इस देश की आबादी के सबसे बड़े, मगर सबसे अदृश्य हिस्से, औद्योगिक मज़दूर वर्ग में सरगर्मी तेज़ी से बढ़ रही है! क्या आप इससे वाकिफ़ हैं?
पिछली फ़रवरी से मार्च के बीच देश के अलग-अलग राज्यों में NTPC जैसे सार्वजनिक क्षेत्र और अडाणी, रिलायंस और टाटा जैसी निजी कम्पनियों के बिजली संयंत्रों, खदानों और सीमेंट कारख़ाने में मज़दूरों की बड़ी और उग्र हड़तालें हुईं। और अब इस महीने की शुरुआत से दिल्ली से लगे गुड़गाँव, मानेसर, धारूहेड़ा, बिनौला और बावल तक फैली विशाल औद्योगिक पट्टी में एक के बाद एक कारख़ाने में मज़दूर हड़ताल कर रहे हैं। हड़तालों की यह लहर नोएडा और फ़रीदाबाद के औद्योगिक इलाक़ों में भी पहुँच गई है।
गुड़गाँव क्षेत्र में होंडा, मुंजाल शोवा, रीको, सत्यम, रूप पॉलीमर्स, ऋचा गारमेंट्स, मॉडलमा, फ़ैशन इंडिया, औमोवियो, प्रीकॉल, ज्योति ऐपरल्स, नोएडा में ऋचा ग्लोबल, फ़रीदाबाद में भारत गियर आदि एक दर्जन से ज़्यादा फ़ैक्टरियों के 50,000 से ज़्य़ादा मज़दूर हड़ताल पर हैं और हर दिन यह लहर जंगल की आग की तरह फैलती जा रही है।
बेहद कठिन काम के हालात, बहुत कम वेतन, दुर्घटनाओं और अपमानजनक व्यवहार को लेकर मज़दूरों में लगातार आक्रोश सुलगता रहा है। पिछले एक महीने से गैस की किल्लत और बेतहाशा महँगाई ने उनकी सहनशक्ति की सीमा पार कर दी। सरकार ने एक अप्रैल से लागू होने वाले चार लेबर कोड को लेकर जो झूठे सपने दिखाए थे, उनकी असलियत सामने आने से भी बहुत-से मज़दूरों में ग़ुस्सा है।
यहाँ ऑटोमोबाइल, गारमेंट्स और अन्य उद्योगों के सैकड़ों बड़े और मझोले कारख़ानों में लगभग 20 लाख मज़दूर काम करते हैं, जिनमें से 90 फ़ीसदी से ज़्यादा कॉण्ट्रैक्ट, कैज़ुअल या दिहाड़ी पर हैं। मज़दूरों की माँगें बिल्कुल वाजिब और न्यायसंगत हैं – सम्मानजनक ढंग से जीने लायक़ वेतन, बेहतर और सुरक्षित कार्य-स्थितियाँ और ठेका प्रथा का अन्त।
गैस की कालाबाज़ारी और बढ़ती महँगाई के कारण मज़दूर इलाक़ों में सब्ज़ियों और खाने-पीने की चीज़ों और रोज़मर्रा के सामानों की कीमतें तेज़ी से बढ़ रही हैं। ढाबों पर जो खाने की थाली पहले 60 रुपये में मिलती थी, वह अब 100–120 रुपये तक पहुँच गई है। लगभग 100 रुपये प्रति किलो मिलने वाली गैस अब 300-400 रुपये तक पहुँच गई है।
ज़्यादातर कारख़ानों में ठेका मज़दूरों को महीने के महज़ 10–11 हज़ार रुपये मिलते हैं, जिससे गुड़गाँव जैसे महँगे शहर में गुज़ारा करना सम्भव नहीं है। मजबूरन उन्हें ओवरटाइम करके 12-13 घण्टे रोज़ खटना पड़ता है लेकिन कहीं भी डबल रेट से ओवरटाइम के पैसे नहीं मिलते। बहुत से मज़दूर हफ़्ते के सातों दिन बिना छुट्टी के काम करते हैं।
