अधिक से अधिक मुनाफ़़ेे के लालच में मज़दूरों की ज़िन्दगियों के साथ खिलवाड़ करते कारख़ाना मालिक
राजविन्दर
पिछले दिनों कुछ औद्योगिक मज़दूरों के साथ मुलाक़ात हुई जिनके काम करते समय हाथों की उँगलियाँ कट गयीं या पूरे-पूरे हाथ ही कट गये। लुधियाना के औद्योगिक इलाक़े में अक्सर ही मज़दूरों के साथ हादसे होते रहते हैं। शरीर के अंग कटने से लेकर मौत तक होना आम बात बन चुकी है। मज़दूर के साथ हादसा होने पर कारख़ाना मालिकों का व्यवहार मामले को रफ़ा-दफ़ा करने वाला ही होता है। बहुत सारे मसलों में तो मालिक मज़दूरों का इलाज तक नहीं करवाते, मुआवज़ा देना तो दूर की बात है।
क्रान्तिकारी अख़बार ‘मज़दूर बिगुल’ का प्रचार करते समय ढण्डारी, लुधियाना के गणपति चौक में एक मज़दूर औरत के साथ मुलाक़ात हुई। इस औरत की बाएँ हाथ की दोनों बड़ी उँगलियाँ काम करते हुए मशीन में आ जाने के कारण कट गयी हैं। फ़ोकल प्वाइण्ट फेज़-7 में साइकिल के पुर्जे बनाने वाले इस कारख़ाने का नाम उस औरत ने रौटर बताया जिसमें वह साल भर से काम कर रही है। हेल्पर के रूप में भर्ती हुई इस औरत को प्रबन्धकों की ओर से मशीन चलाने के लिए दबाव डाला गया, जिस कारण यह हादसा हुआ। कारख़ाने में लगभग 150 मज़दूर काम करते हैं जिनमें तीन औरतें हैं। यहाँ मज़दूरों को श्रम क़ानूनों के अनुसार कोई अधिकार नहीं मिलता। यह हादसा होने पर बाक़ी मज़दूरों ने मालिक पर दबाव डाला तो इस औरत का ईएसआई कार्ड बनाया गया। लेकिन अब महीना बीतने पर मालिक ने कोई मुआवज़ा या आर्थिक सहायता नहीं की, ज़ख्मी हालत में भी काम करने के लिए कारख़ाने बुलाया जा रहा है। कारख़ाना मालिकों द्वारा मज़दूरों के साथ की जा रही गुण्डागर्दी का पता इस बात से लगता है कि काम से हटाये जाने के डर के कारण यह औरत कारख़ाने का और अपना नाम नहीं बताना चाहती।
ऐसी ही घटना राम बरोश के साथ हुई। कुछ दिन पहले वह मज़दूर पुस्तकालय में आया। वह मज़दूर लुधियाना की एक टेक्सटाइल फ़ैक्टरी में पिछले एक साल से काम कर रहा था। काम करते समय उसका दाहिना हाथ मशीन में आकर कट गया। मालिक ने इलाज करवाने और मुआवज़ा देने का आश्वासन दिया लेकिन वास्तव में मालिक ने कोई मदद नहीं की और अपनी बात से पलट गया। इस मज़दूर का ईएसआई कार्ड नहीं बना था, इसलिए उसे ब्याज़ पर पैसा लेकर इलाज करवाना पड़ रहा है। मालिक ने उसे फ़ैक्टरी आने से सख्त मना कर दिया है। अब राम बरोश बेकार और असहाय घूम रहा है।
मज़दूर बस्ती रणजीत नगर, शेरपुर में भी तुलसार इंजीनियर्स फ़ैक्टरी में काम करने वाले दो मज़दूरों से बात हुई। इसमें से एक सूर्या यादव ने बताया कि सुरक्षा के प्रबन्ध न होने और ज़्यादा माल बनाने के दबाव के चलते कारख़ाने में मज़दूरों को अक्सर चोटें लगती रहती हैं। सूर्या का हाथ कटने से एक महीना पहले भी एक मज़दूर की उसी फ़ैक्टरी में उँगलियाँ कट गयी थीं। इस कारख़ाने में भी लगभग 150 मज़दूर काम करते हैं लेकिन किसी मज़दूर का ईएसआई कार्ड नहीं बना है। इसके चलते मज़दूरों को अपने ख़र्चे पर इलाज करवाना पड़ता है।
फ़ोकल प्वाइण्ट, फेज़-5 में बजाज संस इण्डस्ट्रीज़ लिमिटेड कम्पनी का कारख़ाना है, जहाँ ऑटो पार्ट्स बनते हैं। इस फ़ैक्टरी में भी अक्सर ही मशीनों में खराबी और काम के अत्यधिक बोझ के चलते उँगलियाँ और हाथ कटते रहते हैं। ऐसी घटना होने पर प्रबन्धक कोशिश करते हैं कि दूसरे मज़दूरों को इसका पता न चले।
ये तो महज़ चन्द उदाहरण हैं, लुधियाना में ऐसे हादसे आम देखने को मिलते हैं। खस्ताहाल मशीनों को ठीक न करवाने, उत्पादन बढ़ाने के लिए काम के बोझ, कुशल मज़दूरों की जगह कम वेतन पर अकुशल मज़दूरों से काम करवाने आदि कारणों से ऐसे हादसे ज़्यादा होते हैं। इस सबके पीछे एक ही कारण है – पूँजीपतियों की अधिक से अधिक मुनाफ़़ा कमाने की भूख। पूँजीपतियों का मुनाफ़़ा तो बढ़ता रहता है लेकिन मज़दूर अपाहिज होते रहते हैं और कई बार तो ज़िन्दगी से भी हाथ धो बैठते हैं। कारख़ाने, खेत, खदानें जहाँ पर जीवन निर्वाह के लिए वस्तुओं का उत्पादन होता है पूँजीवादी व्यवस्था के अन्दर मज़दूरों के लिए ये कोई यातना शिविरों से कम नहीं है। यहाँ पर वह अपनी जान हथेली पर रखकर काम करते हैं। मालिक मज़दूरों को मशीन का पुर्जा समझते हैं, इसके खराब होने या टूटने पर उठाकर बाहर फेंक दिया जाता है और उसकी जगह नया पुर्जा (मज़दूर) फिट कर दिया जाता है।
मज़दूरों के साथ ऐसी धक्केशाहियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। बहुत थोड़े मज़दूरों को ही श्रम क़ानूनों के तहत फ़ैक्टरी पहचान पत्र, हाज़िरी कार्ड, ईएसआई, ईपीएफ़, वार्षिक छुिट्टयाँ, वार्षिक बोनस, बूट-वर्दी, हादसों से सुरक्षा के प्रबन्ध आदि अधिकार मिल पाते हैं। अधिकतर मज़दूरों को इन अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। शासन-प्रशासन हमेशा मालिकों का ही साथ देता है। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मज़दूरों को ख़ुद आगे आना होगा। मज़दूर अपनी संगठित ताक़त के दम पर ही अपनी सुरक्षा कर सकते हैं।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2017













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