मालिकों के मुनाफ़े की हवस ले रही मज़दूरों की जान!
भारत
पिछले कुछ दिनों के दौरान देश में कई कारख़ानों में जानलेवा औद्योगिक हादसे हुए हैं। इन हादसों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि इस मुनाफ़ाखोर व्यवस्था के लिए मज़दूरों की जान की क़ीमत क्या हो सकती है। आइए ऐसे कुछ प्रातिनिधिक हादसों के आँकड़े देखें:
- 26 जनवरी को कोलकाता के आनन्दपुर इलाके में वाउ मोमो और पुष्पांजलि डेकोरेटर्स के गोदामों में आग लग गयी। इसमें कुल 27 मज़दूरों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है। 25 अन्य मज़दूर अभी तक लापता हैं।
- 16 फ़रवरी (2026) को भिवाड़ी के खुशखेड़ा-करौली औद्योगिक क्षेत्र (राजस्थान) की एक अवैध पटाखा फैक्ट्री में भयंकर हादसा हुआ। घटना के समय क़रीब 25 मज़दूर काम कर रहे थे, जिनमें 9 मज़दूरों के ज़िन्दा जल जाने और 4 मज़दूरों के गम्भीर रूप से घायल हो जाने की ख़बर है।
- 16 फ़रवरी को फ़रीदाबाद के मुजेसर औद्योगिक क्षेत्र में एक केमिकल फैक्ट्री में शॉर्ट सर्किट के कारण धमाका हुआ और आग लग गयी। इसमें 42 लोग झुलस गये, जिनमें से 10 की हालत गम्भीर है।
- 16 फ़रवरी को ही छत्तीसगढ़ के राजनन्दगाँव ज़िले के जालबाँधा क्षेत्र में स्थित मोहंदी की जया केमिकल फैक्ट्री में अचानक भीषण आग लग गयी। अभी तक किसी के हताहत होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
यह सब महज़ दुर्घटनाएँ नहीं, बल्कि मालिकों व इस पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा की जाने वाली निर्मम हत्याएँ हैं। आये-दिन जानवरों की तरह कारख़ानों में मज़दूरों को मरने के लिए पूँजीपति मजबूर करते हैं। हर क्षेत्र में मज़दूरों की जान की क़ीमत कीड़े-मकौड़ो से अधिक नहीं है। ज़्यादातर मसलों में दुर्घटना के बाद मालिक मज़दूर को साँठ-गाँठ करके किसी निजी अस्पताल या चिकित्सक के पास ले जाता है, ताकि मामला दर्ज ही न हो! किसी भी क्षेत्र में सबसे ख़तरनाक काम प्रवासी मज़दूरों के हिस्से आता है। प्रवासी, ग़रीब और दलित मज़दूर ही सबसे ज़्यादा अरक्षित होते हैं। उन्हें चोट लगने या मौत होने तक की स्थिति में मालिक पक्ष को बचने में ज़्यादा आसानी होती है। बाक़ी की कसर पूँजी की ताक़त पूरी कर देती है जो पुलिस प्रशासन से लेकर श्रम विभाग तक को मालिकों के पक्ष में काम करने का पूरा इन्तज़ाम कर देती है।
श्रम मन्त्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि बीते पाँच वर्षो में 6500 मज़दूर फैक्ट्री, खदानों, निर्माण कार्य में हुए हादसों में अपनी जान गवाँ चुके हैं। इसमें से 80 प्रतिशत हादसे कारखानों में हुए। 2017-2018 कारखाने में होने वाली मौतों में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2017 और 2020 के बीच, भारत के पंजीकृत कारखानों में दुर्घटनाओं के कारण हर दिन औसतन तीन मज़दूरों की मौत हुई और 11 घायल हुए। 2018 और 2020 के बीच कम से कम 3,331 मौतें दर्ज की गयीं। आँकड़ों के मुताबिक, साल 2010 से 2020 के बीच फैक्ट्री अधिनियम, 1948 की धारा 92 (अपराधों के लिए सामान्य दण्ड) और 96ए (ख़तरनाक प्रक्रिया से सम्बन्धित प्रावधानों के उल्लंघन के लिए दण्ड) के तहत 14,710 लोगों को दोषी ठहराया गया, लेकिन आँकड़ों से पता चलता है कि 2018 और 2020 के बीच सिर्फ़ 14 लोगों को फैक्ट्री अधिनियम, 1948 के तहत अपराधों के लिए सज़ा दी गयी। यह आँकड़े सिर्फ़ पंजीकृत फैक्ट्रियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि देश में लगभग 90 फ़ीसदी श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े हैं और अनौपचारिक क्षेत्र में होने वाले हादसों के बारे में कोई पुख़्ता आँकड़े नहीं हैं।
