वज़ीरपुर के मज़दूर आन्दोलन को पुन: संगठित करने की चुनौतियाँ
– सनी
22 अगस्त को सी-60/3 फ़ैक्टरी में पॉलिश के कारख़ाने में छत गिरने से एक मज़दूर की मौत हो गयी। सोनू नाम का यह मज़दूर वज़ीरपुर की झुग्गियों में रहता था। मलबे के नीचे दबने के कारण सोनू की तत्काल मौत हो गयी, हादसा होने के बाद फ़ैक्टरी पर पुलिस पहुँची और पोस्टमार्टम के लिए मज़दूर के मृत शरीर को बाबू जगजीवन राम अस्पताल में ले गयी। मुनाफ़े की हवस में पगलाये मालिक की फ़ैक्टरी को जर्जर भवन में चलाने के कारण एक बार फिर एक और मज़दूर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस मौत के लिए केजरीवाल सरकार भी ज़िम्मेदार है जो केवल काग़ज़ों पर श्रम क़ानून लागू करती है। आम आदमी पार्टी (आप) के पार्षद से लेकर विधायकों की फ़ैक्टरियों तक में श्रम क़ानून लागू नहीं होते हैं। वज़ीरपुर के पार्षद विकास गोयल और विधायक राजेश गुप्ता ने आज तक फ़ैक्टरियों में श्रम क़ानूनों को लागू करवाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया। मोदी सरकार श्रम क़ानूनों को इसलिए ही ख़त्म कर रही है ताकि फ़ैक्टरियों में होने वाली इन मौतों की ज़िम्मेदारी से मालिकों को मुक्त किया जा सके।
वज़ीरपुर में सोनू की मौत फ़ैक्टरी में सुरक्षा के अभाव में होने वाली कोई पहली घटना नहीं है। परन्तु कोरोना की दूसरी लहर के बाद वज़ीरपुर में घटित हुई घटनाओं में से यह पहली थी। इस घटना के बाद दलालों ने मज़दूर परिवार को मुआवज़ा दिलाने के लिए घेर लिया। मुआवज़ा मिला भी और साथ में सभी दलालों को और पुलिस प्रशासन को मालिक से अपना हिस्सा भी मिल गया। इस घटना में भी मालिक पर मामूली धाराएँ लगीं और वह थाने से ही छूट गया। दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन द्वारा हस्तक्षेप कर श्रम विभाग का घेराव किया गया परन्तु श्रम विभाग ने ख़ुद को मुआवज़ा दिलाने की प्रक्रिया तक ही सीमित रखा और फ़ैक्टरी की जाँच करने से इन्कार कर दिया। मुआवज़ा दिलवाने की प्रक्रिया में मामले को ज़्यादा तूल न दिया जा सके इसलिए पुलिस ने हर हमेशा की तरह दलालों के ज़रिए सोनू के परिवार को घर वापस भेज दिया।
घटना का अंजाम
पार्षद विकास गोयल ने इस घटना पर केवल अपना फोटो खिंचवाया और यूनियन द्वारा सवाल पूछे जाने पर घटना स्थल से खिसक गये। सच यही है कि वज़ीरपुर से लेकर बवाना में कभी छत गिरने से, कभी आग लगने से और कभी मशीन में फँसकर मज़दूरों की मौत होना आम बात है। हर ऐसी मौत पर प्रशासन मालिकों को बचाता है। वज़ीरपुर की घटना में भी अभी तक मालिक के ख़िलाफ़ कोई सख़्त कार्रवाई नहीं की गयी। केजरीवाल सरकार के विधायक-निगम पार्षद ख़ुद कारख़ाना मालिक हैं, जो अपने कारख़ानों तक में श्रम क़ानून लागू नहीं करते। इसलिए पूरी दिल्ली में मालिकों को मज़दूरों को लूटने की खुली छूट है। श्रम उपायुक्त ने औद्योगिक क्षेत्र का सर्वेक्षण करने से यह कहकर इन्कार कर दिया कि उन्हें केन्द्र सरकार की ओर से निर्देश है कि वह स्वयं फ़ैक्टरी जाँच ना करें। यह फ़ैक्टरी एक्ट 1948 की धारा-9 का उल्लंघन है। यह हाल अभी से ही है जबकि अभी तक श्रम क़ानूनों को हटाने और निष्प्रभावी बनाने के लिए मोदी सरकार द्वारा पास की गयी श्रम संहिताएँ लागू नहीं हुई हैं।
इस घटना के बाद दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन ने तीन दिन सघन प्रचार अभियान चलाये व जुलूस भी निकाला परन्तु मज़दूरों में रोष की भारी कमी थी और एक हताशा का माहौल था, मानो लोगों ने इस प्रकार की घटनाओं को स्वीकार्य मान लिया हो। मज़दूर इन मौतों को अपनी नियति मान बैठे हैं। हालाँकि यह निराशा देश और दिल्ली के मज़दूरों में आम तौर पर मौजूद है परन्तु वज़ीरपुर में इसके ठोस कारण हैं।
