रायपुर में सेप्टिक टैंक में उतरे 3 सफाईकर्मियों की मौत – ज़िम्मेदार है मुनाफाखोर व्यवस्था

अजय

18 मार्च। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक अस्पताल के सेप्टिक टैंक (सीवरेज) की सफाई के दौरान तीन सफाईकर्मियों की ज़हरीली गैस और दम घुटने से मौत हो गयी। परिजनों के अनुसार एक ठेकेदार के माध्यम से रामकृष्ण केयर अस्पताल में गटर और टैंक साफ करने के लिए मज़दूरों को बुलाया गया था। अस्पताल के पीछे स्थित इस सीवरेज टैंक में उतरते ही ज़हरीली गैस के कारण एक-एक कर तीनों मजदूरों की मौत हो गयी।

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मृतकों के नाम गोविंद सेंद्रे, अनमोल मचकन और प्रशांत कुमार बताये जा रहे हैं। इस दर्दनाक घटना के बाद आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने मज़दूरों की मौत को छिपाने की कोशिश की, ताकि मुआवज़े और कानूनी कार्रवाई से बचा जा सके। परिजनों के विरोध और हंगामे के बाद मामला सामने आया। परिवार के सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया कि मृतकों के शवों को एक वैन में डालकर जल्दबाज़ी में हटाया गया।

असल में रायपुर की यह घटना कोई अपवाद नहीं, बल्कि देशभर में सफाईकर्मियों के साथ होने वाली रोज़मर्रा की त्रासदी का हिस्सा है। हम अपने आसपास रोज़ ऐसे मज़दूरों को देखते हैं जो गन्दगी से भरे सीवर और मैनहोल में बिना किसी सुरक्षा उपकरण के उतरते हैं—वह भी महज़ 250–300 रुपये की दिहाड़ी के लिए।

सरकार द्वारा हाल ही में संसद में पिछले नौ सालों में (2017–2026) सफ़ाईकर्मियों की केवल 622 मौतों का आंकड़ा पेश किया गया है, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होने की संभावना है। सरकारें अपने मज़दूर-विरोधी चेहरे को छिपाने के लिए इन आंकड़ों को कम करके दिखाती हैं। इन मौतों को अक्सर ‘हादसा’ बताकर ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाता है, जबकि यह दरअसल सुनियोजित जानलेवा लापरवाही का परिणाम है।

दूसरा, सफाईकर्मियों की मौत केवल दुर्घटनाओं तक सीमित नहीं है। पेशागत बीमारियों से होने वाली मौतें भी बड़ी संख्या में होती हैं, जो सरकारी आंकड़ों में दर्ज ही नहीं होतीं। कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड और मिथेन जैसी ज़हरीली गैसों के लगातार सम्पर्क में रहने के कारण ये मज़दूर गम्भीर श्वसन रोगों और अन्य बीमारियों का शिकार होते हैं। अकेले मध्य प्रदेश में, जहाँ के कई शहर साफ-सफाई के मामले में अव्वल आते हैं, हर साल 60 हज़ार से अधिक मज़दूर अपनी कामकाजी उम्र में ही दम तोड़ देते हैं।

 आज देश में लाखों सफाई कर्मचारी कच्चे कर्मचारी के तौर पर अथवा ठेका कम्पनियों के गुलामों के तौर पर खट रहे हैं जिन्हें महज़ 8-10 हज़ार रुपये माहवार वेतन के लिए अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है! सफाई कर्मचारियों का बहुलांश दलित जातियों से आता है। खुद सरकारी आँकड़ों के मुताबिक सफाई कर्मचारियों का तकरीबन 95 प्रतिशत हिस्सा दलित जातियों से आता है! मरने वाले चूँकि समाज के सबसे निचले पायदान पर होते हैं इसलिए सत्ता में बैठे लोगों के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती! लोग मरते रहते हैं और सरकारी नौटंकियाँ चलती रहती हैं। क्या सफाई कर्मचारी की जान की कोई कीमत नहीं है? क्या सफाई कर्मचारी के काम की अहमियत किसी से भी कम है? क्यों सफाईकर्मियों को पर्याप्त सुरक्षा के साधन उपलब्ध नहीं होते? क्या सरकारों को चला रहे स्वघोषित तारणहार अपने सगे सम्बन्धियों या खुद इन हालात में काम करना पसन्द करेंगे? वैसे तो वर्तमान दौर में विज्ञान और तकनोलॉजी ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है कि सफाईकर्मियों के  शारीरिक श्रम से होने वाले ज़्यादातर काम मशीनों की मदद से हो सकते हैं। लेकिन पूँजीवाद ठहरा आख़िर पूँजीवाद! लागत कम करने के नाम पर और इस प्रकार के कामों में पूँजी निवेश न करने की वजह से इक्कीसवीं सदी में भारत जैसे देश में मज़दूरों से वे काम लिए जा रहे हैं जो किसी भी गरिमामय व्यक्ति को नागवार गुज़रेंगे! उसके ऊपर हमारे देश में जाति व्यवस्था का अस्तित्व ऐसे तमाम कामों को कुछ जातियों के लिए “आरक्षित” करके रख देता है जिस स्थिति का भरपूर फायदा पूँजीवादी व्यवस्था उठाती है।

