सड़कों पर उतर रहा है, हड़तालें कर रहा है, तो यह लाज़िम है कि मई दिवस का ख़ौफ़ हुक़्मरानों के दिलो-दिमाग़ को सता रहा है।

हमारा देश और पूरी दुनिया में समस्त पूँजीवादी देश पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े की अन्तहीन हवस के कारण ही पैदा होने वाली मन्दी की चपेट में हैं। वास्तव में, वे लम्बे समय से इस आर्थिक संकट के भँवर में फँसे हुए हैं। हम मज़दूरों-मेहनतकशों को याद रखना चाहिए कि यह आर्थिक संकट खु़द पूँजीपतियों की आपसी गलाकाटू प्रतिस्पर्द्धा, मुनाफ़े की अन्धी हवस और पूँजीवादी उत्पादन की अराजकता और योजनाविहीनता के कारण ही पैदा होती है, यह कोई बाढ़ या भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा नहीं है, जिससे बचने का कोई रास्ता ही नहीं होता! हाँ, पूँजीवादी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के दायरे के भीतर इससे नहीं बचा जा सकता। लेकिन मन्दी और आर्थिक संकट की क़ीमत भी मालिकों की जमात मज़दूरों और मेहनतकशों से ही वसूलती है। मन्दी का अर्थ होता है छँटनी, तालाबन्दी, बढ़ती बेरोज़गारी, घटती वास्तविक मज़दूरी, मज़दूरों का गिरता जीवन-स्तर और उनकी ज़िन्दगी में अनगिनत दिक्कतें और किल्लतें। हमारा देश और समूची पूँजीवादी दुनिया में ये चीज़ें लगातार घटित हो रही थीं और मज़दूरों-मेहनतकशों का जीवन-स्तर, औसत आय और कार्य-स्थितियों के हालात लगातार ख़राब हो रहे थे।

ऊपर से साम्राज्यवादी अमेरिका और ज़ायनवादी इज़रायली सेटलर राज्य द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के कारण गैस और तेल की क़ीमतों का जो संकट पैदा हुआ है, और इस पूरे मसले पर भारत की फ़ासीवादी मोदी सरकार ने जो मूर्खतापूर्ण विदेश नीति अपनायी है, उनके कारण भी हमारे देश में रसोई गैस की किल्लत, बढ़ती क़ीमतों और कालाबाज़ारी से देश की आम मेहनतकश जनता के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल हो गया है। तेल की क़ीमतों में अब वृद्धि की घोषणा मोदी सरकार कर चुकी है और आगे भी धड़ाधड़ करेगी, जिसे केवल पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के कारण इसने रोक रखा था। इसका नतीजा यह होगा कि महँगाई में और भी भयंकर बढ़ोत्तरी होगी। यानी, मज़दूरों और मेहनतकशों के जीवन की हालात और भी बदतर होंगे।

ये बदतर होते जीवन के हालात ही थे जिनसे तंग आकर हमारे देश के मज़दूर बरौनी से पानीपत तक, सूरत से मानेसर तक और भरूच से नोएडा तक सड़कों पर उतरने और हड़ताल करने को मजबूर हुए। बरसों से कमरतोड़ मेहनत, 12-14 घण्टे काम, रोज़-रोज़ प्रबन्धन व मालिकान की ओर से गाली-गलौच और ज़िल्लत, डबल रेट से ओवरटाइम के भुगतान से इंकार, सातों दिन काम के लिए मजबूर किये जाने, और अन्य श्रम अधिकारों से वंचित किये जाने के बाद मज़दूरों की सहनशक्ति जवाब दे चुकी थी। 4-5 हज़ार रुपये कमरे का किराया, 4-4 हज़ार रुपये का रसोई गैस सिलेण्डर और खाने-पीने की बेतहाशा महँगी हो रही वस्तुओं के कारण मज़दूरों के परिवारों के लिए एक इंसानी जीवन जी पाना भी मुश्किल हो गया था। इसी का यह नतीजा था कि देश के विविध हिस्सों में मज़दूरों के स्वत:स्फूर्त संघर्ष और हड़तालें फूट पड़ीं।

 फ़ासिस्ट भाजपाइयों की सभी राज्य सरकारें किसी साज़िश, पाकिस्तानी षड्यन्त्र, नक्सली चाल वगैरह की कहानियाँ गढ़कर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन इसमें उनको तनिक भी सफलता हासिल नहीं हो पायी। क्योंकि आम जनता भी जानती है कि मज़दूरों-मेहनतकशों के जीवन के हालात क्या हैं। वह भी इन तकलीफ़ों को रोज़ झेल रही है। वह भी फ़ालतू के धार्मिक व साम्प्रदायिक झगड़ों से बुरी तरह से ऊब चुकी है और अपने जीवन के बुनियादी सवालों, यानी रोटी, कपड़ा और मकान और एक इज्जत भरी इंसानी ज़िन्दगी के सवाल का हल चाहती है। भाजपा समूची सरकारी मशीनरी, चुनाव आयोग, ईडी, केन्द्रीय बलों, पुलिस व नौकरशाही पर आन्तरिक कब्ज़े के बूते चाहे जितने भी चुनाव जीत ले, इससे सच्चाई पर कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है और सच्चाई यह है कि जनता अपने गिरते जीवन स्तर, औसत आय, महँगाई, बेरोज़गारी, महँगे होते दवा-इलाज व शिक्षा से आजिज़ आती जा रही है। उसके गुस्से का ज्वालामुखी सतह के नीचे सुलग रहा है। यही वह बात है जो शासक वर्गों को सता और डरा रही है।

