संकेई प्रगति इण्डिया कम्पनी (हरियाणा) के हड़ताली मज़दूरों को मिली आंशिक जीत!
मज़दूरों की एकजुटता के आगे झुका कम्पनी प्रबन्धन!
बिगुल संवाददाता
संकेई प्रगति इण्डिया कम्पनी (बिलासपुर, गुड़गाँव) में जारी मज़दूरों की हड़ताल 10 मार्च की रात को यूनियन और प्रबन्धन के बीच हुए समझौते के बाद समाप्त हो गयी। मज़दूरों की एकजुटता के दबाव में संकेई प्रबन्धन को मज़दूरों की कई माँगों को स्वीकार करना पड़ा। ऑटोमोबाइल उद्योग अस्थायी मज़दूर यूनियन (AICWU) के साथी भी हड़ताल के दौरान संकेई के मज़दूरों के साथ शामिल रहे और अन्य यूनियनों के साथ मिलकर हड़ताल को संचालित किया। हड़ताल के दौरान हीरो, सुज़ुकी, शिवम, सत्यम, एआईआईपीएल, बजाज, होण्डा, असायी से लेकर कई कम्पनियों की यूनियनों के साथी मौजूद रहे।
संकेई कम्पनी के मज़दूर 9 मार्च से हड़ताल पर थे। मज़दूरों की प्रमुख माँग थी कि वेतन में बढ़ोत्तरी की जाये, निकाले गये यूनियन सदस्य की बहाली की जाये तथा पुराने कैज़ुअल मज़दूरों को स्थायी किया जाये। पूरे दिन यूनियन और प्रबन्धन की कई बार वार्ताएँ हुईं, जिसमें आख़िरकार प्रबन्धन को मज़दूरों की माँगों को स्वीकार करना पड़ा। समझौते में तय हुआ कि आगामी 3 वर्षों तक स्थायी मज़दूरों के वेतन में वार्षिक 10 हज़ार रुपये व पिछले 6 महीने से कार्यरत कैजुअल मज़दूरों के वेतन में वार्षिक 500 रुपये की बढोत्तरी की जायेगी। दूसरा, प्रबन्धन व यूनियन की वार्ता के माध्यम से हर वर्ष कुछ पुराने कैजुअल मज़दूरों को स्थायी किया जायेगा। तीसरा, निकाले गये यूनियन सदस्य को लेकर कम्पनी प्रबन्धन निष्पक्षता से जाँच करेगा। चौथा, कम्पनी में अच्छा भोजन, साफ़ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया करायी जायेंगी। पाँचवा, कम्पनी में कार्यरत महिला मज़दूरों के लिए महिला गार्ड की भर्ती की जायेगी।
संकेई प्रगति इण्डिया लिमिटेड जापान की कम्पनी है। इनके द्वारा मारुति, सुज़ुकी, होण्डा आदि कम्पनियों की गाड़ियों के ब्राण्ड लोगो बनाये जाते हैं। यहाँ 44 स्थायी व 408 कैज़ुअल मज़दूर काम करते हैं, जिसमें 50-60 महिलाएँ भी हैं। पिछले 10-15 वर्षों से कार्यरत स्थायी मज़दूरों का वेतन महज़ 18 हज़ार ही है। लम्बे समय से मज़दूरों के वेतन में बढ़ोत्तरी नहीं की गयी थी। वहीं कैज़ुअल मज़दूरों को भी 9-12 हज़ार तक ही वेतन मिलता है और वह भी समय पर नहीं दिया जाता। इसलिए कैज़ुअल मज़दूरों को मजबूरन अतिरिक्त 8 घण्टे ओवरटाइम यानी लागातार 16 घण्टे काम करना पड़ता है और तेज़ी के समय कम्पनी द्वारा भी जबरन ओवरटाइम के लिए रोका जाता है। साथ ही कम्पनी द्वारा प्रोडक्शन को बढ़ाने के लिए भी दबाव बनाया जाता है और एक मज़दूर से कई मशीनों पर काम लिया जाता है। एक दिन भी छुट्टी करने पर काम से निकाल दिया जाता है। महिला मज़दूरों के शौचालय तक साफ़ नहीं किये जाते। कम्पनी में बेहतर भोजन, दवाई जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं। इसकी शिक़ायतें मज़दूरों ने कई बार मैनेजमेंट से की, पर प्रबन्धन ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया। प्रबन्धन के इस अड़ियल रवैये से मज़दूर लम्बे समय से परेशान थे। 