वहीं पंजीकृत कारख़ानों के उपलब्ध DGFASLI (महानिदेशालय, कारख़ाना सलाह सेवा और श्रम संस्थान, जो कि भारत सरकार के श्रम और रोजगार मन्त्रालय के अन्तर्गत काम करने वाला एक प्रमुख संगठन है) डेटा के अनुसार, 2020 में भारत में 363,442 पंजीकृत कारख़ाने थे, जिनमें से 84 फीसदी चालू अवस्था में थे और उनमें तक़रीबन 2 करोड़ कर्मचारी काम कर रहे थे। DGFASLI के आँकड़े बताते हैं कि 2020 तक पहले के चार सालों में हर साल पंजीकृत कारख़ानों में औसतन 1,109 मज़दूरों की मौतें हुईं और 4,000 से ज़्यादा लोगों को चोटें आयीं। देश में कारख़ानों में सबसे अधिक मौतें गुजरात में हुई हैं। चार साल के दौरान फैक्ट्री में होने वाली पाँच में से एक से ज़्यादा मौतें और घायल होने की घटनाएँ गुजरात में हुई हैं। DGFASLI के आँकड़ों के अनुसार, 2019 में गुजरात में कारख़ानों में सबसे अधिक 79 मज़दूरों की मौत हुई और 192 मज़दूर घायल हुए। इसी ‘गुजरात मॉडल’ को भाजपा और मोदी देश भर में लागू करने की बात करते हैं, जो मज़दूरों के लिए क़ब्रगाह है। गुजरात ही वह राज्य है, जहाँ सबसे पहले श्रम क़ानूनों को ख़त्म किया गया था। याद कीजिए इसी ‘गुजरात मॉडल’ का झुनझुना मोदी और भाजपा 2014 में सबको पकड़ा रहे थे।
आख़िर क्यों देश के कारख़ानों में लगातार आग लगती रहती है और मज़दूर मरते रहते हैं? क्यों इसपर कोई कार्रवाई नहीं होती? ज़वाब साफ़ है! आज पूरे देश के कारख़ानों में सुरक्षा के कोई इन्तज़ाम नहीं हैं। मज़दूरों की मौत के ज़िम्मेदार कोई और नहीं बल्कि फैक्टरी मालिक और उनके चन्दे से चलने वाली पूँजीवादी पार्टियों की सरकारें हैं। मालिकों द्वारा हर रोज़ अपने मुनाफ़े की हवस को पूरा करने के लिए मज़दूरों की जान को जोख़िम में डाला जाता है। सस्ते श्रम के तौर पर महिलाओं को काम पर लगाया जाता है और निर्मम परिस्थितियों में काम करा कर मालिक अपना मुनाफ़ा पीटते हैं। इन्हीं मालिकों, पूँजीपतियों के पैसे से तमाम चुनावबाज़ पार्टियाँ चुनाव लड़ती हैं। वे ही इस हत्या, लूट और शोषण को क़ानूनी जामा पहनाते हैं, जिसकी वजह से ये घटनाएँ आम होती जा रहीं हैं। इन मौतों पर मगरमच्छ के आँसू बहाने वाली तमाम पार्टियों के हुक्मरान ही असल में इन घटनाओं को प्रश्रय देते हैं। उनके लिए मज़दूरों की मौत महज़ एक संख्या है। सभी पार्टियों के बहुत से मन्त्री स्वयं कारखाना-मालिक हैं और किसी श्रम क़ानून को लागू नहीं करते, मज़दूरों को कोई सुरक्षा उपकरण नहीं देते हैं। तमाम अवैध कारखानों से लेकर फैक्ट्रियों में सुरक्षा इन्तज़ामों की कमी पर सब चुप्पी साधे रहते हैं! ऐसा क्यों? क्योंकि इनमें से तमाम फैक्ट्री कारखानों के मालिक भाजपा या अन्य किसी पार्टी के नेता या उसके समर्थक ही हैं। इन्हीं पार्टियों के ज़्यादातर नेता-मन्त्री ख़ुद ही कारखाने चलवाते हैं, उन्हें लाइसेंस दिलवाते हैं। देश के 28 करोड़ मज़दूर कारखानों में रोज़ जान हथेली पर रखकर इन मालिकों की तिजोरियाँ भरते हैं।