2014 में वज़ीरपुर में गरम रोला के सेक्टर की हड़ताल पूरे औद्योगिक क्षेत्र की हड़ताल बन गयी थी। हड़ताल में जीत हासिल हुई परन्तु फ़ैक्टरियों के अन्दर संघर्ष जारी न रख पाने के बाद मज़दूरों द्वारा जीते हुए कुछ हक़ मालिकों ने वापस ले लिये। मज़दूरों की यूनियन के नेतृत्व में तब से लेकर अभी तक मज़दूरों को कई हक़ों को दिलाया गया; परन्तु मज़दूरों के बीच निरन्तर क्रान्तिकारी प्रचार की कमी रही। यह कमी ख़ासतौर पर 2019 से रही। वहीं 2014 के बाद से चीनी स्टील रोल के आयात के कारण स्टील बर्तन उद्योग की गरम, ठण्डा, तपाई, तेज़ाब और कटर शाखाएँ बर्बाद हुई हैं। लॉकडाउन के दो चरणों के बाद 2014 में चल रही पच्चीस गरम रोला मशीन घटकर सात रह गयी हैं। पावरप्रेस और पॉलिश का उद्योग अभी भी बरक़रार है। झुग्गी की गलियाँ और भी सिकुड़ती जा रही हैं। रोशनी यहाँ पहुँच नहीं पाती। मज़दूरों का वेतन और काम की स्थिति भी इन गलियों की तरह सिकुड़ती जा रही है। मज़दूरों में इस कारण एक संशय और डर बना हुआ है जिसका फ़ायदा उठाकर मालिकों ने वेतन कम किया है और काम की स्थिति को और भी दूभर बनाया है। यह वस्तुगत कारण रहा है कि वज़ीरपुर का मज़दूर आन्दोलन गतिरोध का शिकार है। मालिकों की निर्बाध लूट जारी है जिसे मज़दूर अपनी नियति मानकर स्वीकार कर रहे हैं। यह आम तौर पर अधिकांशत: मज़दूर आन्दोलन की ही स्थिति है। परन्तु यह भी सच है कि मज़दूर आन्दोलन की मौजूदा स्थिति के पीछे आत्मगत शक्तियाँ भी ज़िम्मेदार हैं। क्रान्तिकारी राजनीति की ग़ैर-मौजूदगी में मज़दूर वर्ग का जुझारू तेवर छीज जाता है। अगर मज़दूर वर्ग की विचारधारा मौजूद नहीं है तो मज़दूरों में स्वत:स्फूर्त पूँजीपति वर्ग की विचारधारा हावी हो जाती है। यह वज़ीरपुर में भी हुआ है। इलाक़े में 2014 की हड़ताल का दलाल रघुराज फिर से सक्रिय हुआ है। रघुराज के साथ ही एनजीओपन्थी तत्वों का संगठन ‘मज़दूर पहल’ मज़दूरों में राशन व खाना बाँटकर अपनी एनजीओपन्थी राजनीति द्वारा मज़दूरों के क्रान्तिकारी संघर्ष व एकजुटता को कुन्द कर रहा है। रघुराज अब इसे धन्धा बना चुका है। अवसरवादी व एनजीओपन्थी राजनीति के जड़ जमाने के साथ ही मज़दूर वर्गीय हस्तक्षेप कमज़ोर हुआ है। ऐसी राजनीति मज़दूरों को मुफ़्त में राशन बाँटकर व सुविधाएँ देकर सरकार की ज़िम्मेदारी के प्रति मज़दूरों को राजनीतिक तौर पर सोचने ही नहीं देती है। इलाक़े में मज़दूरों के बीच पसरी हुई निराशा में अवसरवाद और मुँहजोई की फफूँद उग आयी है। इसमें एक ग़लती क्रान्तिकारी राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन की लापरवाही की भी है। केवल वेतन-भत्ते की माँग ही नहीं बल्कि मज़दूरों के बीच उनकी रिहायश और उनकी जीवन स्थिति को लेकर भी क्रान्तिकारी राजनीतिक अवस्थिति के साथ मौजूद रहना होता है। इस कार्यभार को पूरा करने में वज़ीरपुर मज़दूर आन्दोलन के नेतृत्व ने निश्चित ही कमज़ोरी दिखायी है। यह सच है कि तकनोलॉजिकल तौर पर पिछड़ा हुआ यह उद्योग एक धीमी मौत मर रहा है क्योंकि देश के भीतर भारतीय पूँजीपतियों द्वारा उन्नत तकनोलॉजी इस्पात व इस्पात संसाधन के समक्ष और साथ ही बेहतर गुणवत्ता के चीनी आयात के सामने वह टिक नहीं पा रहा है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि इसमें काम करने वाले मज़दूर इस उद्योग में नौकरियाँ गँवाते जा रहे हैं और दूसरे सेक्टरों में काम तलाश रहे हैं। यदि मज़दूर आन्दोलन का नेतृत्व इलाक़ाई तौर पर सघन राजनीतिक व विचारधारात्मक प्रचार तथा जनसमुदायों के जीवन व कार्य के मुद्दों पर सतत् संघर्ष करे, तो वज़ीरपुर इस्पात उद्योग की ढलान वज़ीरपुर मज़दूर आन्दोलन की ढलान नहीं बनेगा। मज़दूर वर्ग के बीच केवल आन्दोलन एवं संघर्ष की लहर के उठान पर चढ़ने के वक़्त ही मौजूद नहीं रहा जाता बल्कि निराशा के दौर में भी मौजूद रहना होता है। मज़दूरों को उनकी जीवन स्थिति और हर सामाजिक-आर्थिक घटनाक्रम पर राजनीतिक तौर पर शिक्षित प्रशिक्षित किये बिना मज़दूरों के उभार के ग़लत राजनीति के भेंट चढ़ जाने की सम्भावना बढ़ती जाती है। वज़ीरपुर के मज़दूर आन्दोलन को पुन:संगठित करने के लिए हमें इस आत्मालोचना की रोशनी में आगे बढ़ना होगा।
मज़दूर बिगुल, अक्टूबर 2021
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मज़दूरों के महान नेता लेनिन