9 मार्च की दोपहर में मज़दूरों को बेहद घटिया खाना लंच में दिया गया। तब प्रबन्धन के ख़िलाफ़ मज़दूरों का गुस्सा फूट पड़ा और काम ठप्प कर, कम्पनी के अन्दर ही मज़दूर हड़ताल पर बैठ गये। हड़ताल के दौरान तैयार माल की गाड़ियों से लेकर मैनेजमेंट के लोगों तक को कम्पनी से बाहर नहीं जाने दिया गया। प्रबन्धन ने धमकी भरा नोटिस लगाकर व पुलिस की मदद लेकर मज़दूरों को ड़राने की कोशिश की, पर अन्त तक मज़दूर अपनी माँगों को लेकर डटे रहे।
संकेई के मज़दूरों द्वारा हासिल की गयी इस छोटी-सी जीत ने यह दिखा दिया है कि अगर कम्पनी में स्थायी व अस्थायी मज़दूरों की एकता मज़बूत हो तो प्रबन्धन को एक हद तक झुकाया जा सकता है। आगे भी संकेई के मज़दूर साथियों को स्थायी-अस्थायी मज़दूरों की एकता को बरक़रार रखना होगा, तभी हड़ताल में हुए समझौते को लागू करवाया जा सकता है।
संकेई के मज़दूरों की हड़ताल को अन्य कम्पनियों की यूनियनों की भागीदारी के बिना जीतना बेहद मुश्किल होता। तमाम यूनियनों के साथियों ने हड़ताल को सफल बनाने में भी पूरी मदद की। यह दर्शाता है कि आज के दौर में मज़दूरों के हर संघर्ष को तभी जीता जा सकता है, जब अपनी एकता को सिर्फ़ कम्पनी तक सीमित न रखते हुए, उसे व्यापक बनाया जाये। हम उम्मीद करते हैं कि आगे भी सभी कम्पनियों की यूनियन के साथी हर संघर्ष में भागीदारी करेंगे और अपनी कम्पनियों में भी स्थायी-अस्थायी मज़दूरों की एकता को मज़बूत बनायेंगे ताकि ज़रूरत पड़ने पर हर कम्पनी के मज़दूर एक साथ आ सकें। इसके साथ ही आज के वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत आटोमोबाइल उद्योग की एक ताक़तवर इलाक़ाई-सेक्टरगत यूनियन का निर्माण करना भी है जिसके ज़रिये अस्थायी व स्थायी दोनों तरह के मज़दूरों की फ़ौलादी एकता वास्तविकता में क़ायम की जा सके। अतीत के संघर्षों से अगर हम कोई सबक़ ले सकते हैं तो वह यही है कि ऐसी यूनियन के बग़ैर आज पूँजी व राज्यसत्ता की ताक़त को हरा पाना बेहद मुश्किल है। स्पष्ट है कि ऐसी सेक्टरगत यूनियन फ़ैक्ट्री-आधारित यूनियनों की जगह नहीं लेगी बल्कि फ़ैक्ट्री-आधारित संघर्षों को भी संवेग प्रदान करने का काम करेगी। ऑटोमोबाइल उद्योग अस्थायी मज़दूर यूनियन (AICWU) इसी कार्यभार को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। आज के दौर में इस काम को हम जितनी जल्दी पूरा कर पायेंगे, उतनी जल्दी हम अपने संघर्षों की जीत को सुनिश्चित कर पायेंगे।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2026













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