Category Archives: महान शिक्षकों की क़लम से

लेनिन : टेलर प्रणाली – मशीन द्वारा आदमी को दास बनाया जाना

श्रम की उत्पादनशीलता में कैसी प्रकाण्ड उपलब्धि है! लेकिन मज़दूर का वेतन चौगुना नहीं, बल्कि अधिक से अधिक डेढ़ गुना ही बढ़ाया जाता है और वह भी सिर्फ थोड़े समय के लिए । ज्योंही मज़दूर नई प्रणाली के आदी हो जाते हैं, त्योंही उनका वेतन घटाकर पहले के स्तर पर पहुँचा दिया जाता है । पूँजीपति प्रकाण्ड मुनाफ़ा हासिल करता है, लेकिन मज़दूर पहले की अपेक्षा चौगुनी अधिक मशक्कत करते हैं और पहले की अपेक्षा चौगुनी तेज़ी से अपने स्नायु–तन्तुओं तथा मांसपेशियों का क्षय करते हैं । नए नियुक्त हुए मज़दूरों को कारख़ाने के सिनेमा में ले जाया जाता है, जहाँ उसे काम की “आदर्श” पूर्ति प्रदर्शित की जाती है और उसे उस आदर्श के “स्तर तक पहुँचने” को विवश किया जाता है । एक हफ्ते बाद उसे सिनेमा में खुद उसका काम दिखाया जाता है और “आदर्श” के साथ उसकी तुलना की जाती है ।

लेनिन-पूँजीवाद और मज़दूरों का आव्रजन

पूँजीवाद ने राष्ट्रों के विशेष प्रकार के प्रव्रजन को जन्म दिया है। तेज़ी से विकसित होते औद्योगिक देश, जो बड़े पैमाने पर मशीनरी लगा रहे हैं तथा पिछड़े देशों को विश्व बाज़ार से बाहर खदेड़ रहे हैं, अपने यहाँ औसत दर से अधिक मज़दूरी देते और इस प्रकार पिछड़े देशों के मज़दूरों को आकर्षित करते हैं।

लाखों मज़दूर इस प्रकार सैकड़ों और हज़ारों वेर्स्त की दूरियों में भटकते हैं। विकसित पूँजीवाद इस प्रकार जबरन उन्हें अपने चक्र में खींच लेता है, उन्हें उनके कोटर से खींचकर अलग कर देता है, उन्हें एक विश्व ऐतिहासिक हलचल का भागीदार बना देता है और उन्हें शक्तिशाली तथा एकजुट कारख़ाना मालिकों के अन्तरराष्ट्रीय वर्ग के आमने–सामने लाकर खड़ा कर देता है।

चीनी क्रान्ति के महान नेता माओ त्से-तुङ के जन्मदिवस (26 दिसम्बर) के अवसर पर

कम्युनिस्टों को हर समय सच्चाई का पक्षपोषण करने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि हर सच्चाई जनता के हित में होती है। कम्युनिस्टों को हर समय अपनी गलतियाँ सुधारने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि गलतियाँ जनता के हितों के विरुद्ध होती हैं।

स्तालिन-लेनिनवादी पार्टी की मुख्य विशेषताएँ

पार्टी को सर्वप्रथम मज़दूर वर्ग का अग्रदल (हिरावल दस्ता) होना चाहिए। उसे मज़दूर वर्ग के सर्वोत्तम लोगों को ग्रहण करना चाहिए और उनके अनुभव, उनकी क्रान्तिकारी क्षमता और अपने वर्ग की नि:स्वार्थ सेवा की उनकी भावना का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। किन्तु पार्टी वास्तव में अग्रदल तभी बन सकती है जब वह क्रान्तिकारी सिद्धान्त के अस्त्र से लैस हो और उसे आन्दोलन एवं क्रान्ति के नियमों का ज्ञान हो। ऐसा न होने से वह सर्वहारा आन्दोलन का संचालन और सर्वहारा क्रान्ति का नेतृत्‍व करने में समर्थ न हो सकेगी। मज़दूर वर्ग का आम हिस्सा जो कुछ सोचता और अनुभव करता है, पार्टी का काम अगर उसे ही व्यक्त करने तक सीमित रहा, अगर पार्टी स्वत:स्फूर्त आन्दोलन की पूँछ बनकर उसके पीछे–पीछे घिसटती रही, अगर वह उक्त आन्दोलन की राजनीतिक उदासीनता और जड़ता को दूर करने में समर्थ न हुई, अगर वह मज़दूर वर्ग के क्षणिक हितों के ऊपर न उठ सकी, और अगर वह जनता की चेतना को सर्वहारा के वर्गहितों के धरातल तक पहुँचाने में समर्थ न हुई तो फिर पार्टी एक वास्तविक पार्टी नहीं बन सकती।

लेनिन – किसानों के बारे में कम्युनिस्ट दृष्टिकोण : कुछ महत्त्वपूर्ण पहलू

हम आज़ादी और ज़मीन के साथ ही समाजवाद के लिए युद्ध छेड़ रहे हैं। समाजवाद के लिए संघर्ष पूँजी के शासन के विरुद्ध संघर्ष है। यह सर्वप्रथम और सबसे मुख्य रूप से उजरती मज़दूर द्वारा चलाया जाता है जो प्रत्यक्षतः और पूर्णतः पूँजीवाद पर निर्भर होता है। जहाँ तक छोटे मालिक किसानों का प्रश्न है, उनमें से कुछ के पास ख़ुद की ही पूँजी है, और प्रायः वे ख़ुद ही मज़दूरों का शोषण करते हैं। इसलिए सभी छोटे मालिक किसान समाजवाद के लिए लड़ने वालों की क़तार में शामिल नहीं होंगे, केवल वही ऐसा करेंगे जो कृतसंकल्प होकर सचेतन तौर पर पूँजी के विरुद्ध मज़दूरों का पक्ष लेंगे, निजी सम्पत्ति के विरुद्ध सार्वजनिक सम्पत्ति का पक्ष लेंगे।