यूँ तो मोदी जी नौटंकी करने के लिए सफ़ाईकर्मियों के चरण धोने का काम करते हैं, ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तमाशों में तमाम खाये-पिये-अघाये-मुटियाये भाजपाई हाथों में झाड़ू उठाकर ढोंग करते हुए फोटो खिंचवा लेते हैं, लेकिन इस नौटंकी से आगे असलियत में सफ़ाईकर्मियों के बदतर हालात की किसी को कोई फ़िक्र नहीं है। वहीं सरकार में बैठे खुद को दलितों का “मसीहा” कहने वाले रामदास आठवले, अर्जुन राम मेघवाल जैसे अवसरवादी और हद दर्जे के पतित नेता भी इन असल मुद्दों पर चुप्पी मारे बैठे रहेंगे और एकाध मौक़े पर घड़ियाली आँसू बहाने का काम करेंगे। इन धोखेबाज़ नेताओं से वैसे भी कोई उम्मीद पालना बेमानी है!

ऐसा नहीं है कि सफाईकर्मियों की सुरक्षा के लिए देश में कानून नहीं बने हैं, लेकिन वे केवल कागजों तक सीमित हैं। 1993 और 2013 के कानूनों के तहत मैनुअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध है। किसी भी व्यक्ति को सीवर में बिना सुरक्षा के उतारना गैरकानूनी है। यदि विशेष परिस्थिति में उतरना पड़े तो सुरक्षा उपकरण, इंजीनियर की अनुमति और एंबुलेंस जैसी व्यवस्थाएँ अनिवार्य हैं। लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। तकनीकी प्रगति के इस दौर में भी सफाईकर्मियों को बिना सुरक्षा के सीवर में उतरने के लिए मजबूर किया जा रहा है—यह बेहद शर्मनाक है और इस आदमखोर-मुनाफाखोर व्यवस्था के मुँह पर तमाचा है! असल में इस मुनाफाखोर व्यवस्था में ऐसे सभी नियम-कानूनों का ठेकेदार और मालिक तकिया बनाकर सोते हैं!

इन अमानवीय हालात को बदलने के लिए देश की व्यापक जनता को भी सफाईकर्मियों की सुनियोजित हत्याओं पर सरकारों को घेरना चाहिए और इनके अधिकारों के लिए सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए। हम सफाईकर्मियों से भी अपील करते हैं कि बिना सुरक्षा के इन्तज़ाम के किसी भी हालत में नाले, सीवर या सेप्टिक टैंक में न उतरें। रायपुर में हुए इस जघन्य हादसे का हम कड़ा प्रतिवाद करते हैं और सरकार से माँग करते हैं :-

तीनों सफाईकर्मियों की मौत के लिए ज़िम्मेदार ठेकेदार और अस्पताल प्रबंधन पर सख्त कार्रवाई की जाये और इनके टेण्डर रद्द किये जाएँ।

सफाई कार्य का पूर्ण मशीनीकरण किया जाये और हाथ से सफाई पर तत्काल प्रतिबंध लागू किया जाए।

सभी सफाईकर्मियों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और उचित वर्दी उपलब्ध करायी जाए।

मृतकों के परिवारों को उचित मुआवज़ा और प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए।

सभी सफाईकर्मियों को स्थायी (पक्का) किया जाए और ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के बजट का बड़ा हिस्सा उनके हालात सुधारने में लगाया जाए।

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2026