हरियाणवी रागनी – दौर-ए-संकट
रामधारी खटकड़
(हम आपके सामने आज के हालात पर हरियाणा के जनकवि रामधारी खटकड़ की एक रागनी प्रस्तुत कर रहे हैं। किसान परिवार में जन्मे रामधारी खटकड़ हरियाणा की मेहनतकश जनता की बुलन्द आवाज़ के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। ये काव्य की रागनी/रागिनी या रागणी की विशिष्ट हरियाणवी शैली में लिखते हैं। इनकी कविताई बड़े ही सहज-सरल और साफ़गोई के साथ सामाजिक यथार्थ को प्रस्तुत करने में सक्षम है।)
संकट बढ़ता जारया सै इब धरकै उरै नै ध्यान सुणो
बेरुजगारी, बेकारी म्हं फँसती जा री जान सुणो। (टेक)
1. पूँजीवादी सिस्टम के म्हं, आपस का ना प्यार रहै
घर-घर झगड़े होते देखो, रोज़-रोज़ तकरार रहै
असली दुश्मन दिक्खै ना वो, छिपकै करता वार रहै
फूट पड़े जा मेहनतकश म्हं, राज्जी न्यूँ साहुकार रहै
क्रान्ति बिन ना होता दिक्खै निर्धन का कल्याण सुणो…
2. पूँजीवादी सिस्टम के म्हं न्याय का ढोंग रचाया जा
ठाढा मारै रोवण दे ना, हीणा रोज़ दबाया जा
जात-धर्म के झगड़े ठा कै आपस म्हं लड़वाया जा
इलैक्शन खात्तर ध्यान पलट दें सीम पै जंग कराया जा
जवान बलि हो बिना बात जब रोवै बाप किसान सुणो…
3. मुनाफ़ा और मुनाफ़ा चाहवैं, ना इनसानी नाता है
क़ुदरत के जो संसाधन सब ताक़तवर हथियाता है
चरित्र लम्पट हो सबका वो, ऐसा पाठ पढ़ाता है
कमेरा भूखा मरता देखो, लुटेरा मौज उड़ाता है
या बेड़ी हम नै पड़ै काटणी, बूढ़े और जवान सुणो…
4. समाजवाद जै कायम होज्या, ढंग बदल ज्या जीणे का
ख़ून चूसती जौंक बचैं ना, शोषण हो ना हीणे का
गोदाम किते भी सडैं नहीं, हो प्रबन्ध खाणे-पीणे का
धर्म का झगड़ा मिट ज्या सारा अयोध्या और मदीणे का
“रामधारी” की कलम लिखे जा क्रान्तिकारी गान सुणो…
(शब्दार्थ :- राज्जी – ख़ुश, ठाढा – ताक़तवर, हीणा – कमजोर)
प्रस्तुति – अरविन्द
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2019













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