समाजवादी क्रान्ति का भूमि-सम्बन्ध विषयक कार्यक्रम और वर्ग-संश्रय : लेनिन की और कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल की अवस्थिति

आर्थिक दृष्टि से, “मँझोले किसानों” का मतलब वे किसान होने चाहिए जो, (1) मालिक या आसामी के रूप में ज़मीन के ऐसे टुकड़े जोतते हैं जो छोटे तो हैं लेकिन, पूँजीवाद के तहत, न केवल गृहस्थी और खेती-बाड़ी की न्यूनतम ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त हैं, बल्कि कुछ बेशी पैदावार भी करते हैं जिसे, कम से कम अच्छे वर्षों में, पूँजी में बदला जा सकता है; (2) जो अक्सर (उदाहरण के लिए, दो या तीन में से एक किसान) बाहरी श्रम-शक्ति को उजरत पर रखते हैं। किसी उन्नत पूँजीवादी देश में मँझोले किसानों की एक ठोस मिसाल जर्मनी में पाँच से दस हेक्टेयर तक के फ़ार्मों वाला एक समूह है, जिसमें 1907 की जनगणना के अनुसार, उजरती मज़दूरों से काम कराने वाले किसानों की संख्या इस समूह के कुल किसानों की संख्या की क़रीब एक तिहाई है।[1] फ़्रांस में, जहाँ विशेष फसलों – उदाहरण के लिए, अंगूर की खेती जिसमें बहुत बड़ी मात्र में श्रम की ज़रूरत होती है – की खेती बहुत विकसित है, यह समूह सम्भवतः कुछ अधिक पैमाने पर बाहर से श्रम भाड़े पर लेता है।

लेनिन-धर्म के बारे में मजदूरों की पार्टी का रुख

मार्क्सवाद भौतिकवाद है। इस कारण यह धर्म का उतना ही निर्मम शत्रु है जितना कि अठारहवीं सदी के विश्वकोषवादी पण्डितों का भौतिकवाद या फ़ायरबाख का भौतिकवाद था, इसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं है। लेकिन मार्क्स और एंगेल्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद विश्व कोषवादियों और फ़ायरबाख से आगे निकल जाता है, क्योंकि यह भौतिकवादी दर्शन को इतिहास के क्षेत्र में, सामाजिक विज्ञानों के भी क्षेत्र में, लागू करता है। हमें धर्म के विरुद्ध लड़ाई लड़नी चाहिए-यह समस्त भौतिकवाद का क ख ग है, और फ़लस्वरूप मार्क्सवाद का भी। लेकिन मार्क्सवाद ऐसा भौतिकवाद नहीं है, जो क ख ग पर ही रुक गया। वह आगे जाता है। वह कहता हैः हमें यह भी जानना चाहिये कि धर्म के विरुद्ध कैसे लड़ाई लड़ी जाये, और यह करने के लिये जनता के बीच हमें ईश्वर और धर्म के मूल की व्याख्या भी भौतिकवादी पद्धति से करनी होगी।

माओ-सिद्धान्त और व्यवहार के मेल से ही सच्चा ज्ञान हासिल हो सकता है!

जिन्होंने सिर्फ़ किताबी ज्ञान प्राप्त किया है उन्हें सच्चे मायने में बुद्धिजीवी कैसे बनाया जा सकता है इसका सिर्फ़ एक ही तरीका है कि वे व्यावहारिक कार्य में भाग लें और व्यावहारिक कार्यकर्ता बनें तथा जो लोग सैद्धांतिक कार्य में लगे हुए हैं वे महत्वपूर्ण व्यावहारिक समस्याओं का अध्ययन करें। इस प्रकार हम अपने उद्देश्य में सफ़ल होंगे।

“संसदीय रास्ते का खंडन”

क्रान्तिकारी सर्वहारा पार्टी को पूंजीवादी संसद–व्यवस्था में इसलिये हिस्सा लेना चाहिए, ताकि जनता को जगाया जा सके, और यह काम चुनाव के दौरान तथा संसद में अलग–अलग पार्टियों के बीच के संघर्ष के दौरान किया जा सकता है। लेकिन वर्ग–संघर्ष को केवल संसदीय संघर्ष तक ही सीमित रखने, अथवा संसदीय संघर्ष को इतना ऊंचा और निर्णयात्मक रूप देने कि संघर्ष के बाकी सब रूप उसके अधीन हो जाएं, का मतलब वास्तव में पूंजीपति वर्ग के पक्ष में चले जाना और सर्वहारा वर्ग के खिलाफ हो जाना है।

माओ – सच्चा ज्ञान क्या है?

जिन्होंने सिर्फ किताबी ज्ञान प्राप्त किया है उन्हें सच्चे मायने में बुद्धिजीवी कैसे बनाया जा सकता है? इसका सिर्फ एक ही तरीका है कि वे व्यावहारिक कार्य में भाग लें और व्यावहारिक कार्यकर्ता बनें तथा जो लोग सैद्धांतिक कार्य में लगे हुए हैं वे महत्वपूर्ण व्यावहारिक समस्याओं का अध्ययन करें। इस प्रकार हम अपने उद्देश्य में सफल होंगे।…