जब नोएडा में मज़दूरों का संघर्ष शुरू हुआ तब योगी सरकार के “खुशहाल उत्तर प्रदेश”, “सुखी कार्मिक”, “विकास के पथ पर अग्रसर प्रदेश”, वगैरह के सारे दावे ध्वस्त हो गये। ऊपर से अभी कुछ समय पहले ही जिन पूँजीपतियों से योगी आदित्यनाथ ने वायदा किया था कि उत्तर प्रदेश में उन्हें मज़दूरों की हड़ताल व आन्दोलन से पूर्ण मुक्ति मिलेगी, वहाँ वे 10-12 हज़ार में मज़दूरों को बेतरह खटा सकते हैं, और मज़दूरों को ज़रा भी चूँ-चपड़ नहीं करने दी जायेगी, आदि, उन पूँजीपतियों ने भी योगी सरकार पर त्यौरियाँ चढ़ा लीं।

यही तो वजह है कि योगी सरकार ने ख़ुद उत्तर प्रदेश पुलिस का निर्देशन किया कि वह नोएडा में मज़दूर आन्दोलन को किसी भी तरीक़े से कुचले, वहाँ एक आतंक का राज्य क़ायम करे ताकि मज़दूर हमेशा के लिए शान्त हो जाएँ। सारे हुक़्मरानों को हमेशा यही मुग़ालता होता है कि वह दमन के बूते जनता को हमेशा के लिए गु़लामी के लिए तैयार कर सकता है। योगी आदित्यनाथ कोई अलग नहीं हैं।

एक भद्दे मज़ाक के तौर पर एक मामूली वेतन बढ़ोत्तरी की घोषणा योगी आदित्यनाथ सरकार ने की, मज़दूरों के लिए कुछ हेल्पलाइन वगैरह चालू करने की नौटंकी भी की गयी। साथ में, पुलिस की डी.सी.पी. (इण्डस्ट्री) नामक एक नयी पोस्ट बनायी गयी है जोकि किसी भी तरह से संविधान-सम्मत नहीं है क्योंकि श्रम विवादों में यह सीधे पुलिस को हस्तक्षेप करने का मौक़ा देती है। इन क़दमों के आधार पर योगी सरकार मज़दूरों को शान्त करना चाहती है कि वे अपनी ज़िन्दगी के भयंकर हालात को स्वीकार कर लें और उन पर सन्तोष कर लें। लेकिन इसके बावजूद सरकार को यह डर है कि मज़दूर कहीं फिर से हड़ताल पर न चले जाएँ और उसे डर था कि मई दिवस और उसके समारोह व आयोजन इसका कारण बन सकते हैं। नतीजतन, योगी सरकार ने 30 अप्रैल से 8 मई तक पूरे ज़िले में ही धारा 163 लागू कर दी जिससे कि मई दिवस का कोई कार्यक्रम मज़दूर कर ही न सकें। इसके बावजूद, नोएडा की लुक्सर जेल में नोएडा मज़दूर आन्दोलन के बन्द मज़दूर कार्यकर्ताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने वहाँ बन्द अन्य मज़दूरों व मेहनतकशों के साथ मई दिवस मनाया, क्रान्तिकारी गीत प्रस्तुत किये और मई दिवस के शहीदों और उसकी विरासत को याद किया।

वैसे इस प्रकार का सरकारी आदेश ही किस क़ानून या संविधान की किस धारा के तहत जायज़ ठहराया जा सकता है कि मज़दूर मई दिवस के कार्यक्रम व आयोजन न करें? संविधान देश के सभी नागरिकों को यह अधिकार देता है कि वे शान्तिपूर्ण तरीक़े से एकत्र हों, अपने संगठन बनाएँ और अपने विचारों को अभिव्यक्त करें और मज़दूर भी इस देश के बराबर हक़ रखने वाले नागरिक हैं। क़ानून व संविधान की किताबों में तो यही लिखा है। लेकिन एक पूँजीवादी समाज में वास्तव में जैसे-जैसे हम सामाजिक वर्गों के पदानुक्रम में नीचे की ओर जाते हैं, वैसे-वैसे ग़रीब मेहनतकश आबादी यानी निम्न-मध्यवर्ग, अर्द्धसर्वहारा आबादी, ग़रीब किसान आबादी और मज़दूर-मेहनतकश आबादी के लिए ये औपचारिक अधिकार महज़ किताबी और काग़ज़ी बनकर रह जाते हैं और पूँजीपति वर्ग की सरकारें नग्न रूप में उन पर अपनी तानाशाही चलाती हैं। गौतमबुद्धनगर में मई दिवस पर लगी रोक वास्तव में इसी बात को सच साबित करती है।

 

मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026