सुरक्षा के उचित इन्तज़ाम नहीं होने और सुरक्षित मानकों से ज़्यादा स्पीड पर काम कराये जाने के कारण आये दिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं, लेकिन न तो घायल मज़दूरों का ठीक से इलाज होता है और न ही उन्हें सही मुआवज़ा मिलता है। कई बार जो मज़दूर दुर्घटना के कारण काम करने लायक़ नहीं रह जाता उसे नाममात्र के पैसे देकर बाहर कर दिया जाता है। ऊपर से ठेकेदारों और सुपरवाइज़रों की गालियाँ और अपमानजनक व्यवहार। यहाँ काम करने वाली हज़ारों स्त्री मज़दूरों को और भी ज़्यादा अपमान झेलना पड़ता है।
मज़दूरों के आन्दोलन से घबरायी हरियाणा की नायब सिंह सैनी सरकार इसका बर्बर दमन कर रही है। कई फ़ैक्टरियों के बाहर लाठीचार्ज किया गया है, कई मज़दूरों के सिर फोड़ दिये गये हैं और कई लोगों को डिटेन किया गया है। स्त्री मज़दूरों को भी दौड़ाकर पीटा गया है। फिर भी मज़दूर एकजुट हैं और डटे हुए हैं।
लगातार फैलती हड़तालों के दबाव में नायब सिंह सैनी सरकार ने 8 अप्रैल को मज़दूरी बढ़ाने की घोषणा भी की लेकिन मज़दूर इसे बिल्कुल नाकाफ़ी मान रहे हैं। अकुशल मज़दूरों का वेतन 11,257 रुपये से बढ़ाकर 15,220 रुपये, अर्धकुशल मज़दूरों के लिए 12,430 से बढ़ाकर 16,780 रुपये और कुशल मज़दूरों का वेतन 13,704 से बढ़ाकर 18,500 रुपये घोषित किया गया है। मज़दूर इसे बढ़ाकर 20 से 30 हज़ार प्रतिमाह करने की माँग कर रहे हैं।
इलाक़े के क़रीब 20 लाख मज़दूरों में 80 प्रतिशत से भी ज़्यादा मज़दूर बिल्कुल युवा हैं। इनमें ज़्यादातर प्रवासी हैं लेकिन स्थानीय भी हैं। बड़ी संख्या में स्त्री मज़दूर भी हैं, ख़ासकर गारमेंट फ़ैक्टरियों में, और वे भी पूरे जोश और सक्रियता के साथ हड़तालों में शामिल हैं।
ग़ौरतलब है कि इस समय हड़ताल कर रहे ये मज़दूर असंगठित हैं, यानी उनकी कोई यूनियन नहीं है। दरअसल यूनियन बनाने का अधिकार भी लम्बे समय से संघर्ष का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। मुश्किल से 7-8 प्रतिशत मज़दूर ही यूनियनों में संगठित हैं, जिन्हें कुछ बेहतर वेतन और सुविधाएँ मिल जाती हैं। हालाँकि उनका शोषण और उत्पीड़न भी बढ़ रहा है।
‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ जैसे संगठन उनके संघर्ष में साथ दे रहे हैं और उनकी बात को ज़्य़ादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाने में मदद कर रहे हैं। मज़दूर ख़ुद आपसी एकजुटता बनाने और अपने हालात के बारे में साथी मज़दूरों को बताने के लिए सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। कई ऐसे मज़दूर हैं, जिनके इंस्टाग्राम वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच रहे हैं।
बिगुल मज़दूर दस्ता इस बात को भी रख रहा है कि गुड़गाँव, दिल्ली, फ़रीदाबाद सहित पूरे एनसीआर के मज़दूरों का एक साझा माँग-पत्र तैयार किया जाये और एक संयुक्त संघर्ष समिति या तालमेल कमेटी बनाकर इस आन्दोलन को साझा ढंग से आगे बढ़ाया जाये।
















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