नागपुर कारख़ाने में विस्फोट से 20 मज़दूरों की मौत और मीडिया की शर्मनाक चुप्पी
मज़दूरों का जीवन तो मीडिया में कहीं दिखता ही नहीं था, अब उनकी मौत भी ‘ख़बर’ नहीं रही
बिगुल डेस्क
पिछले 1 मार्च 2026 को महाराष्ट्र के नागपुर जिले में औद्योगिक विस्फोटक बनाने वाली एसबीएल एनर्जी लिमिटेड की फ़ैक्ट्री में हुए भीषण धमाके में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई और 23 लोग घायल हुए। इनमें अधिकांश स्त्री मज़दूर थीं। भारी जनाक्रोश के दबाव में पुलिस ने कम्पनी के कुछ अधिकारियों सहित 11 लोगों को गिरफ़्तार किया, जबकि मालिक आलोक चौधरी आराम से “फ़रार” हो गया।
पिछले कुछ सालों में, इस इलाके के कारख़ानों में कई जानलेवा धमाके हुए हैं – दिसम्बर 2023 में सोलर इण्डस्ट्रीज़ में नौ लोग मारे गये, जून 2024 में चामुण्डी एक्सप्लोसिव्स में पाँच, जनवरी 2025 में भण्डारा ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री में नौ मज़दूर मारे गये और सितम्बर 2025 में सोलर इण्डस्ट्रीज़ में एक और धमाका हुआ जिसमें एक वर्कर की मौत हो गयी और 30 घायल हो गये।
भण्डारा ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री में, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सुरक्षा उपाय लागू करने में नाकामी का हवाला देते हुए आपराधिक कार्रवाई का आदेश दिया था। कई संगठनों ने आरोप लगाया कि सुरक्षा उपाय लागू करने और सुरक्षा ऑडिट में ढिलाई के बारे में बार-बार दी गई चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया गया। ये घटनाएँ नागपुर औद्योगिक पट्टी में मज़दूरों के प्रति जानलेवा लापरवाही और व्यवस्था की गम्भीर खामियों की ओर इशारा करती हैं। इससे पहले भी यहाँ ऐसे हादसे होते रहे हैं।
हम यहाँ एक और बेहद ख़तरनाक चीज़ की ओर ‘मज़दूर बिगुल’ के पाठकों का ध्यान खींचना चाहते हैं। वह है, इतनी बड़ी घटना के प्रति देश के पूँजीवादी मीडिया का रवैया!
ज़्यादातर टीवी न्यूज़ चैनलों ने इसे या तो कवर ही नहीं किया या बस ख़बर की पट्टी चला दी। ख़बरों की सच्चाई की जाँच करने वाली संस्था ‘ऐल्ट न्यूज़’ की जाँच में पता चला कि रिपब्लिक वर्ल्ड, एनडीटीवी, टाइम्स नाउ, इंडिया टुडे और सीएनएन-न्यूज़18 ने 1 से 3 मार्च के बीच इस हादसे पर अपने यूट्यूब या एक्स प्लेटफॉर्म पर एक भी वीडियो रिपोर्ट साझा नहीं की। जबकि ये चैनल लगातार इनपर अपनी ख़बरें शेयर करते रहते हैं।
ये चैनल इस दौरान मुख्य रूप से ईरान-अमेरिका-इज़रायल युद्ध पर ख़बरें और बहस चलाते रहे। रिपब्लिक टीवी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली और मन्दिर यात्रा का प्रसारण भी किया। पर नागपुर हादसे का कहीं ज़िक्र भी नहीं था। एनडीटीवी ने भी ईरान संकट, ड्रोन तकनीक और वैश्विक हालात पर चर्चा की, लेकिन नागपुर विस्फोट पर कोई वीडियो बुलेटिन नहीं दिखा। इंडिया टुडे और टाइम्स नाउ ने भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति और घरेलू राजनीतिक बयानबाज़ी को प्राथमिकता दी, जबकि नागपुर की घटना उनकी वीडियो कवरेज से ग़ायब रही। सीएनएन-न्यूज़18 ने भी पश्चिम एशिया के तनाव और प्रधानमंत्री की गतिविधियों को प्रमुखता दी, लेकिन 20 मज़दूरों की जान ले लेने वाले इस औद्योगिक हादसे को नजरअन्दाज़ किया।
इस बड़ी औद्योगिक दुर्घटना पर तीन दिनों तक प्रमुख चैनलों की यह चुप्पी क्या बताती है? यह बताती है कि मज़दूरों की ज़िन्दगी इस देश को चलाने वाले लोगों की निगाह में कितनी सस्ती है। मज़दूरों के जीवन की कठिनाइयाँ, उनके संघर्ष तो पहले भी मीडिया में कहीं नज़र नहीं आते थे, अब उनकी मौत भी ‘ख़बर’ नहीं रही।
नागपुर ही नहीं, देशभर में लगातार कारख़ानों में हो रही दुर्घटनाओं में मज़दूरों की मौतें हो रही हैं। हर साल हज़ारों मज़दूर अपनी जान गँवा देते हैं या बुरी तरह घायल होते हैं। इसकी ज़िम्मेदारी पूरी तरह कारख़ाना मालिकों की होती है जो सुरक्षा उपायों पर पैसे और समय ख़र्च करके अपने मुनाफ़े में ज़रा भी कमी नहीं आने देना चाहते। उनके लिए यह फ़ालतू का ख़र्च है क्योंकि मज़दूर का श्रम और उसकी जान सस्ते में उपलब्ध है। उनके टुकड़ों पर पलने वाले सरकारी अफ़सर और नेता भी उन हत्याओं के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जो इस अँधेरगर्दी को देखकर आँखें मूँदे रहते हैं। लेकिन दिनभर टुच्ची और मसालेदार ख़बरें और नफ़रती प्रचार में डूबे टीवी चैनलों के लिए यह रिपोर्ट करने का मसला नहीं है।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













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