इतनी खराब स्थिति के पहले से ही मौजूद होने के बावजूद मौजूदा भाजपा सरकार ‘चार लेबर कोड’ लागू कर रही है जो इस स्थिति की भयंकरता को और ज़्यादा भयंकर बना देगा। निश्चित ही जो श्रम क़ानून पहले मौजूद थे वे भी आम तौर पर सिर्फ़ काग़ज़ों की ही शोभा बढ़ा रहे थे। देश के 93 फ़ीसदी असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए ये श्रम क़ानून लागू नहीं होते थे, लेकिन जब कभी भी कहीं मज़दूर अपने क़ानूनी हक़ के लिए संगठित होकर संघर्ष करते थे तो मजबूरन पूँजीपतियों और सरकारों को उसे लागू करवाना पड़ता था। लेकिन अब मोदी-शाह की फ़ासीवादी मज़दूर-विरोधी सरकार पुराने क़ानूनों को भी चार लेबर कोड के ज़रिये ख़त्म कर चुकी है। चार लेबर कोड के ज़रिये कम्पनियों को सुरक्षा के इन्तज़ाम लागू करने से बचने के लिए खुली छूट दी गयी है़।
ओ.एच.एस कोड, 2020 में मज़दूरों की सुरक्षा के साथ और ज़्यादा खिलवाड़ किया गया है। इसमें सुरक्षा समिति बनाये जाने को सरकार के विवेक पर छोड़ दिया गया है, जो पहले कारख़ाना अधिनियम, 1948 के हिसाब से अनिवार्य था। इस पुराने क़ानून में स्पष्ट किया गया था कि मज़दूर अधिकतम कितने रासायनिक और विषैले माहौल में काम कर सकते हैं, जबकि नये कोड में रासायनिक और विषैले पदार्थों की मात्रा का साफ़-साफ़ ज़िक्र करने के बजाय उसे निर्धारित करने का काम राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ दिया गया है। ओएचएस संहिता केवल उन्हीं कारख़ानों में लागू होगी, जहाँ 20 या ज़्यादा मज़दूर काम करते हो (बिजली का प्रयोग हो) या 40 या ज़्यादा मज़दूर जहाँ काम करते हो (बिजली का प्रयोग न हो)। 2017-18 के ऐनुअल सर्वे आफ़ इण्डस्ट्री के अनुसार 47.1 प्रतिशत कारख़ाने ऐसे हैं, जहाँ 20 तक मज़दूर काम करते हैं। 33.8 प्रतिशत कारख़ानों में 20-99 मज़दूर काम करते हैं। इसके अनुसार देखा जाये तो मज़दूरों की बड़ी आबादी इस क़ानून के दायरे से बाहर हो जायेगी। यानी इन नरभक्षी फ़ासीवादियों ने ही संसद में श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने का काम किया है जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं को बिना क़ानूनी पचड़े के अंजाम दिया जा सके।
मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था और इसके ताबेदारों के लिए मज़दूरों की जान की क्या क़ीमत है- यह उपरोक्त विवरणों से साफ़ पता चलता है। हर दिन कई दुर्घटनाएँ होती हैं, ज़्यादातर दबा दी ज़ाती हैं और सामने नहीं आ पाती हैं। जो सामने आ पाती हैं, वे श्रम विभाग के रहमोकरम पर रहती हैं और श्रम विभाग का पट्टा किसके हाथ में है, यह सभी लोग जानते हैं! आज मज़दूरों पर पूँजी की मार बदस्तूर बढ़ती जा रही है। सैकड़ों मज़दूरों की क़ुर्बानियों ने ही आज के मौजूदा श्रम क़ानून दिये थे। भले ही ये क़ानून ज़्यादतर मज़दूर आबादी के लिए काग़ज़ी ही बने रहे, लेकिन तब भी मोदी सरकार द्वारा इन क़ानूनों को ख़त्म करने की साज़िश को हमें समझना होगा। हमें समझना होगा कि ‘एक पर हमला, सबपर हमला’! आज हमारे सामने न केवल श्रम क़ानूनों के अधिकारों को हासिल करने, उन्हें लागू करवाने का सवाल उपस्थित है, बल्कि मुनाफ़ाखोर पूँजीवादी व्यवस्था के ख़ात्मे का सवाल भी हमसे रूबरू है। अगर आज हम संगठित नहीं हुए तो वह दिन दूर नही जब यही मालिक अपने मुनाफ़े के लिए मज़दूरों को क़ानूनन आग की भट्टी में झोंक देंगे और सरकार खुल कर मालिकों का साथ देगी और आने वाली पीढ़ियाँ ‘ग़ुलामी के ज़जीरों’ में बँधकर काम करने के लिए मजबूर होंगी। हमें आज से ही इस मुनाफ़े के मकड़जाल से निकलने के लिए पुरज़ोर आवाज़ उठानी होगी, अपने इलाक़े व सेक्टर के आधार पर यूनियन और संगठन बनाने होंगे। हमारे हालात को बदलने का एकमात्र हथियार हमारी एकजुटता ही है।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2026













